उज्जैन में सदियों पुरानी परंपरा ‘नगर पूजा’ की शुरुआत, शहरभर के 40 मंदिरों में होगी पूजा-अर्चना

खबर सार :-

शारदीय नवरात्रि की अष्टमी पर उज्जैन में सदियों पुरानी परंपरा ‘नगर पूजा’ की शुरुआत हुई। ढोल-नगाड़ों के बीच शहरभर के लगभग 40 मंदिरों में पूजा-अर्चना करने का क्रम जारी है।
उज्जैन में नगर पूजा की शुरुआत, चौबीस खंभा मंदिर में देवियों की पूजा

खबर विस्तार : -

उज्जैन: शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी के अवसर पर मध्य प्रदेश के उज्जैन में इस सोमवार को सदियों पुरानी 'नगर पूजा' की परंपरा निभाई जा रही है। अनुष्ठानों की शुरुआत सुबह चौबीस खंभा माता मंदिर में हुई, जहां देवी महामाया और महालया की पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल शहर भर के लगभग 40 मंदिरों में पूजा करने के लिए निकला। ये मंदिर विभिन्न देवियों, भैरव और भगवान हनुमान को समर्पित हैं। 

परंपरा के अनुसार, 26 किलोमीटर लंबी इस यात्रा के दौरान देवियों और भैरव के मंदिरों में मदिरा अर्पित की जाएगी, जबकि भगवान हनुमान के मंदिरों में ध्वजा चढ़ाई जाएगी। नगर पूजा का समापन रात लगभग 8:00 बजे अंकपात क्षेत्र स्थित 'हांडी फोड़ भैरव' मंदिर में होगा, जहां एक मिट्टी की 'हांडी' फोड़ने की रस्म निभाई जाएगी।उज्जैन की ऐतिहासिक धार्मिक परंपराओं में 'नगर पूजा' का विशेष महत्व है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह अनुष्ठान शहर को विपत्तियों, महामारियों और प्राकृतिक आपदाओं से बचाने तथा नागरिकों की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना के लिए किया जाता है। इसमें धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ पूरे शहर की परिक्रमा भी शामिल होती है।

चौबीस खंभा मंदिर में पूजा के बाद शुरू हुई यात्रा 

सोमवार सुबह लगभग 8:00 बजे जिला कलेक्टर रोशन कुमार सिंह ने चौबीस खंभा माता मंदिर में देवी महामाया और महालया की पूजा की। इस अनुष्ठान में देवियों को मदिरा अर्पित की गई और उसके बाद आरती की गई। परंपरा का पालन करते हुए, 'सोलह श्रृंगार' की सामग्री, चुनरी और 'बालबकल' (एक पारंपरिक अनुष्ठानिक भेंट) अर्पित किए गए। पूजा के बाद ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल तय मार्ग पर आगे बढ़ा। पारंपरिक रूप से नगर पूजा को 'तांत्रिक' जड़ों वाला एक अनुष्ठान माना जाता है। इस शोभायात्रा के दौरान प्रतिनिधिमंडल अलग-अलग मंदिरों में रुककर वैदिक या पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना करता है। हर मंदिर में आरती करने और भोग (प्रसाद) चढ़ाने के बाद यह शोभायात्रा अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ जाती है। कई जगहों पर स्थानीय लोग भी इस शोभायात्रा का स्वागत करते हैं। 

40 मंदिरों में पूजा: मिट्टी के घड़े से शराब की धार

'नगर पूजा' के दौरान शहरभर के लगभग 40 मंदिरों में अनुष्ठान किए जाते हैं। इनमें चामुंडा माता, भूखी माता, काल भैरव और चंड-मुंड नाशिनी के मंदिर शामिल हैं। परंपरा के अनुसार, शोभायात्रा आगे बढ़ती है और साथ ही एक मिट्टी के घड़े (हांडी) से शराब की धार गिराई जाती है। देवी और भैरव के मंदिरों में शराब चढ़ाई जाती है, जबकि भगवान हनुमान के मंदिरों में झंडे फहराए जाते हैं। लगभग 26 किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद शोभायात्रा गढ़कालिका माता मंदिर पहुंचती है, जहां निर्धारित पूजा-अर्चना की जाती है। यह अनुष्ठान अंकपात क्षेत्र के 'हांडी फोड़ भैरव' मंदिर में संपन्न होता है, जहाँ उस मिट्टी के घड़े को रस्म के तौर पर फोड़ दिया जाता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक मान्यताओं को, बल्कि उज्जैन की स्थानीय संस्कृति और लोक आस्था को भी दर्शाती है।

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प्रशासन द्वारा शराब और पूजा सामग्री की व्यवस्था

