वाराणसी में गिन नहीं पाएंगे चाक के चक्कर, कोहार बस्ती में गूंज रही आवाज

खबर सार :-

माता-पिता का दिया आशीर्वाद उनको चाक चलाते समय मिला था। उनके लिए यह आशीर्वाद हुनर बन गया। यही हुनर परिवार को पेट पालने के काम आ रहा है। साथ ही त्योहारों और पर्वाें की परंपराएं निभाने का मौका मिल रहा है। वाराणसी के फुलवरिया और कोहार बस्ती में इन दिनों दीपावली के लिए मिट्टी के बर्तन बनाए जा रहे हैं।
कुम्हार महिलाओं के काम आया हुनर, वाराणसी में जलाए जाते हैं लाखों दीये

खबर विस्तार : -

वाराणसी, दीपावली का पर्व नजदीक आते ही उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी के सनातनी घरों और बाजारों में त्योहार की रौनक बढ़ने लगी है। इस रौनक को बढ़ाने में सबसे ज्यादा भूमिका मिट्टी के बर्तनों की है। लोगों के घर-आंगन को रोशन करने के लिए वाराणसी के कैंट क्षेत्र स्थित फुलवरिया की कोहार (प्रजापति) बस्ती में कुम्हार परिवार दिन-रात चाक चला रहे हैं। बस्ती में चाक की घूमती धुरी और मिट्टी को आकार देते हाथों को राह चलते हुए भी देखा जा सकता है। कुम्हार का चाक जिस समय चलने लगता है, इसके चक्के की स्पीड गिन पाना कठिन हो जाता है। उसी रफ्तार में हाथों को भी गति दी जाती है।

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दर्जनों तरह के बर्तन बना रहा परिवार 

बस्ती की रहने वाली महिलाएं भी अपने परिवार के साथ पीढ़ियों से चाक चला रही हैं। इनको दर्जनों तरह के मिट्टी के बर्तन बनाने आते हैं। आकार और डिजाइन भी यह खूबियों वाले बना लेती हैं। इन महिलाओं ने परंपरा को आगे बढ़ाया है। इनके हाथों से तैयार होने वाले मिट्टी के दीये, गगरी, पुरवा, हड़िया, ढकनी, परई और भड़ैया बाजारों की रौनक बन रहे हैं। पारंपरिक बर्तन आज भी लोगों की आस्था, संस्कृति और ग्रामीण जीवनशैली को दर्शा रहे हैं। दीपावली का त्योहार आते ही यह पूरे परिवार के साथ दीये और पूजन सामग्री तैयार करने में जुट जाते हैं। इनके हाथों का हुनर सालों काम आता रहता है।

कुशल हाथों को ही थमाई जाती है चाक

दीपावली के लिए दीये बनाने की तैयारी कई महीने पहले ही शुरू हो जाती है। हर परिवार को सबसे पहले मिट्टी का इंतजाम करना होता है। आसान तरीके से मिट्टी नहीं मिल पाती है। इसके बाद मिट्टी को कूटकर और गूंथकर चाक पर चढ़ाया जाता है। यह हुनर जिस किसी को आता है, वही चाक संभालता है। कुशल हाथ उसे अलग-अलग आकार देते हैं। इस काम को करने के लिए सभी चाह रखते हैं, लेकिन चाक पर बर्तन तैयार कर पाना सबके बस की बात नहीं है। जब बर्तन तैयार हो जाते हैं तब उनको धूप में सुखाया जाता है। फिर भट्ठी में पकाकर बिक्री के लिए तैयार किया जाता है। भले ही यह काम सालभर चलता रहता है, लेकिन पूरी प्रक्रिया में काफी मेहनत रहती है। यही वजह है कि कुम्हार परिवार दीपावली से करीब चार से पांच महीने पहले ही तैयारियों में जुट जाते हैं। त्योहार के समय बाजार की मांग के आधार पर तत्काल यह कुछ भी नहीं कर सकते हैं। 

पुस्तैनी पेशे में पल रहा परिवार 

मोम आदि के आलावा बिजली के झालर से भी सजावट की जाती है। इस कारण मिट्टी के बर्तन बनाने के पारंपरिक कारोबार के सामने कई चुनौतियां जरूर खड़ी हो गई हैं, लेकिन आधुनिकता और रोजगार के बदलते अवसरों के बीच भी अभी इस काम में हुनर की पूछ है। युवा पीढ़ी का रुझान इस पुश्तैनी पेशे से कम हो रहा है, लेकिन कमाई करने वालों ने इससे मुख नहीं मोड़ा है। अधिकांश युवा उच्च शिक्षा हासिल कर सरकारी नौकरी और दूसरे व्यवसायों में अपना भविष्य तलाश रहे हैं, उनमें भी दीवाली के दौरान इस कारोबार को बढ़ाने की जिज्ञासा बनी रहती है। पीढ़ियों से चली आ रही यह पारंपरिक कला आज भी परिवारों का पेट पाल रही है। 

हजारों घरों को उजाला देने का है काम

चाक के बर्तन बना रही महिलाएं अपनी मेहनत, हुनर और लगन से इस विरासत को बचाए रखने में जुटी हैं। उनकी ख्वाहिश रहती है कि  वह  अलग अलग तरीके के मिट्टी के बर्तन बनाएं। इनको आकार देकर दीपक बनाने वाले इन्हीं कारीगरों के श्रम से दीपावली की रात लाखों घर रोशन होते हैं। वह कोई त्योहार नहीं होता, जिसमें मिट्टी का घड़ा पूजा के दौरान नहीं लगाया जाता है। इनकी सजावट और चमक के पीछे इन परिवारों की मेहनत और संघर्ष है। दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीदना परंपरा और संस्कृति के प्रतीक हैं। वहीं, पारंपरिक हुनर को सम्मान देने की एक छोटी-सी पहल भी है।

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