Global Oil crisis: वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता के बीच अमेरिका के एक अहम फैसले ने तेल बाजार की दिशा को फिलहाल कुछ राहत दी है। अमेरिका ने दुनिया के सभी देशों को समुद्र में ट्रांजिट में फंसे रूसी कच्चे तेल को खरीदने की अस्थायी अनुमति दे दी है। इस निर्णय के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हल्की गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को संतुलित करने और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच बाजार में स्थिरता बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।
खबर लिखे जाने तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 0.47 प्रतिशत गिरकर करीब 99.99 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड 0.67 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 95.09 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। यह गिरावट भले ही सीमित रही हो, लेकिन ऊर्जा बाजार के लिए इसे राहत का संकेत माना जा रहा है।

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी देते हुए कहा कि मौजूदा वैश्विक आपूर्ति तक पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से अमेरिका सभी देशों को समुद्र में फंसे रूसी तेल को खरीदने की अस्थायी छूट दे रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह निर्णय सीमित दायरे वाला और अल्पकालिक है। बेसेंट के अनुसार यह छूट केवल उन तेल कार्गो पर लागू होगी जो पहले से ही जहाजों पर लोड होकर ट्रांजिट में हैं। इसका उद्देश्य ऊर्जा बाजार में आपूर्ति बनाए रखना है, न कि रूस को आर्थिक लाभ पहुंचाना। उन्होंने कहा कि रूस को ऊर्जा क्षेत्र से मिलने वाली आय का बड़ा हिस्सा तेल निकालने के स्थान पर लगाए जाने वाले करों से मिलता है, इसलिए इस छूट से उसे कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं होगा।
अमेरिकी वित्त विभाग द्वारा जारी अस्थायी प्राधिकरण के तहत 12 मार्च से पहले जहाजों पर लोड किए गए रूसी मूल के कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री, डिलीवरी और ऑफलोडिंग से जुड़े लेन-देन की अनुमति दी गई है। दरअसल कई जहाजों में भरा तेल प्रतिबंधों के कारण समुद्र में फंसा हुआ था, जिससे वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा था। इस निर्णय से उन देशों को राहत मिलने की उम्मीद है जो पहले से ही इन कार्गो को खरीदने की प्रक्रिया में थे लेकिन प्रतिबंधों के कारण लेन-देन नहीं कर पा रहे थे।
इस बीच अमेरिका ने ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाने के लिए अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से 172 मिलियन बैरल तेल जारी करने की भी घोषणा की है। माना जा रहा है कि यह कदम वैश्विक बाजार में बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने और आपूर्ति को सुचारु बनाए रखने के लिए उठाया गया है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के इन कदमों का उद्देश्य एक तरफ रूस और ईरान पर दबाव बनाए रखना है, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक ऊर्जा बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को रोकना भी है।

वैश्विक तनाव के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आपूर्ति स्रोतों का व्यापक विविधीकरण किया है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार देश में कच्चे तेल की आपूर्ति सुरक्षित है और उपलब्ध भंडार होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से आने वाली संभावित बाधित आपूर्ति से भी अधिक है। संकट से पहले भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज मार्ग से होकर आता था। हालांकि अब भारत ने वैकल्पिक स्रोतों से आपूर्ति बढ़ाकर इस निर्भरता को काफी हद तक कम कर लिया है। पुरी ने बताया कि संघर्ष शुरू होने से पहले गैर-होर्मुज स्रोतों से कच्चे तेल की खरीद लगभग 55 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर करीब 70 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने कच्चे तेल के आयात स्रोतों में उल्लेखनीय विस्तार किया है। जहां 2006-07 में देश केवल 27 देशों से तेल खरीदता था, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 40 देशों तक पहुंच गई है। सरकार का कहना है कि यह रणनीतिक विविधीकरण वर्षों की नीतिगत योजना का परिणाम है, जिसने भारत को ऊर्जा आपूर्ति के मामले में लचीलापन दिया है।

देश की रिफाइनरियां भी इस समय उच्च क्षमता पर काम कर रही हैं। कई रिफाइनरियां तो 100 प्रतिशत से भी अधिक क्षमता पर संचालन कर रही हैं, ताकि घरेलू मांग को पूरा किया जा सके और संभावित आपूर्ति संकट से निपटा जा सके। इन सबके बावजूद तेल का संकट कम होता नहीं दिख रहा है। ऐसे में भारत समेत दुनिया के सभी ऊर्जा संकट से प्रभावित देश समस्या का समाधान निकालने में जुटे हैं।
मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर संभावित खतरे के कारण वैश्विक तेल बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। रूस अब भी दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातकों में से एक है। 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस के वित्तीय संस्थानों, शिपिंग नेटवर्क और ऊर्जा निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद वैश्विक ऊर्जा बाजार में रूस की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में अमेरिका का यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजार में तत्काल राहत तो दे सकता है, लेकिन लंबे समय में तेल बाजार की दिशा भू-राजनीतिक परिस्थितियों और ऊर्जा नीतियों पर ही निर्भर करेगी।
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