पीरियड्स लीव पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख ! CJI बोले-ये महिलाओं के लिए 'खतरनाक'... करियर हो सकता है खत्म
खबर सार :-
Supreme Court On Period Leave: सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के लिए मासिक धर्म की छुट्टी पर एक राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग वाली PIL पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इसे कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने से एम्प्लॉयर्स महिलाओं को नौकरी पर रखने से कतरा सकते हैं और इससे लैंगिक रूढ़िवादिता को बढ़ावा मिल सकता है।
खबर विस्तार : -
Supreme Court On Period Leave: कामकाजी महिलाओं और छात्राओं को हर महीने मासिक धर्म के दौरान क्या छुट्टी (period leave) मिलनी चाहिए? इस सवाल पर देश भर में लंबे समय से बहस जारी है। हालांकि अब देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख साफ कर दिया है। देश की सभी कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के पीरियड्स से जुड़ी तकलीफों के लिए अवकाश का प्रावधान बनाने को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार किया है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फ़ैसला उन लोगों के लिए एक बड़ा झटका है जो इसे एक अनिवार्य कानून बनाने की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन अदालत द्वारा दिए गए तर्कों ने इस पूरी बहस को एक नया मोड़ दे दिया है।
याचिका को निपटाते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। इस मुद्दे पर नीति बनाने का फैसला सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, और इस उद्देश्य के लिए सभी संबंधित पक्षों से परामर्श करना ज़रूरी है। CJI जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि अगर कोई कंपनी इस दौरान अपनी मर्ज़ी से छुट्टी दे रही है, तो यह बहुत अच्छी बात है।
चीफ जस्टिस बोले- ये महिलाओं के लिए 'खतरनाक'
CJI सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान एक बहुत ही गंभीर और व्यावहारिक चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कभी-कभी ऐसी याचिकाएं एक ऐसा माहौल बना देती हैं जिसमें महिलाओं को 'कमजोर' या 'कमतर' के तौर पर दिखाया जाता है। कोर्ट का मानना है कि पीरियड्स के दौरान ऐसी अनिवार्य छुट्टी (period leave) देने से यह डर पैदा हो सकता है कि महिलाओं के साथ कुछ 'बुरा' हो रहा है। चीफ जस्टिस ने चेतावनी दी कि अगर ऐसी व्यवस्था को अनिवार्य कर दिया गया, तो हो सकता है कि नियोक्ता (Employers) महिलाओं को ज़िम्मेदार पदों पर रखने से हिचकिचाएं। उन्हें डर होगा कि अनिवार्य मासिक छुट्टी से काम पर असर पड़ेगा, जिससे आखिरकार महिलाओं के करियर और तरक्की को नुकसान पहुंचेगा।
याचिका में दिए गए तर्क
याचिका में यह तर्क दिया गया कि जहां गर्भावस्था के दौरान छुट्टी का प्रावधान है, वहीं मासिक धर्म के लिए ऐसा कोई प्रावधान मौजूद नहीं है। इसमें आगे यह भी कहा गया कि चूंकि कुछ राज्य और कंपनियां पहले से ही हर महीने महिला कर्मचारियों को मासिक धर्म की दो दिन की छुट्टी दे रही हैं, इसलिए सभी राज्यों को इसी तरह के नियम बनाने का निर्देश दिया जाना चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई भी निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- कोई अपनी मर्ज़ी से छुट्टी दे तो अच्छी बात
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे के आर्थिक पहलुओं पर भी गंभीर सवाल उठाए। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कारोबारी नज़रिए से सवाल किया कि क्या कोई कंपनी या एम्प्लॉयर ऐसे कानून से खुश होगा? न्यायिक सेवाओं का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अगर ऐसे नियम लागू होते हैं, तो महिलाओं को अहम मुकदमों या भारी काम से छूट दी जा सकती है। कोर्ट ने दलील दी कि समानता की लड़ाई में ऐसी रियायतें महिलाओं के लिए रोज़गार के मौके कम कर सकती हैं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि अगर कोई कंपनी इस दौरान अपनी मर्ज़ी से छुट्टी दे रही है, तो यह बहुत अच्छी बात है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने इस विषय पर अपना पक्ष पहले ही केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत कर दिया था। इसलिए, मंत्रालय को सभी संबंधित पक्षों से परामर्श करने के बाद इस मुद्दे पर एक उचित नीति बनाने पर विचार करना चाहिए।
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