भारत-ईयू एफटीए: टेक्सटाइल से फुटवियर तक आर्थिक कायाकल्प, अगले तीन साल में बदलेगा उद्योग का डीएनए

खबर सार :-
भारत-ईयू एफटीए भारतीय टेक्सटाइल, अपैरल, फुटवियर और लेदर सेक्टर के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है। ड्यूटी फ्री एक्सेस, निवेश और रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे। हालांकि यूरोपीय मानकों की चुनौती रहेगी, लेकिन सही नीतियों और तैयारी के साथ यह समझौता भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन में मजबूत स्थान दिला सकता है।

भारत-ईयू एफटीए: टेक्सटाइल से फुटवियर तक आर्थिक कायाकल्प, अगले तीन साल में बदलेगा उद्योग का डीएनए
खबर विस्तार : -

India-EU FTA: भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच घोषित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को भारतीय उद्योग, खासतौर पर कपड़ा और परिधान क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स और निर्यातकों का मानना है कि यह समझौता अगले दो से तीन वर्षों में टेक्सटाइल, अपैरल, फुटवियर और लेदर सेक्टर का पूरा नक्शा बदल देगा। ड्यूटी फ्री एक्सेस, बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मकता और निवेश के नए अवसर इस डील को एक वास्तविक गेम चेंजर बनाते हैं।

क्यों खास है भारत-ईयू एफटीए?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित यह एफटीए केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि भारत और यूरोप के बीच साझा समृद्धि का रोडमैप है। 27 देशों वाले यूरोपीय संघ के साथ यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट है। इससे भारतीय उत्पादों को यूरोपीय बाजार में आसान और सस्ती पहुंच मिलेगी, जिससे निर्यात में तेज उछाल की उम्मीद है। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, यह समझौता किसानों, एमएसएमई और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए नए दरवाजे खोलेगा, साथ ही सर्विसेज और निवेश सहयोग को भी मजबूत करेगा।

टेक्सटाइल और अपैरल सेक्टर को सबसे बड़ा फायदा

एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन प्रेमल उदानी के मुताबिक, भारत-ईयू एफटीए से टेक्सटाइल और परिधान निर्यात में अगले दो वर्षों में ही 30–40 प्रतिशत की बढ़ोतरी संभव है। सबसे अहम बात यह है कि यूरोप में भारतीय कपड़ों पर लगने वाली 11 प्रतिशत आयात ड्यूटी तुरंत खत्म हो जाएगी। इससे भारतीय उत्पाद बांग्लादेश, वियतनाम और अन्य प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले ज्यादा सस्ते और आकर्षक बनेंगे। लंबे समय से ड्यूटी डिसएडवांटेज झेल रहा भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर अब बराबरी के स्तर पर मुकाबला कर पाएगा।

तिरुपुर और दक्षिण भारत बनेंगे ग्रोथ इंजन

तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के जॉइंट सेक्रेटरी कुमार दुरईस्वामी इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” बताते हैं। उनके मुताबिक, यह 20 साल का ट्रेड एग्रीमेंट भारत के टेक्सटाइल निर्यात को 2030 तक 40 अरब डॉलर तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाएगा। फिलहाल तिरुपुर करीब 45,700 करोड़ रुपये का निटवेयर निर्यात करता है, जिसमें से लगभग 68 प्रतिशत देश के कुल निटवेयर एक्सपोर्ट का हिस्सा है। यूरोप को होने वाला निर्यात, जो अभी 25,000 करोड़ रुपये के आसपास है, 2030 तक 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

अमेरिका की टैरिफ नीति से राहत, यूरोप बना नया भरोसा

हाल के वर्षों में अमेरिकी टैरिफ नीतियों ने भारतीय निर्यातकों का मनोबल कमजोर किया था। ऐसे में यूरोपीय बाजार से मिलने वाला यह बड़ा अवसर उद्योग के लिए नई ऊर्जा लेकर आया है। दुरईस्वामी के अनुसार, कई बड़े यूरोपीय रिटेलर अब भारत में सीधे फैक्ट्रियां लगाने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। तमिलनाडु सरकार द्वारा आयोजित इंटरनेशनल टेक्सटाइल समिट जैसे प्रयास भी राज्य को वैश्विक टेक्सटाइल हब के रूप में स्थापित करने में मदद कर रहे हैं।

फुटवियर और लेदर: रोजगार का पावरहाउस

कोठारी इंडस्ट्रियल कॉरपोरेशन लिमिटेड के चेयरमैन रफीक अहमद के मुताबिक, भारत-ईयू एफटीए फुटवियर और लेदर सेक्टर के लिए “सपने के सच होने” जैसा है। यूरोपीय संघ दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत जीडीपी का प्रतिनिधित्व करता है, ऐसे में इस बाजार तक आसान पहुंच बेहद अहम है। उन्होंने बताया कि फुटवियर और लेदर उद्योग लेबर-इंटेंसिव हैं और खासतौर पर महिलाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार देते हैं। उदाहरण के तौर पर, सिर्फ 1,500 करोड़ रुपये के निवेश से 25,000 तक रोजगार पैदा किए जा सकते हैं, जो किसी भी अन्य उद्योग की तुलना में कहीं ज्यादा है।

निवेश, जॉइंट वेंचर और तकनीक का प्रवाह

मैनमेड और टेक्निकल टेक्सटाइल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के पूर्व चेयरमैन डॉ. संजीव सरन इसे भारत के लिए “फैंटास्टिक और ऐतिहासिक” कदम बताते हैं। उनके अनुसार, यह डील उन देशों से हुए नुकसान की भरपाई करेगी जिन्होंने टैरिफ को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। ईयू एफटीए से भारत में नए निवेश, जॉइंट वेंचर्स और एडवांस टेक्नोलॉजी का प्रवाह बढ़ेगा। इससे प्रोडक्ट क्वालिटी, डिजाइन और वैल्यू एडिशन में सुधार होगा, जो लंबे समय में भारत की वैश्विक ब्रांडिंग को मजबूत करेगा।

चुनौतियां भी कम नहीं

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय बाजार के साथ अवसरों के साथ-साथ कड़ी चुनौतियां भी आएंगी। ईयू के सख्त पर्यावरण, लेबर, क्वालिटी और टेक्निकल स्टैंडर्ड्स को पूरा करने के लिए भारतीय फैक्ट्रियों को अपने सिस्टम अपग्रेड करने होंगे। डॉ. सरन के मुताबिक, जो कंपनियां इन मानकों को अपनाने में सफल होंगी, वे न सिर्फ यूरोप बल्कि दुनिया के अन्य विकसित बाजारों में भी अपनी पकड़ मजबूत कर लेंगी।

मेक इन इंडिया और सप्लाई चेन को मजबूती

सीईपीसी के चेयरमैन मुकेश कुमार गोम्बर का मानना है कि अमेरिका की टैरिफ चुनौतियों के बीच ईयू एफटीए भारत के लिए एक बड़ा माइलस्टोन है। इससे नई मशीनरी, बेहतर टेक्नोलॉजी और वैल्यू-एडेड टेक्सटाइल को बढ़ावा मिलेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में एक विश्वसनीय और स्थिर भागीदार के रूप में स्थापित करेगा, खासकर तब जब मिडिल ईस्ट और अन्य क्षेत्रों में अस्थिरता बनी हुई है।

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