बंगाल बॉर्डर की सुरक्षा पर सुवेंदु सरकार का बड़ा एक्शन, बीएसएफ को जमीन देने की तैयारी, ‘नो फेंस’ बॉर्डर पर अब लगेगी बाड़
खबर सार :-
पश्चिम बंगाल सरकार की नई त्रिपक्षीय रणनीति सीमा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में निर्णायक कदम मानी जा रही है। सरकारी, निजी और अतिक्रमित भूमि के माध्यम से बीएसएफ को तेजी से जमीन उपलब्ध कराने की योजना न केवल बाड़बंदी परियोजना को गति देगी, बल्कि अवैध घुसपैठ और तस्करी पर भी प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में मददगार साबित हो सकती है।
खबर विस्तार : -
West Bengal Suvendu Adhikari BSF Border Fencing: : पश्चिम बंगाल में नई सरकार के गठन के तुरंत बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। बांग्लादेश से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा पर लंबे समय से लंबित बाड़बंदी परियोजना को गति देने के लिए राज्य सरकार ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को भूमि हस्तांतरण की त्रिपक्षीय रणनीति लागू कर दी है। इस फैसले को भाजपा सरकार के चुनावी वादों को पूरा करने की दिशा में पहला बड़ा कदम माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, राज्य सचिवालय में इस रणनीति को लेकर विस्तृत योजना तैयार की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य बिना बाड़ वाली सीमाओं पर जल्द से जल्द कांटेदार तार लगाने की प्रक्रिया शुरू करना है, ताकि अवैध घुसपैठ, तस्करी और सीमा पार अपराधों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।
पहले चरण में सीधे बीएसएफ को मिलेगी सरकारी जमीन
रणनीति के पहले चरण के तहत सीमा से सटी सरकारी भूमि को तत्काल बीएसएफ को हस्तांतरित किया जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि इस कदम से बाड़बंदी का काम बिना किसी कानूनी बाधा के तेजी से शुरू हो सकेगा। राज्य सरकार ने ऐसे इलाकों की पहचान शुरू कर दी है जहां सरकारी जमीन उपलब्ध है और अब तक वहां बाड़ नहीं लगाई गई है। प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सीमावर्ती जिलों में भूमि का सत्यापन कर शीघ्र रिपोर्ट सौंपें। सरकार का मानना है कि सरकारी भूमि के उपयोग से परियोजना की लागत भी कम होगी और प्रक्रिया में देरी की संभावना भी घटेगी।
निजी जमीन अधिग्रहण के लिए विशेष मुआवजा योजना
रणनीति के दूसरे हिस्से में उन निजी जमीनों का अधिग्रहण शामिल है जो सीमा के बेहद करीब स्थित हैं। सूत्रों के अनुसार, सरकार ने भूमि मालिकों को मौजूदा बाजार मूल्य से अधिक उचित पारिश्रमिक देने की योजना बनाई है, ताकि अधिग्रहण प्रक्रिया में विरोध की संभावना कम हो। अधिकारियों का कहना है कि पहले की सरकारों के दौरान मुआवजा विवादों के कारण कई परियोजनाएं अटक गई थीं। इस बार सरकार जमीन मालिकों के साथ संवाद बनाकर सहमति के आधार पर अधिग्रहण पूरा करना चाहती है। सरकार को उम्मीद है कि बेहतर मुआवजा नीति से स्थानीय लोगों का सहयोग मिलेगा और सीमा सुरक्षा से जुड़े इस महत्वपूर्ण अभियान को सामाजिक समर्थन भी प्राप्त होगा।

अतिक्रमित भूमि पर कार्रवाई होगी तेज
तीसरे चरण में सरकार उन जमीनों पर कार्रवाई करेगी जिन पर अवैध कब्जा है और जो बिना बाड़ वाली सीमा के निकट स्थित हैं। प्रशासन पहले इन अतिक्रमणों को हटाएगा और फिर भूमि को बीएसएफ को सौंपेगा। सूत्रों का कहना है कि कई सीमावर्ती इलाकों में वर्षों से सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा बना हुआ है, जिससे सुरक्षा परियोजनाएं प्रभावित होती रही हैं। नई सरकार ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाएगी। इसके लिए जिला प्रशासन, पुलिस और राजस्व विभाग के बीच समन्वय स्थापित किया गया है ताकि कार्रवाई तेजी और पारदर्शिता के साथ पूरी हो सके।
45 दिनों में पूरी होगी प्रक्रिया
राज्य सरकार ने इस पूरी योजना के लिए 45 दिनों की समय सीमा तय की है। अधिकारियों के अनुसार, मंत्रिमंडल के फैसले के बाद सभी विभागों को स्पष्ट जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्य सचिव नदिनी चक्रवर्ती को विकास कार्यों के प्रधान समन्वयक के रूप में नियुक्त किया गया है। उन्हें भूमि हस्तांतरण प्रक्रिया की निगरानी और बीएसएफ के साथ तालमेल सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है। सरकार का दावा है कि तय समयसीमा के भीतर बाड़बंदी परियोजना का पहला चरण शुरू कर दिया जाएगा।
भाजपा के चुनावी वादे पर अमल
बीएसएफ को जमीन सौंपने का मुद्दा भाजपा के चुनावी घोषणापत्र का प्रमुख हिस्सा था। पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान आरोप लगाया था कि पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार की अनिच्छा के कारण सीमा बाड़बंदी का कार्य लंबे समय से अधूरा पड़ा था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी अपनी रैलियों में वादा किया था कि यदि राज्य में भाजपा सरकार बनी तो बीएसएफ को जमीन सौंपना पहला बड़ा प्रशासनिक निर्णय होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नई सरकार इस फैसले के जरिए सुरक्षा और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर मजबूत संदेश देना चाहती है। साथ ही यह कदम सीमावर्ती जिलों में प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत करने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।
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