'नगर पूजा' की व्यवस्था जिला प्रशासन और राजस्व विभाग के सहयोग से की जाती है। पूजा सामग्री जुटाने की देखरेख करने वाले पटवारी भगवान सिंह यादव के अनुसार, इस अनुष्ठान के लिए लगभग 45 अलग-अलग चीजें इकट्ठी की जाती हैं। इसकी तैयारियां दो दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। एक दिन पहले, चौबीस खंभा माता मंदिर के पास लगभग 35 किलोग्राम 'बलबकल' (उबले हुए काले चने और गेहूं से बना एक व्यंजन) तैयार किया जाता है। इसके साथ ही पूरियां और भजिए भी बनाए जाते हैं। अष्टमी की सुबह 6:00 बजे तक पूजा के लिए जरूरी सभी चीजें तैयार कर ली जाती हैं।

रस्म में कुल खर्च लगभग 18,000 रुपये 

अनुष्ठान में इस्तेमाल होने वाली शराब के लिए SDM कार्यालय की ओर से लगभग एक सप्ताह पहले आबकारी विभाग को औपचारिक अनुरोध भेजा जाता है। इसके बाद विभाग पूजा के लिए शराब की 30 बोतलें मुफ्त उपलब्ध कराता है। राजस्व विभाग की मदद से आयोजित होने वाली इस रस्म में कुल खर्च लगभग 18,000 रुपये आता है। इन व्यवस्थाओं के समन्वय में पटवारी, कोतवार (गांव के रक्षक), कस्बा पटेल (स्थानीय प्रशासनिक प्रमुख) और अन्य संबंधित कर्मचारी शामिल होते हैं। सात प्रमुख मंदिरों में 'सोलह श्रृंगार' (पारंपरिक रूप से सोलह तरह के आभूषण और प्रसाधन सामग्री) भेंट किए जाते हैं।

लोक मान्यताओं में लाल कपड़े का विशेष महत्व

'नगर पूजा' के दौरान देवी को समर्पित कई प्रमुख मंदिरों में 'सोलह श्रृंगार' के साथ-साथ अन्य पूजा सामग्री भी भेंट की जाती है। इनमें चौबीस खंभा माता मंदिर, चौंसठ योगिनी, नगरकोट महारानी, ​​चामुंडा देवी, पद्मावती देवी, बहादुरगंज और गढ़कालिका मंदिर शामिल हैं। 'नगर पूजा' से जुड़ी लोक मान्यताओं में लाल कपड़े का विशेष महत्व है; माना जाता है कि घर में इस कपड़े को बांधने से बच्चों को 'बुरी नजर' से सुरक्षा मिलती है। यह परंपरा यहां की स्थानीय धार्मिक संस्कृति का एक अहम हिस्सा है।

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उज्जैन: शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी के अवसर पर मध्य प्रदेश के उज्जैन में इस सोमवार को सदियों पुरानी 'नगर पूजा' की परंपरा निभाई जा रही है। अनुष्ठानों की शुरुआत सुबह चौबीस खंभा माता मंदिर में हुई, जहां देवी महामाया और महालया की पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल शहर भर के लगभग 40 मंदिरों में पूजा करने के लिए निकला। ये मंदिर विभिन्न देवियों, भैरव और भगवान हनुमान को समर्पित हैं। 

परंपरा के अनुसार, 26 किलोमीटर लंबी इस यात्रा के दौरान देवियों और भैरव के मंदिरों में मदिरा अर्पित की जाएगी, जबकि भगवान हनुमान के मंदिरों में ध्वजा चढ़ाई जाएगी। नगर पूजा का समापन रात लगभग 8:00 बजे अंकपात क्षेत्र स्थित 'हांडी फोड़ भैरव' मंदिर में होगा, जहां एक मिट्टी की 'हांडी' फोड़ने की रस्म निभाई जाएगी।उज्जैन की ऐतिहासिक धार्मिक परंपराओं में 'नगर पूजा' का विशेष महत्व है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह अनुष्ठान शहर को विपत्तियों, महामारियों और प्राकृतिक आपदाओं से बचाने तथा नागरिकों की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना के लिए किया जाता है। इसमें धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ पूरे शहर की परिक्रमा भी शामिल होती है।

