शाहजहांपुर में उपेक्षित पड़ा नवाब बहादुर खां का ऐतिहासिक मकबरा, स्थानीय लोगों ने की ये मांग
खबर सार :-
शाहजहांपुर के मंडी स्थित नवाब बहादुर खां का मकबरा 1712 में उनके बेटे नवाब अजीज खां ने बनवाया। बहादुर खां की 1649 में कंधार में संदिग्ध मौत हुई। 1857 के बाद मकबरा क्षतिग्रस्त हुआ और नीलामी के बाद पठानों ने इसे बचाया। अब इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंपने की मांग उठ रही है।
खबर विस्तार : -
शाहजहांपुरः शाहजहांपुर के मंडी क्षेत्र में स्थित नवाब बहादुर खां का मकबरा आज भी अपने गौरवशाली इतिहास की गवाही देता है, लेकिन उपेक्षा और संरक्षण की कमी के कारण यह धरोहर धीरे-धीरे जर्जर होती जा रही है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार इस मकबरे का निर्माण नवाब बहादुर खां के छोटे बेटे नवाब अजीज खां ने वर्ष 1712 में करवाया था।
संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी नवाब की मौत
इतिहासकारों के मुताबिक नवाब बहादुर खां की मृत्यु जुलाई 1649 में कंधार में हुई थी। शाहजहांनामा के अनुसार उनकी मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई, जिसमें जहर दिए जाने की आशंका जताई जाती है। उस समय कंधार को लेकर मुगल साम्राज्य और ईरान के बीच लगातार संघर्ष चलता रहा। वर्ष 1648 में ईरान ने कंधार किले पर कब्जा कर लिया था, जिसके बाद मुगल बादशाह ने औरंगजेब को वहां भेजा, लेकिन कठोर सर्दी के कारण अभियान असफल रहा।
गौरवशाली है मकबरे का इतिहास
नवाब बहादुर खां की अंतिम इच्छा के अनुसार उनके पार्थिव शरीर को उनकी जागीर शाहजहांपुर लाकर दफनाया गया, जहां आज यह मकबरा स्थित है। इस परिसर में नवाब अजीज खां का मकबरा भी मौजूद है, जो इस ऐतिहासिक स्थल की महत्ता को और बढ़ाता है।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद यह मकबरा जलालाबाद के ठाकुर ज्ञान सिंह को उनकी वफादारी के बदले दे दिया गया। बताया जाता है कि इस दौरान मकबरे की संगमरमर से बनी कब्र को उखाड़ लिया गया, जिससे इसकी मूल संरचना को काफी नुकसान पहुंचा।
बाद में, लगभग 1878 के आसपास, ज्ञान सिंह के परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण इस मकबरे की नीलामी कर दी गई। उस समय शहर के पठानों ने चंदा इकट्ठा कर इस ऐतिहासिक धरोहर को खरीदकर ककरा के नवाब को सौंप दिया।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंपने की मांग
आज यह मकबरा संरक्षण के अभाव में अपनी पहचान खोता जा रहा है। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों का मानना है कि इस धरोहर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन लाकर संरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास से जुड़ी इस महत्वपूर्ण विरासत को देख और समझ सकें।
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