पर्यावरण रसायन एवं सतत विकास पर व्याख्यान माला आयोजित, कई मुद्दों पर हुआ मंथन

खबर सार :-

दिल्ली में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना और माधव सेवा न्यास की व्याख्यान माला में पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, सतत विकास और भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा हुई।
दिल्ली में व्याख्यान माला का आयोजन, भारतीय ज्ञान परंपरा पर हुआ मंथन

खबर विस्तार : -

नई दिल्लीः अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, दिल्ली प्रांत एवं माधव सेवा न्यास के संयुक्त तत्वावधान में 17 अक्टूबर 2026 को एक दिवसीय व्याख्यान माला का आयोजन किया गया। ‘पर्यावरण रसायन एवं सतत विकास : ज्ञान परंपराएं, चुनौतियां और संभावनाएं’ विषय पर आयोजित यह कार्यक्रम अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केंद्रीय कार्यालय स्थित सभागार में संपन्न हुआ। व्याख्यान माला में पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और सतत विकास के लक्ष्यों को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़कर समझने पर विशेष जोर दिया गया। कार्यक्रम में शिक्षाविदों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विषय विशेषज्ञों ने सहभागिता की।

प्रो. बलराम पाणी ने पर्यावरण संतुलन को बताया आवश्यक

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के डीन ऑफ कॉलेजेज प्रोफेसर (डॉ.) बलराम पाणी रहे। उन्होंने अपने व्याख्यान में पर्यावरण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि हमारे आसपास विद्यमान प्राकृतिक एवं जैविक घटकों के समुच्चय को पर्यावरण कहा जाता है। प्रकृति ने मानव जीवन के लिए वायुमंडल, भूमंडल और जल जैसे अमूल्य संसाधन प्रदान किए हैं। इन घटकों के बीच संतुलन बनाए रखना पर्यावरण संरक्षण के लिए अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मानवीय गतिविधियों के कारण पर्यावरण प्रदूषण की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। इसके समाधान के लिए प्रत्येक व्यक्ति में पर्यावरण के प्रति जागरूकता, उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार और सकारात्मक पहल आवश्यक है। उन्होंने प्रदूषकों की पहचान और उनके स्रोतों के विश्लेषण को प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

प्रो. पाणी ने बताया कि भौतिक, रासायनिक और जैविक कारक जब मानव स्वास्थ्य, संपत्ति, जीव-जगत तथा प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, तो वे प्रदूषक कहलाते हैं। इन प्रदूषकों के कारण पर्यावरण की प्राकृतिक गुणवत्ता में होने वाली हानिकारक गिरावट पर्यावरण प्रदूषण कहलाती है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जनसहभागिता, प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना समय की आवश्यकता है।

‘सेवन सिस्टर्स प्रदूषक’ की अवधारणा पर हुई चर्चा

मुख्य वक्ता ने प्रकृति की स्वयं को पुनर्संतुलित और पुनर्जीवित करने की क्षमता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रदूषण में निरंतर वृद्धि प्रकृति की इस अंतर्निहित क्षमता को प्रभावित कर रही है। इसलिए प्रदूषण बढ़ाने वाले कारकों और संकेतकों को समझना तथा उनके प्रभावी नियंत्रण के उपाय विकसित करना आवश्यक है। व्याख्यान के दौरान उन्होंने ‘सेवन सिस्टर्स प्रदूषक’ की अवधारणा पर विचार-विमर्श करते हुए पर्यावरण और रसायन विज्ञान के पारस्परिक संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने सतत विकास की अवधारणा को गरुड़ पुराण में वर्णित विचारों और जीवन-मूल्यों से जोड़ते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा तथा पर्यावरणीय चेतना के बीच संबंधों को स्पष्ट किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पर्यावरण संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, योग, संतुलित जीवनशैली और भारतीय ज्ञान परंपरा का समन्वय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदार व्यवहार और पर्यावरण के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व से ही सतत विकास की दिशा में प्रभावी प्रगति संभव है।

डॉ. बालमुकुंद पांडे ने इतिहास की प्रासंगिकता पर डाला प्रकाश

कार्यक्रम के संरक्षक एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडे ने उपस्थित अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। अपने उद्बोधन में उन्होंने इतिहास के अध्ययन की प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि वर्तमान को समझने, अनुभवों को संरक्षित करने और भविष्य को दिशा देने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। उन्होंने इतिहास के अध्ययन को समाज की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक चेतना से जोड़ते हुए इसके व्यापक महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. धर्मचंद चौबे ने सभी प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने सतत विकास की अवधारणा को वैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधारों पर व्याख्यायित किया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित प्रोफेसर प्रवीण गर्ग ने भी अपने विचार व्यक्त किए और सभी के प्रति आभार जताया।

डॉ. प्रीति उपाध्याय ने किया कार्यक्रम का संचालन

कार्यक्रम का व्यास संचालन अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली की आजीवन सदस्य डॉ. प्रीति उपाध्याय ने किया। उनके संचालन में व्याख्यान माला का आयोजन सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ। कार्यक्रम के उपरांत प्रतिभागियों के लिए जलपान की व्यवस्था की गई। इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ, जिसने कार्यक्रम को अतिरिक्त आकर्षण प्रदान किया। इस अवसर पर डॉ. सुधाकर कुमार मिश्रा, डॉ. अनुराग मिश्रा, डॉ. ए.के. दुबे, डॉ. रमेश मिश्रा, मुकेश उपाध्याय, डॉ. सचिन रतन झा, डॉ. नरेंद्र शुक्ला, डॉ. रत्नेश त्रिपाठी सहित अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी और विषय विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