चौबीस खंभा मंदिर में पूजा के बाद शुरू हुई यात्रा 

सोमवार सुबह लगभग 8:00 बजे जिला कलेक्टर रोशन कुमार सिंह ने चौबीस खंभा माता मंदिर में देवी महामाया और महालया की पूजा की। इस अनुष्ठान में देवियों को मदिरा अर्पित की गई और उसके बाद आरती की गई। परंपरा का पालन करते हुए, 'सोलह श्रृंगार' की सामग्री, चुनरी और 'बालबकल' (एक पारंपरिक अनुष्ठानिक भेंट) अर्पित किए गए। पूजा के बाद ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल तय मार्ग पर आगे बढ़ा। पारंपरिक रूप से नगर पूजा को 'तांत्रिक' जड़ों वाला एक अनुष्ठान माना जाता है। इस शोभायात्रा के दौरान प्रतिनिधिमंडल अलग-अलग मंदिरों में रुककर वैदिक या पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना करता है। हर मंदिर में आरती करने और भोग (प्रसाद) चढ़ाने के बाद यह शोभायात्रा अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ जाती है। कई जगहों पर स्थानीय लोग भी इस शोभायात्रा का स्वागत करते हैं। 

40 मंदिरों में पूजा: मिट्टी के घड़े से शराब की धार

'नगर पूजा' के दौरान शहरभर के लगभग 40 मंदिरों में अनुष्ठान किए जाते हैं। इनमें चामुंडा माता, भूखी माता, काल भैरव और चंड-मुंड नाशिनी के मंदिर शामिल हैं। परंपरा के अनुसार, शोभायात्रा आगे बढ़ती है और साथ ही एक मिट्टी के घड़े (हांडी) से शराब की धार गिराई जाती है। देवी और भैरव के मंदिरों में शराब चढ़ाई जाती है, जबकि भगवान हनुमान के मंदिरों में झंडे फहराए जाते हैं। लगभग 26 किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद शोभायात्रा गढ़कालिका माता मंदिर पहुंचती है, जहां निर्धारित पूजा-अर्चना की जाती है। यह अनुष्ठान अंकपात क्षेत्र के 'हांडी फोड़ भैरव' मंदिर में संपन्न होता है, जहाँ उस मिट्टी के घड़े को रस्म के तौर पर फोड़ दिया जाता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक मान्यताओं को, बल्कि उज्जैन की स्थानीय संस्कृति और लोक आस्था को भी दर्शाती है।

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प्रशासन द्वारा शराब और पूजा सामग्री की व्यवस्था

'नगर पूजा' की व्यवस्था जिला प्रशासन और राजस्व विभाग के सहयोग से की जाती है। पूजा सामग्री जुटाने की देखरेख करने वाले पटवारी भगवान सिंह यादव के अनुसार, इस अनुष्ठान के लिए लगभग 45 अलग-अलग चीजें इकट्ठी की जाती हैं। इसकी तैयारियां दो दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। एक दिन पहले, चौबीस खंभा माता मंदिर के पास लगभग 35 किलोग्राम 'बलबकल' (उबले हुए काले चने और गेहूं से बना एक व्यंजन) तैयार किया जाता है। इसके साथ ही पूरियां और भजिए भी बनाए जाते हैं। अष्टमी की सुबह 6:00 बजे तक पूजा के लिए जरूरी सभी चीजें तैयार कर ली जाती हैं।

रस्म में कुल खर्च लगभग 18,000 रुपये 

अनुष्ठान में इस्तेमाल होने वाली शराब के लिए SDM कार्यालय की ओर से लगभग एक सप्ताह पहले आबकारी विभाग को औपचारिक अनुरोध भेजा जाता है। इसके बाद विभाग पूजा के लिए शराब की 30 बोतलें मुफ्त उपलब्ध कराता है। राजस्व विभाग की मदद से आयोजित होने वाली इस रस्म में कुल खर्च लगभग 18,000 रुपये आता है। इन व्यवस्थाओं के समन्वय में पटवारी, कोतवार (गांव के रक्षक), कस्बा पटेल (स्थानीय प्रशासनिक प्रमुख) और अन्य संबंधित कर्मचारी शामिल होते हैं। सात प्रमुख मंदिरों में 'सोलह श्रृंगार' (पारंपरिक रूप से सोलह तरह के आभूषण और प्रसाधन सामग्री) भेंट किए जाते हैं।

लोक मान्यताओं में लाल कपड़े का विशेष महत्व

'नगर पूजा' के दौरान देवी को समर्पित कई प्रमुख मंदिरों में 'सोलह श्रृंगार' के साथ-साथ अन्य पूजा सामग्री भी भेंट की जाती है। इनमें चौबीस खंभा माता मंदिर, चौंसठ योगिनी, नगरकोट महारानी, ​​चामुंडा देवी, पद्मावती देवी, बहादुरगंज और गढ़कालिका मंदिर शामिल हैं। 'नगर पूजा' से जुड़ी लोक मान्यताओं में लाल कपड़े का विशेष महत्व है; माना जाता है कि घर में इस कपड़े को बांधने से बच्चों को 'बुरी नजर' से सुरक्षा मिलती है। यह परंपरा यहां की स्थानीय धार्मिक संस्कृति का एक अहम हिस्सा है।

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