विजयपुर में संत दिग्विजय राम का संदेश—“संपत्ति नहीं, संस्कार ही बनाते हैं असली पहचान”
खबर सार :-
युवाओं को संबोधित करते हुए संत दिग्विजय राम ने कहा कि आज रिश्ते और बंधन भी 'इस्तेमाल करो और फेंक दो' वाली मानसिकता का शिकार हो रहे हैं। यह सामाजिक विघटन का एक प्रमुख कारण बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि मौन व्रत का पालन करना और आध्यात्मिक साधना में लीन रहना व्यक्ति के भीतर आंतरिक परिपक्वता को बढ़ावा देता है।
खबर विस्तार : -
भीलवाड़ाः आधुनिकता की तेज रफ्तार में जहां नई पीढ़ी को सफलता और ऊंचाइयों की दौड़ में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी जा रही है, वहीं विजयपुर की पावन धरा से संत दिग्विजय राम ने ऐसा संदेश दिया जिसने हर श्रोता को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “नई पीढ़ी को चांद-सितारे छूने की शिक्षा देने से पहले माता-पिता और गुरु के चरण छूना सिखाइए। संपत्ति केवल ‘विल’ बनाएगी, लेकिन संस्कार ‘गुडविल’ देंगे।”
अरावली पर्वतमाला की सुंदर वादियों के बीच स्थित विजयपुर में नृसिंहद्वारा के समीप राव नरेन्द्र सिंह कृषि फार्म पर मूंदड़ा परिवार द्वारा आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन यह विचार सामने आए। कथा मर्मज्ञ रामस्नेही संत दिग्विजय राम ने अपने ओजस्वी प्रवचनों से श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया।
रविवार को कथा के दौरान संत ने समाज में बढ़ती भौतिक संपन्नता और घटते संस्कारों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज माता-पिता अपनी संतान को केवल धन-संपत्ति देने पर जोर दे रहे हैं, लेकिन संस्कारों की उपेक्षा हो रही है। उन्होंने समझाया कि धन केवल कानूनी दस्तावेज यानी ‘विल’ बनकर रह जाता है, जबकि संस्कार व्यक्ति और परिवार की ‘गुडविल’ को पीढ़ियों तक बनाए रखते हैं।
संत दिग्विजय राम ने बदलते सामाजिक परिवेश पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वृद्धाश्रम भारतीय संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रहे, बल्कि यह पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण का परिणाम हैं। उन्होंने माता-पिता की सेवा को ही सच्ची ईश्वर भक्ति बताया और कहा कि असली आनंद किसी तीर्थ में नहीं, बल्कि अपने घर में बुजुर्गों के सम्मान और सेवा में मिलता है। व्रत और उपवास को उन्होंने केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का माध्यम बताया।
कथा के दौरान संत ने ध्रुव, जड़भरत, भक्त प्रह्लाद, नृसिंह अवतार, राजा पृथु और अजामिल जैसे प्रसंगों की भावपूर्ण व्याख्या की। इन उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने बताया कि सच्ची भक्ति, दृढ़ संकल्प और नैतिक जीवन ही मनुष्य को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं।
प्रवचन के बीच जब संत ने “म्हारा चारभुजा रा नाथ” और “सीताराम सीताराम कहिए, जाहि विधि राखे राम रहिए” जैसे भजनों की प्रस्तुति दी, तो पूरा पांडाल भक्तिरस में डूब गया। श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे और पूरा वातावरण भक्ति और आस्था से गूंजने लगा।
कार्यक्रम का संचालन पंडित अशोक व्यास ने किया। कथा के प्रारंभ और समापन के समय मूंदड़ा परिवार के सदस्यों—बंशीलाल मूंदड़ा, दामोदर मूंदड़ा, संदीप मूंदड़ा, शिवकुमार मूंदड़ा, ओमप्रकाश मूंदड़ा, कमलकुमार मूंदड़ा, अशोक कुमार मूंदड़ा और दिलीप मूंदड़ा—ने विधिवत पूजा-अर्चना और आरती की।
इस अवसर पर पूर्व राज्य मंत्री सुरेन्द्र सिंह जाड़ावत, राव नरेन्द्र सिंह विजयपुर, पूर्व पालिका अध्यक्ष रमेश नाथ योगी, चित्तौड़गढ़ शहर कांग्रेस अध्यक्ष अनिल सोनी, विजयपुर प्रशासक श्यामलाल शर्मा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
कथा स्थल पर पूरे दिन एक ही संदेश गूंजता रहा—“नई पीढ़ी को ऊंचा उड़ना जरूर सिखाइए, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहना उससे भी ज्यादा जरूरी है।”
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