यह भी पढ़ेंः-पूर्वी मेदिनीपुर के दुर्गा पूजा पंडालों में स्वर्ण मंदिर और राम मंदिर की झलक, महिला सशक्तिकरण का भी संदेश

नई दिल्लीः अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, दिल्ली प्रांत एवं माधव सेवा न्यास के संयुक्त तत्वावधान में 17 अक्टूबर 2026 को एक दिवसीय व्याख्यान माला का आयोजन किया गया। ‘पर्यावरण रसायन एवं सतत विकास : ज्ञान परंपराएं, चुनौतियां और संभावनाएं’ विषय पर आयोजित यह कार्यक्रम अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केंद्रीय कार्यालय स्थित सभागार में संपन्न हुआ। व्याख्यान माला में पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और सतत विकास के लक्ष्यों को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़कर समझने पर विशेष जोर दिया गया। कार्यक्रम में शिक्षाविदों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विषय विशेषज्ञों ने सहभागिता की।

प्रो. बलराम पाणी ने पर्यावरण संतुलन को बताया आवश्यक

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के डीन ऑफ कॉलेजेज प्रोफेसर (डॉ.) बलराम पाणी रहे। उन्होंने अपने व्याख्यान में पर्यावरण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि हमारे आसपास विद्यमान प्राकृतिक एवं जैविक घटकों के समुच्चय को पर्यावरण कहा जाता है। प्रकृति ने मानव जीवन के लिए वायुमंडल, भूमंडल और जल जैसे अमूल्य संसाधन प्रदान किए हैं। इन घटकों के बीच संतुलन बनाए रखना पर्यावरण संरक्षण के लिए अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मानवीय गतिविधियों के कारण पर्यावरण प्रदूषण की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। इसके समाधान के लिए प्रत्येक व्यक्ति में पर्यावरण के प्रति जागरूकता, उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार और सकारात्मक पहल आवश्यक है। उन्होंने प्रदूषकों की पहचान और उनके स्रोतों के विश्लेषण को प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

प्रो. पाणी ने बताया कि भौतिक, रासायनिक और जैविक कारक जब मानव स्वास्थ्य, संपत्ति, जीव-जगत तथा प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, तो वे प्रदूषक कहलाते हैं। इन प्रदूषकों के कारण पर्यावरण की प्राकृतिक गुणवत्ता में होने वाली हानिकारक गिरावट पर्यावरण प्रदूषण कहलाती है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जनसहभागिता, प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना समय की आवश्यकता है।

‘सेवन सिस्टर्स प्रदूषक’ की अवधारणा पर हुई चर्चा

मुख्य वक्ता ने प्रकृति की स्वयं को पुनर्संतुलित और पुनर्जीवित करने की क्षमता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रदूषण में निरंतर वृद्धि प्रकृति की इस अंतर्निहित क्षमता को प्रभावित कर रही है। इसलिए प्रदूषण बढ़ाने वाले कारकों और संकेतकों को समझना तथा उनके प्रभावी नियंत्रण के उपाय विकसित करना आवश्यक है। व्याख्यान के दौरान उन्होंने ‘सेवन सिस्टर्स प्रदूषक’ की अवधारणा पर विचार-विमर्श करते हुए पर्यावरण और रसायन विज्ञान के पारस्परिक संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने सतत विकास की अवधारणा को गरुड़ पुराण में वर्णित विचारों और जीवन-मूल्यों से जोड़ते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा तथा पर्यावरणीय चेतना के बीच संबंधों को स्पष्ट किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पर्यावरण संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, योग, संतुलित जीवनशैली और भारतीय ज्ञान परंपरा का समन्वय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदार व्यवहार और पर्यावरण के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व से ही सतत विकास की दिशा में प्रभावी प्रगति संभव है।

डॉ. बालमुकुंद पांडे ने इतिहास की प्रासंगिकता पर डाला प्रकाश

कार्यक्रम के संरक्षक एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडे ने उपस्थित अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। अपने उद्बोधन में उन्होंने इतिहास के अध्ययन की प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि वर्तमान को समझने, अनुभवों को संरक्षित करने और भविष्य को दिशा देने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। उन्होंने इतिहास के अध्ययन को समाज की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक चेतना से जोड़ते हुए इसके व्यापक महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. धर्मचंद चौबे ने सभी प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने सतत विकास की अवधारणा को वैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधारों पर व्याख्यायित किया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित प्रोफेसर प्रवीण गर्ग ने भी अपने विचार व्यक्त किए और सभी के प्रति आभार जताया।

डॉ. प्रीति उपाध्याय ने किया कार्यक्रम का संचालन

कार्यक्रम का व्यास संचालन अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली की आजीवन सदस्य डॉ. प्रीति उपाध्याय ने किया। उनके संचालन में व्याख्यान माला का आयोजन सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ। कार्यक्रम के उपरांत प्रतिभागियों के लिए जलपान की व्यवस्था की गई। इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ, जिसने कार्यक्रम को अतिरिक्त आकर्षण प्रदान किया। इस अवसर पर डॉ. सुधाकर कुमार मिश्रा, डॉ. अनुराग मिश्रा, डॉ. ए.के. दुबे, डॉ. रमेश मिश्रा, मुकेश उपाध्याय, डॉ. सचिन रतन झा, डॉ. नरेंद्र शुक्ला, डॉ. रत्नेश त्रिपाठी सहित अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी और विषय विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

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