झांसी नगर निगम: 30 करोड़ की उधारी के बीच 'शैक्षिक टूर' की तैयारी, विकास कार्यों पर लगा प्रश्नचिह्न
खबर सार :-
झांसी नगर निगम 30 करोड़ की उधारी और वित्तीय संकट से जूझ रहा है, लेकिन इस बीच पार्षदों का एक दल गुवाहाटी के 'शैक्षिक टूर' पर जा रहा है। क्या यह विकास का मॉडल है या जनता के पैसे की बर्बादी?
खबर विस्तार : -
झांसी: नगर निगम इस समय एक अजीबोगरीब अंतर्विरोध से गुजर रहा है। एक तरफ निगम का खजाना खाली है और विकास कार्य बजट के अभाव में ठप पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ पार्षदों का एक दल सरकारी खर्च पर पूर्वोत्तर के राज्य असम (गुवाहाटी) की सैर करने की तैयारी में है। 28 मार्च को होने वाली इस रवानगी ने शहर के गलियारों में चर्चाओं और विवादों का बाजार गर्म कर दिया है।
वित्तीय संकट और ठप पड़े विकास कार्य
झांसी नगर निगम वर्तमान में भारी वित्तीय बोझ के नीचे दबा हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, निगम पर 30 करोड़ रुपये से अधिक की उधारी है। इस भारी कर्ज का सीधा असर शहर की बुनियादी सुविधाओं और विकास परियोजनाओं पर देखने को मिल रहा है। स्थिति इतनी गंभीर है कि कई वार्डों में छोटे-मोटे मरम्मत कार्य भी फाइलों में अटके हुए हैं।
बजट की कमी का आलम यह है कि कुछ पार्षद अपने क्षेत्रों में विकास कार्य न होने के विरोध में धरना-प्रदर्शन तक कर रहे हैं। वहीं, निगम के अधिकारी हर मांग के बदले बजट कम होने की दुहाई देते नजर आते हैं। ऐसे में इस 'महंगे' दौरे की मंजूरी ने कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गुवाहाटी टूर: शैक्षिक भ्रमण या सरकारी खर्च पर सैर-सपाटा?
नगर निगम की नियमावली के अनुसार, इन दौरों का मूल उद्देश्य पार्षदों को अन्य राज्यों या बड़े शहरों के 'उम्दा विकास मॉडल' से रूबरू कराना होता है। इसका ध्येय यह है कि वहां की बेहतरीन कार्यप्रणालियों और आधुनिक शहरी नीतियों को समझकर उन्हें झांसी की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप लागू किया जा सके। इसी कड़ी में, आगामी 28 मार्च को 9 पार्षदों का एक विशेष दल गुवाहाटी के लिए रवाना होने वाला है, जिसका आधिकारिक लक्ष्य वहां के शहरी विकास मॉडल का गहन अध्ययन करना बताया जा रहा है।
हालांकि, जमीनी हकीकत और अतीत का रिकॉर्ड इस सरकारी दावे से बिल्कुल अलग कहानी बयां करता है। यदि पूर्व में हुए ऐसे तमाम दौरों के परिणामों पर नजर डाली जाए, तो शायद ही किसी पार्षद ने लौटकर झांसी की व्यवस्था सुधारने के लिए कोई ठोस या व्यावहारिक कार्ययोजना प्रस्तुत की हो। स्थानीय गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि ऐसे दौरों के बाद दिए जाने वाले सुझाव अक्सर फाइलों और कागजों तक ही सिमट कर रह जाते हैं। वास्तविकता तो यह है कि इन सुझावों पर कभी गंभीरता से अमल ही नहीं किया गया, जिससे यह 'शैक्षिक भ्रमण' केवल एक औपचारिक सैर-सपाटा बनकर रह जाता है।
पुराने विवाद और वर्तमान आशंकाएं
नगर निगम के इन तथाकथित शैक्षिक दौरों का इतिहास हमेशा से ही विवादों और चर्चाओं के घेरे में रहा है। पूर्व में आयोजित हुए ऐसे कई दौरों में चौंकाने वाले मामले सामने आ चुके हैं, जिन्होंने निगम की शुचिता पर सवाल खड़े किए हैं। अक्सर यह देखा गया है कि महिला पार्षदों के लिए आरक्षित इन दौरों पर उनके स्थान पर उनके पति या अन्य परिजन सरकारी खर्च पर सैर-सपाटा करने निकल जाते हैं। इतना ही नहीं, भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी रही हैं कि कई बार पार्षदों द्वारा बिना यात्रा पर जाए ही यात्रा भत्ते (TA/DA) के नाम पर सरकारी खजाने से पैसा निकालने के गंभीर आरोप भी लगे हैं। सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न इन दौरों की सार्थकता पर लगता है, क्योंकि करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद झांसी की सफाई व्यवस्था या बुनियादी ढांचे में कोई भी क्रांतिकारी या सकारात्मक बदलाव आज तक धरातल पर नजर नहीं आया है।
क्या कहती हैं नगर आयुक्त?
इन तमाम विवादों और वित्तीय तंगी के बीच झांसी की नगर आयुक्त आकांक्षा राणा का पक्ष कुछ अलग है। उनका कहना है कि यह दौरा कोई नया निर्णय नहीं है। गुवाहाटी टूर की मंजूरी काफी समय पहले ही मिल चुकी थी, लेकिन किन्हीं कारणों से यह टल रहा था। अब 9 पार्षदों का यह दल अपनी निर्धारित यात्रा पर जा रहा है ताकि वे वहां के विकास कार्यों को देख सकें।
जनता के सवालों का घेरा
जब नगर निगम 30 करोड़ के कर्ज में डूबा हो और शहर की सड़कें गड्ढों में तब्दील हो रही हों, तब पार्षदों का पर्यटन पर जाना नैतिक रूप से कितना सही है? क्या 9 पार्षदों का यह दल गुवाहाटी से कोई ऐसी जादुई छड़ी लेकर आएगा जो झांसी की तस्वीर बदल देगी, या फिर यह भी पुराने दौरों की तरह केवल सरकारी पैसे की फिजूलखर्ची साबित होगा? यह सवाल आज झांसी की जनता पूछ रही है।
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