SEBI का बड़ा फैसला! अब FPI रजिस्ट्रेशन फीस डॉलर में नहीं, रुपए में होगी जमा
खबर सार :-
सेबी का यह फैसला विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए शुल्क भुगतान प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और व्यावहारिक बनाएगा। डॉलर की जगह रुपए में फीस तय होने से लेखांकन संबंधी जटिलताएं कम होंगी और नियामकीय प्रक्रियाएं तेज होंगी। साथ ही, पंजीकरण प्रक्रिया में किए गए बदलाव भारत के पूंजी बाजार को विदेशी निवेशकों के लिए और अधिक आकर्षक बनाने की दिशा में अहम कदम हैं।
खबर विस्तार : -
SEBI New Rules: भारतीय पूंजी बाजार में पारदर्शिता और प्रक्रियाओं को अधिक सरल बनाने की दिशा में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने एक अहम कदम उठाया है। बाजार नियामक ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (Foreign Portfolio Investors-FPI) और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों (Foreign Venture Capital Investors-FVCI) के लिए पंजीकरण शुल्क व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए अब अमेरिकी डॉलर की जगह भारतीय रुपए में फीस तय करने का फैसला किया है। इस बदलाव का उद्देश्य भुगतान प्रक्रिया को आसान बनाना, लेखांकन संबंधी जटिलताओं को कम करना और नियामकीय कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना है।
अधिसूचना जारीः करीब 6 महीने बाद होगा प्रभावी
सेबी की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक, नया शुल्क ढांचा तत्काल लागू नहीं होगा, बल्कि इसे करीब छह महीने बाद प्रभावी किया जाएगा। इससे विदेशी निवेशकों, कस्टोडियन और अन्य संबंधित संस्थाओं को नई व्यवस्था के अनुरूप अपने सिस्टम और प्रक्रियाओं को अपडेट करने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा। नए नियमों के तहत अब तक लागू 1,000 अमेरिकी डॉलर की पंजीकरण फीस को बदलकर 90,000 रुपए कर दिया गया है। इसी तरह कैटेगरी-I एफपीआई और एफवीसीआई के लिए लागू 2,500 डॉलर की फीस को संशोधित कर 2.30 लाख रुपए निर्धारित किया गया है। इसके अलावा, सेबी ने विलंब शुल्क (लेट फीस) और कंटिन्यूएशन फीस के ढांचे में भी आवश्यक बदलाव किए हैं, ताकि सभी शुल्क भारतीय मुद्रा में ही जमा किए जा सकें।

पंजीकरण प्रक्रिया भी होगी पहले से आसान
सेबी ने स्पष्ट किया है कि संशोधित नियमों के अनुसार डिपॉजिटरी संस्थानों को एफपीआई और एफवीसीआई से प्राप्त पंजीकरण शुल्क को रजिस्ट्रेशन मंजूर होने के पांच कार्यदिवसों के भीतर सेबी के पास जमा कराना होगा। इससे फीस जमा करने की प्रक्रिया अधिक समयबद्ध और व्यवस्थित होगी। नियामक ने विदेशी निवेशकों के लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को भी पहले की तुलना में अधिक सरल बनाने का निर्णय लिया है। अब एफपीआई पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले कॉमन एप्लीकेशन फॉर्म में व्यक्ति की जन्म तिथि अथवा कंपनी के गठन की तारीख जैसी जानकारी शामिल की जाएगी। इस बदलाव का उद्देश्य दस्तावेजों की जांच को अधिक सुगम बनाना और आवेदन प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम करना है।
नए संशोधन से भारत में निवेश करना और भी सुविधाजनक
यह संशोधन मार्च 2026 में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) द्वारा जारी उस अधिसूचना के अनुरूप किया गया है, जिसमें विदेशी निवेशकों के लिए परमानेंट अकाउंट नंबर (PAN) प्राप्त करने की प्रक्रिया को सरल बनाने पर जोर दिया गया था। सेबी का मानना है कि कर और निवेश संबंधी प्रक्रियाओं के बीच बेहतर समन्वय से विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश करना और भी सुविधाजनक होगा। सेबी के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान एफपीआई और एफवीसीआई से पंजीकरण, कंटिन्यूएशन और अन्य शुल्क के रूप में जीएसटी सहित 12.98 मिलियन अमेरिकी डॉलर प्राप्त हुए थे। हालांकि, डॉलर आधारित शुल्क प्रणाली के कारण कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने आ रही थीं। इनमें मैनुअल अकाउंटिंग, इनवॉइसिंग में जटिलता, रियल-टाइम लेखांकन की कमी, विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव और वित्तीय रिपोर्टिंग में देरी जैसी समस्याएं शामिल थीं।
कस्टोडियनः सालाना 10 लाख रुपए की जगह मासिक भुगतान प्रणाली
सेबी का कहना है कि भारतीय रुपए में शुल्क तय करने से इन सभी परिचालन संबंधी दिक्कतों को काफी हद तक दूर किया जा सकेगा। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी और विदेशी निवेशकों के साथ-साथ नियामकीय संस्थाओं के लिए भी लेखांकन और ऑडिट प्रक्रिया सरल बनेगी। नियामक ने कस्टोडियन संस्थाओं के शुल्क भुगतान के तरीके में भी बदलाव किया है। अब तक कस्टोडियन को सालाना 10 लाख रुपए का भुगतान करना पड़ता था, लेकिन नई व्यवस्था के तहत यह राशि हर महीने 85,000 रुपए के रूप में जमा करनी होगी। मासिक भुगतान प्रणाली से नकदी प्रबंधन बेहतर होगा और शुल्क भुगतान अधिक नियमित एवं व्यवस्थित तरीके से किया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल फीस के भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के पूंजी बाजार को अधिक आधुनिक, डिजिटल और वैश्विक निवेशकों के लिए अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। भारतीय मुद्रा में शुल्क निर्धारण से विदेशी निवेशकों को भुगतान संबंधी स्पष्टता मिलेगी, जबकि नियामकीय संस्थाओं के लिए संचालन और निगरानी पहले से अधिक प्रभावी हो सकेगी।
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