शाहपुरा: आधुनिक समय में जहां जन्मदिन मनाने के नाम पर केक काटना, पार्टियां करना और अनावश्यक खर्च करना एक आम चलन बनता जा रहा है, वहीं शाहपुरा के 10 वर्षीय बालक दिव्यांश लोधा ने अपनी सोच, संस्कार और संवेदनशीलता से समाज के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। छोटी सी उम्र में ही दिव्यांश ने यह साबित कर दिया कि सच्ची खुशी दिखावे में नहीं, बल्कि सेवा और परोपकार में होती है।
दिव्यांश ने अपने जन्मदिन को खास बनाने के लिए एक अनोखा संकल्प लिया। उसने अपने माता-पिता रामचरण लोधा और निरमा लोधा से स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह जन्मदिन पर केक काटने या फिजूलखर्ची करने के बजाय समाज और प्रकृति के लिए कुछ अच्छा करना चाहता है। उसकी इच्छा थी कि भीषण गर्मी में प्यास से परेशान बेजुबान पक्षियों के लिए परिंडे लगाए जाएं, ताकि उन्हें पानी मिल सके और उनकी जान बचाई जा सके।
गौरतलब है कि गर्मी के मौसम में जल स्रोतों के सूखने से पक्षियों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में दिव्यांश की यह सोच न केवल सराहनीय है, बल्कि समाज को एक नई दिशा भी देती है। अपने बेटे की इस भावना को सुनकर माता-पिता भी भावुक हो उठे और उन्होंने उसकी इच्छा को पूरा करने का निर्णय लिया।
इसके लिए उन्होंने “जीव दया सेवा समिति” के संयोजक अतू खां कायमखानी से संपर्क किया, जो पिछले 15-20 वर्षों से लगातार पक्षियों के लिए परिंडे लगाने का अभियान चला रहे हैं। जैसे ही समिति को दिव्यांश के इस सराहनीय प्रयास की जानकारी मिली, उन्होंने तुरंत सहयोग के लिए हामी भर दी और पूरे उत्साह के साथ कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत भाणा गणेश मंदिर के बाहर हुई, जहां दिव्यांश का फूलमाला पहनाकर सम्मान किया गया। इसके बाद उसके हाथों से परिंडे लगाए गए और शहर के विभिन्न स्थानों पर उनका वितरण किया गया। “एक मुट्ठी दाना, एक लोटा जल” के संकल्प के साथ इस सेवा कार्य की शुरुआत की गई, जिसने वहां उपस्थित सभी लोगों के मन को भावुक कर दिया।
इस अवसर पर समाज के कई प्रबुद्ध नागरिक, समाजसेवी और विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी मौजूद रहे। सभी ने दिव्यांश को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं और उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। उपस्थित लोगों ने कहा कि ऐसे बच्चों के प्रयासों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि यही बच्चे आगे चलकर समाज में सेवा, संस्कार और मानवता का संदेश फैलाते हैं।
कार्यक्रम के दौरान दिव्यांश लोधा को “जीव दया सेवा समिति” का सबसे छोटा सदस्य भी बनाया गया, जो उसके और उसके परिवार के लिए गर्व का क्षण रहा। इस मौके पर कई गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को और भी गरिमामय बना दिया।
समाज के लोगों ने एक स्वर में कहा कि यदि हर बच्चा दिव्यांश की तरह सोचने लगे और अपने जीवन में सेवा और संवेदना को स्थान दे, तो समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। दिव्यांश का यह प्रयास न केवल एक प्रेरणा है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि भारतीय संस्कृति की असली पहचान सेवा, करुणा और परोपकार में ही निहित है।
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