छत्तीसगढ़ की अनोखी ‘डंगाही होली’, 300 सालों से निभाई जा रही ये परंपरा
खबर सार :-
होली का पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है। लेकिन कई जगहों पर इस पर्व को अलग और अनोखे तरीके से मनाया जाता है। जैसे मथुरा की होली पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है, वहीं कई जगहों पर मथुरा की तरह ही होली का पर्व मनाया जाता है, ऐसे ही छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले में लोग ‘डंगाही होली’ मनाते हैं।
खबर विस्तार : -
जांजगीर-चांपा: छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिला में होली का उत्सव केवल रंगों और गुलाल तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां यह परंपरा, आस्था और लोकविश्वास का अनोखा संगम बनकर सामने आती है। जिला मुख्यालय से लगभग 40–45 किलोमीटर दूर स्थित पंतोरा गांव में मनाई जाने वाली ‘डंगाही होली’ अपनी विशिष्ट परंपरा के कारण प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में चर्चा का विषय बन चुकी है। यहां रंग पंचमी के दिन कुंवारी कन्याएं पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं। यह परंपरा उत्तर प्रदेश के बरसाना की प्रसिद्ध लट्ठमार होली की याद जरूर दिलाती है, लेकिन इसकी मान्यताएं, रीति-रिवाज और धार्मिक स्वरूप पूरी तरह स्थानीय संस्कृति में रचे-बसे हैं।
कुंवारी कन्याएं करती हैं शुभारंभ
पंतोरा गांव में होली के पांचवें दिन, यानी रंग पंचमी को ‘डंगाही होली’ का आयोजन होता है। सुबह से ही गांव में उत्सव जैसा माहौल बन जाता है। पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्रामीण ढोल-नगाड़ों और फाग गीतों के साथ मंदिर परिसर में एकत्र होते हैं। वातावरण में भक्ति, उत्साह और उमंग का अनोखा मिश्रण दिखाई देता है।
इस अनोखी परंपरा की शुरुआत गांव के मां भवानी मंदिर से होती है। पूजा-अर्चना के बाद कुंवारी कन्याएं सबसे पहले देवी-देवताओं पर प्रतीकात्मक रूप से छड़ी मारकर आयोजन का शुभारंभ करती हैं। इसके बाद वे मंदिर के बाहर खड़ी होकर वहां से गुजरने वाले पुरुषों और उपस्थित लोगों पर लाठियां बरसाती हैं। इस दौरान कोई विरोध या आक्रोश नहीं होता, बल्कि लोग इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ स्वीकार करते हैं।
विशेष बांस की छड़ी का महत्व
डंगाही होली के लिए विशेष बांस की छड़ियां तैयार की जाती हैं। ग्रामीणों के अनुसार ये बांस कोरबा जिले के मड़वारानी जंगल से लाए जाते हैं। मान्यता है कि वही बांस शुभ माना जाता है जो एक ही कुल्हाड़ी के वार में कट जाए। इस प्रक्रिया को भी एक तरह की धार्मिक कसौटी माना जाता है।
इन छड़ियों को मां भवानी के समक्ष अभिमंत्रित किया जाता है। गांव के बैगा, जो पारंपरिक पुजारी होते हैं, मंत्रोच्चार के साथ इन्हें सिद्ध करते हैं। इसके बाद ये छड़ियां कुंवारी कन्याओं को सौंपी जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया को अत्यंत पवित्र और विधि-विधान के साथ संपन्न किया जाता है।
बीमारियों से होती है रक्षा
इस परंपरा के पीछे सबसे प्रमुख मान्यता यह है कि अभिमंत्रित छड़ी की मार खाने वाला व्यक्ति पूरे वर्ष बीमारियों से सुरक्षित रहता है। ग्रामीण इसे चोट नहीं, बल्कि माता का आशीर्वाद और प्रसाद मानते हैं। यही कारण है कि गांव के लोग ही नहीं, बल्कि उनके रिश्तेदार और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु भी इस आयोजन में शामिल होने के लिए उत्सुक रहते हैं।
रास्ते से गुजरने वाले राहगीर भी रुककर छड़ी की मार खाना शुभ मानते हैं। इस दौरान माहौल में कहीं भी तनाव या विवाद की स्थिति नहीं बनती। लोग हंसी-खुशी, श्रद्धा और उत्साह के साथ इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं।
पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही परंपरा
गांव की बुजुर्ग महिलाएं, जैसे राम बाई और मुन्नी बाई, बताती हैं कि यह परंपरा लगभग 300 वर्षों से चली आ रही है। उनके अनुसार, गांव की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना से इस आयोजन की शुरुआत हुई थी। समय के साथ कई बदलाव आए, लेकिन इस परंपरा की मूल भावना आज भी अक्षुण्ण है।
नई पीढ़ी भी इस आयोजन में पूरे उत्साह से भाग लेती है। युवतियां इसे अपने सांस्कृतिक दायित्व और गर्व के रूप में देखती हैं। यही कारण है कि आधुनिकता के इस दौर में भी यह परंपरा अपनी पहचान बनाए हुए है और लगातार आगे बढ़ रही है।
सुरक्षा-व्यवस्था के खास इंतजाम
डंगाही होली की प्रसिद्धि बढ़ने के साथ यहां आने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी है। इसे देखते हुए स्थानीय प्रशासन और ग्राम समिति द्वारा सुरक्षा और व्यवस्था के विशेष इंतजाम किए जाते हैं। मंदिर परिसर और मुख्य मार्गों पर स्वयंसेवक तैनात रहते हैं, ताकि आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।
प्राथमिक उपचार की व्यवस्था भी रखी जाती है, हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि अब तक किसी गंभीर चोट की घटना सामने नहीं आई है। लोग सावधानी और संयम के साथ इस परंपरा का पालन करते हैं।
परंपरा और लोकसंस्कृति की पहचान
डंगाही होली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि यह सामुदायिक एकता, आस्था और लोकसंस्कृति का प्रतीक है। जहां देशभर में होली रंगों और गुलाल के साथ खेली जाती है, वहीं पंतोरा गांव की यह लट्ठमार परंपरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती है।
रंग पंचमी के दिन गांव का दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। ढोल की थाप, जयकारों की गूंज, पारंपरिक गीतों की मधुर धुन और आस्था से भरे चेहरों का संगम इस उत्सव को अविस्मरणीय बना देता है।
आज जब परंपराएं धीरे-धीरे बदलती जीवनशैली के बीच कमजोर पड़ रही हैं, तब पंतोरा गांव की डंगाही होली यह संदेश देती है कि यदि आस्था और सामूहिक सहयोग बना रहे, तो सदियों पुरानी परंपराएं भी जीवंत रह सकती हैं। यह अनोखी होली छत्तीसगढ़ की लोक धरोहर का गौरवपूर्ण उदाहरण है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रही है।
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