30,000 करोड़ का NSE IPO: एक दशक की देरी, अब कमाई पर मंडराया नया खतरा
खबर सार :-
एनएसई का 30,000 करोड़ रुपये का आईपीओ भारतीय शेयर बाजार के लिए ऐतिहासिक साबित हो सकता है, लेकिन निवेशकों के लिए केवल आकार ही नहीं, बल्कि कंपनी की आय के स्रोत, नियामकीय जोखिम और भविष्य की विकास क्षमता का आकलन भी जरूरी होगा। ऑप्शंस कारोबार पर अधिक निर्भरता और बदलते नियम इस आईपीओ के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
खबर विस्तार : -
NSE IPO Updates: देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का करीब 30,000 करोड़ रुपये का प्रस्तावित प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) भारतीय पूंजी बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा शेयर इश्यू माना जा रहा है। लंबे समय से निवेशकों को इस आईपीओ का इंतजार था, लेकिन करीब एक दशक तक यह योजना नियामकीय और कानूनी अड़चनों में फंसी रही। अब जबकि एनएसई की लिस्टिंग का रास्ता लगभग साफ होता दिखाई दे रहा है, वहीं डेरिवेटिव्स कारोबार में आई सुस्ती और सेबी के नए नियमों ने इस बहुप्रतीक्षित आईपीओ को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।
Co-location Controversy: आईपीओ में देरी की सबसे बड़ी वजह
वैल्यू रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, एनएसई के आईपीओ में देरी की सबसे बड़ी वजह वर्ष 2010 से 2014 के बीच सामने आया को-लोकेशन विवाद रहा। आरोप था कि कुछ चुनिंदा ब्रोकर्स एक्सचेंज के डेटा सेंटर में बैकअप सर्वर से पहले कनेक्ट होकर अन्य निवेशकों की तुलना में कुछ मिलीसेकेंड पहले बाजार संबंधी जानकारी हासिल कर लेते थे। इस कथित तकनीकी बढ़त के कारण उन्हें ट्रेडिंग में अनुचित लाभ मिलने की आशंका जताई गई। फॉरेंसिक ऑडिट में इस पैटर्न की पुष्टि के बाद भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने पूरे मामले की जांच शुरू की।
2016 में ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस दाखिल
एनएसई ने वर्ष 2016 में अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (डीआरएचपी) दाखिल किया था, लेकिन उस समय तक को-लोकेशन विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। नियामकीय अनिश्चितता के चलते आईपीओ प्रक्रिया रोक दी गई। इसके बाद मामला सेबी की कार्रवाई, प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इस कारण देश के सबसे बड़े एक्सचेंज की लिस्टिंग लगभग दस वर्षों तक टलती रही। बता दें, ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) किसी कंपनी द्वारा अपना IPO लाने से पहले बाज़ार नियामक (SEBI) और जनता के सामने पेश किया गया एक प्रारंभिक दस्तावेज़ है। इसमें कंपनी के कारोबार, वित्तीय स्थिति और फंड के उपयोग की पूरी जानकारी होती है, लेकिन शेयरों की अंतिम कीमत और संख्या नहीं होती है।
1,491 करोड़ रुपये के संशोधित सेटलमेंट प्रस्ताव
रिपोर्ट के मुताबिक अब यह मामला अंतिम चरण में पहुंच चुका है। एनएसई ने सेबी के समक्ष 1,491 करोड़ रुपये के संशोधित सेटलमेंट प्रस्ताव को रखा है, जिसे मंजूरी मिलने की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो एक्सचेंज के आईपीओ का रास्ता लगभग पूरी तरह साफ हो जाएगा और लंबे समय से लंबित लिस्टिंग प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। वर्ष 2022 में आशीष चौहान की एनएसई में वापसी को भी इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चौहान एनएसई की संस्थापक टीम का हिस्सा रह चुके हैं और बाद में उन्होंने बीएसई की वर्ष 2017 की सफल लिस्टिंग का नेतृत्व भी किया था। उनकी वापसी के बाद एक्सचेंज की नियामकीय विश्वसनीयता मजबूत हुई और आईपीओ प्रक्रिया को नई गति मिली।
एक्सचेंज की कुल आय लगभग नौ गुना बढ़ी
दिलचस्प बात यह है कि आईपीओ में देरी के बावजूद एनएसई का कारोबार लगातार बढ़ता रहा। रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में एक्सचेंज की कुल आय लगभग नौ गुना बढ़ चुकी है। वर्ष 2016 में ट्रांजैक्शन चार्ज कुल आय का 49.5 प्रतिशत थे, जबकि वित्त वर्ष 2026 तक यह हिस्सा बढ़कर 78.7 प्रतिशत पहुंच गया। इस वृद्धि की सबसे बड़ी वजह डेरिवेटिव्स, विशेष रूप से इक्विटी ऑप्शंस ट्रेडिंग, रही। वर्तमान समय में एनएसई की कुल परिचालन आय का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा केवल ऑप्शंस ट्रेडिंग से आता है। हालांकि यही कारोबार अब सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। सेबी के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025 में 91 प्रतिशत रिटेल फ्यूचर्स एवं ऑप्शंस निवेशकों को शुद्ध नुकसान हुआ, जिसकी कुल राशि करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये रही। निवेशकों के लगातार बढ़ते नुकसान को देखते हुए नियामक ने डेरिवेटिव्स बाजार में कई बड़े बदलाव लागू किए।
2024 में लागू नए नियमों से एक्सपायरी में परिवर्तन
वर्ष 2024 से लागू नए नियमों के तहत दोनों प्रमुख एक्सचेंजों की सात साप्ताहिक एक्सपायरी को घटाकर एक-एक दिन कर दिया गया। इसके अलावा एनएसई के निफ्टी की एक्सपायरी मंगलवार और बीएसई के सेंसेक्स की गुरुवार तय की गई। साथ ही कॉन्ट्रैक्ट साइज बढ़ाने और एक्सपायरी के समय अतिरिक्त मार्जिन लागू करने जैसे कदम भी उठाए गए, ताकि अत्यधिक सट्टेबाजी पर अंकुश लगाया जा सके। इन नियमों का असर एनएसई के वित्तीय प्रदर्शन पर भी दिखाई दिया। वित्त वर्ष 2026 इन संशोधित नियमों के तहत संचालन का पहला पूरा वर्ष था। इस दौरान एक्सचेंज की परिचालन आय में लगभग 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि समायोजित शुद्ध लाभ 17 प्रतिशत घटकर 9,101 करोड़ रुपये रह गया। इससे पहले वित्त वर्ष में कंपनी का शुद्ध लाभ 10,978 करोड़ रुपये था। यही नहीं, इक्विटी ऑप्शंस बाजार में एनएसई की हिस्सेदारी भी 97 प्रतिशत से घटकर 75 प्रतिशत रह गई।
एनएसई की कमाई का बड़ा माध्यम ऑप्शंस ट्रेडिंग
रिपोर्ट में कहा गया है कि ये आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि एनएसई की कमाई अभी भी बड़े पैमाने पर ऑप्शंस ट्रेडिंग पर निर्भर है। यदि इस कारोबार में लंबे समय तक सुस्ती बनी रहती है, तो इसका असर कंपनी की आय, लाभप्रदता और भविष्य की वृद्धि पर पड़ सकता है। हालांकि एक्सचेंज के पास डेटा फीड्स, लिस्टिंग फीस, इंडेक्स लाइसेंसिंग और को-लोकेशन चार्ज जैसे स्थिर राजस्व स्रोत भी हैं, जो कुल आय का लगभग 21 प्रतिशत योगदान देते हैं और इनमें लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है।
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