मानसून सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में विपक्ष का वॉकआउट, बागी सांसदों को बुलाने पर सरकार को घेरा
खबर सार :-
मानसून सत्र से पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक से कई विक्षपी पार्टियों ने वॉकआउट कर दिया। इन दलों ने साफ तौर पर सरकार पर आरोप गया कि केंद्र सरकार ने गैर-मान्यता प्राप्त गुट को बुलाकर संसदीय प्रक्रिया का उल्लंघन किया है।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र से पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक में विपक्षी दलों ने एकजुट होकर सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराया। बैठक के दौरान तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कथित बागी सांसदों को आमंत्रित किए जाने के मुद्दे पर विपक्षी दलों ने वॉकआउट कर दिया। विपक्ष का आरोप है कि जिन सांसदों की अलग पहचान को अभी तक लोकसभा अध्यक्ष की ओर से मान्यता नहीं मिली है, उन्हें बैठक में शामिल करना संसदीय परंपराओं और संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत है।
महुआ मोइत्रा ने दी जानकारी
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में कहा कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके), आम आदमी पार्टी (आप), नेशनल कॉन्फ्रेंस, वामपंथी दलों, शिवसेना (यूबीटी) सहित कई विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर एकजुट होकर बैठक से बाहर निकलने का फैसला किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने एक गैर-मान्यता प्राप्त गुट को सर्वदलीय बैठक में स्थान देकर संसदीय प्रक्रिया का उल्लंघन किया है।
महुआ मोइत्रा ने कहा कि लोकसभा टेबल ऑफिस की आधिकारिक सूची में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसद दर्ज हैं। इसके बावजूद कथित रूप से अलग हुए 20 सांसदों को बैठक में बुलाया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि संसदीय कार्य मंत्री ने किस आधार पर इन सांसदों को आमंत्रित किया, जबकि उनके विलय को अभी तक लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी नहीं मिली है।
उन्होंने बताया कि इन सांसदों के खिलाफ दायर 20 अयोग्यता याचिकाएं अब भी लंबित हैं और इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। मोइत्रा ने यह भी कहा कि संविधान के 91वें संशोधन के बाद किसी अलग गुट को केवल विभाजन के आधार पर मान्यता देने का प्रावधान समाप्त हो चुका है। ऐसे में सरकार का यह कदम संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने भी विपक्ष के वॉकआउट का समर्थन करते हुए सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने संविधान की रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया है। उनके अनुसार, जब किसी मामले में अंतिम संवैधानिक निर्णय नहीं आया है, तब किसी गुट को वैध मानकर उसे आधिकारिक बैठक में शामिल करना पूरी तरह असंवैधानिक है।
कई पार्टियों ने दिखाई एकजुटता
प्रमोद तिवारी ने कहा कि कांग्रेस ने इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और शिवसेना (यूबीटी) के साथ एकजुटता दिखाई है। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और संसदीय परंपराओं का सम्मान करना सरकार की जिम्मेदारी है और किसी भी विवादित मामले में जल्दबाजी से बचना चाहिए।
समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि टीएमसी नेताओं ने बैठक में यह मुद्दा उठाया कि आधिकारिक तृणमूल कांग्रेस सांसदों के बजाय पहले कथित बागी सांसदों की सूची क्यों प्रस्तुत की गई। उनके अनुसार, सरकार का यह रवैया लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है और इससे विपक्ष के बीच असंतोष बढ़ा है।
धर्मेंद्र यादव ने कहा कि विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को केवल टीएमसी का आंतरिक मामला नहीं माना, बल्कि इसे संसदीय व्यवस्था और संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा गंभीर विषय बताया। उन्होंने कहा कि यदि किसी दल के भीतर विभाजन से जुड़े मामलों पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, तो ऐसे समूह को आधिकारिक मान्यता देना उचित नहीं है।
पार्टियों को कमजोर करने आरोप
झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की सांसद महुआ माझी ने भी विपक्ष के वॉकआउट का समर्थन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों को लालच देकर सुनियोजित तरीके से पार्टियों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में बगावत करने वाले सांसदों को भी सर्वदलीय बैठक में बुलाया गया, जबकि उनकी स्थिति को लेकर अभी तक स्पीकर की ओर से अंतिम मान्यता नहीं दी गई है।
महुआ माझी ने बैठक के दौरान परिसीमन के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने कहा कि यदि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन लागू किया गया तो झारखंड जैसे राज्यों में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि यदि केंद्र सरकार यह स्पष्ट आश्वासन दे कि किसी भी राज्य की लोकसभा सीटों में कमी नहीं होगी और सभी राजनीतिक दल इस पर सहमत होंगे, तो उनकी पार्टी अपने रुख पर पुनर्विचार कर सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अब तक इस विषय पर सरकार की ओर से कोई विस्तृत चर्चा या स्पष्ट प्रस्ताव सामने नहीं आया है।
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