Did You Know : माउंट एवरेस्ट को पीछे छोड़ हवाई के जुड़वां ज्वालामुखी बने दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत
खबर सार :-
जानिए क्यों माउंट एवरेस्ट दुनिया का सबसे ऊंचा पर्वत नहीं है और कैसे हवाई के जुड़वां ज्वालामुखी मौना केआ और मौना लोआ कुल ऊंचाई में इसे पीछे छोड़ते हैं।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली : वैज्ञानिक और भौगोलिक जानकारियों के अनुसार, जिसे अब तक दुनिया का सबसे ऊंचा पर्वत माना जाता रहा है, उससे भी अधिक ऊंचाई वाले भू-भाग हमारी पृथ्वी पर मौजूद हैं। हवाई स्थित दो प्रसिद्ध जुड़वां ज्वालामुखी, मौना केआ और मौना लोआ, कुल ऊंचाई के मामले में माउंट एवरेस्ट को पीछे छोड़ चुके हैं। इस तथ्य ने भौगोलिक माप के पारंपरिक तरीकों पर एक बिल्कुल नया दृष्टिकोण सामने रखा है।
पानी के नीचे छिपा है आधे से ज्यादा हिस्सा
इन दोनों ज्वालामुखियों की विशालता का मुख्य कारण उनकी अनोखी भौगोलिक स्थिति है। मौना केआ और मौना लोआ का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्रशांत महासागर के पानी के भीतर डूबा हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इन दोनों पर्वतीय संरचनाओं की कुल ऊंचाई का लगभग 4.2 किलोमीटर हिस्सा पानी के नीचे जलमग्न है। यदि केवल समुद्र तल से ऊपर की दृश्यमान ऊंचाई की बात की जाए, तो वे एवरेस्ट जितने ऊंचे नहीं दिखते, लेकिन कुल आधार से शिखर तक की माप करने पर स्थिति पूरी तरह बदल जाती है।
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माप का नया पैमाना और ऊंचाई की तुलना
भौगोलिक माप के लिहाज से दोनों की तुलना करें तो स्पष्ट आंकड़े सामने आते हैं:
- माउंट एवरेस्ट: इसकी कुल ऊंचाई लगभग 8.8 किलोमीटर मापी गई है।
- हवाई के जुड़वां ज्वालामुखी: मौना केआ और मौना लोआ अपनी पूरी संरचना में 10.2 किलोमीटर की कुल ऊंचाई दर्ज कराते हैं।
जब समुद्र के भीतर छिपे हुए 4.2 किलोमीटर हिस्से को सतह से ऊपर के हिस्से के साथ जोड़ा जाता है, तो कुल माप एवरेस्ट की तुलना में काफी अधिक हो जाती है, जो इसे दुनिया की सबसे लंबी पर्वत संरचनाओं में शामिल करती है।
भौगोलिक पृष्ठभूमि और संरचना
पर्वतों की ऊंचाई को मापने के मुख्य रूप से दो अलग-अलग तरीके होते हैं, एक समुद्र तल से ऊपर की दृश्यमान ऊंचाई और दूसरा आधार से शिखर तक की कुल भौतिक दूरी। माउंट एवरेस्ट अपनी समुद्र तल से ऊपर की ऊंचाई के कारण सबसे ऊंचा माना जाता है, लेकिन जब वास्तविक कुल लंबाई की गणना की जाती है, तो हवाई के मौना केआ और मौना लोआ अपनी विशाल जलमग्न बनावट के कारण आगे निकल जाते हैं। यह जानकारी पृथ्वी की सतह के नीचे छिपी भूवैज्ञानिक संरचनाओं की विशालता को बखूबी दर्शाती है।
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