बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा, 3 दिसंबर को सुनवाई

खबर सार :-

सु्प्रीम कोर्ट ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने और उन्हें आनलाइन खतरों से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। इस पर अगली सुनवाई 3 दिसंबर को होगी।
बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बैन की मांग पर केंद्र से मांगा जवाब

खबर विस्तार : -

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को नोटिस जारी कर उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने और उन्हें ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए सख्त नियम बनाने की मांग की गई है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इसे एक गंभीर मामला बताया है। मामले की अगली सुनवाई 3 दिसंबर को होगी।

बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाना केंद्र—राज्य की जिम्मेदारी 

यह पिटीशन सुप्रीम कोर्ट में एमरल्ड हाइट्स इंटरनेशनल स्कूल और उसके डायरेक्टर ने फाइल की थी। पिटीशन में कहा गया है कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाना राज्य और केंद्र दोनों सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी है। सोशल मीडिया की वजह से बच्चे कई तरह की मानसिक और शारीरिक परेशानियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बैन लगाना ही एकमात्र व्यवहारिक विकल्प है। याचिकाकर्ता ने बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया इस्तेमाल के संभावित असर को लेकर गहरी चिंता जतायी है। याचिका में कहा गया है कि बिना रूकावट के सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से डिप्रेशन, घबराहट, चिंता, भावनात्मक परेशानी और आत्मसम्मान में कमी जैसी समस्या हो सकती हैं।

बच्चों के मानसिक—शारीरिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा 

इसके अलावा, याचिका में बच्चों के व्यवहार से जुड़ा डेटा इकट्ठा करने और ऐसे प्लेटफॉर्म डिजाइन इस्तेमाल करने का मुद्दा उठाया गया है जिनका मकसद बच्चों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर व्यस्त रखना है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इनमें से कुछ खतरे तुरंत पता नहीं चलते और अक्सर माता-पिता या शिक्षक को तब तक पता नहीं चलता जब तक काफी नुकसान नहीं हो चुका होता। सोशल मीडिया और स्मार्टफोन का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रहा है और इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह नोटिस ज़रूरी माना जा रहा है। कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि लगभग 37 प्रतिशत बच्चे डिप्रेशन, घबराहट और साइबरबुलिंग (ऑनलाइन हैरेसमेंट) से परेशान हैं। लगभग 12 से 13 साल के बच्चों में सोशल मीडिया की वजह से घबराहट और डिप्रेशन का खतरा दोगुना हो जाता है।

यह है पूरा मामला 

यह पूरा मामला जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस (जेआरसीए) की फाइल की गई याचिका से जुड़ा है। संगठन का दावा है कि सुप्रीम कोर्ट के 23 सितंबर, 2024 के फैसले को ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है। अपने 2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि सोशल मीडिया कंपनियां सिर्फ आईटी एक्ट का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। अगर उनकी साइट्स पर बच्चों के शोषण वाला कंटेंट मिलता है, तो उन्हें तुरंत नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड अब्यूज्ड चिल्ड्रन (एनसीएमईसी) के साथ-साथ स्थानीय पुलिस या स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट को इसकी रिपोर्ट करनी होगी।

मानवाधिकार आयोग की यह है चिंता 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस ढिलाई पर कड़ी आपत्ति जताई है। आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने सवाल किया कि सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों के यौन शोषण के मामलों की रिपोर्ट पुलिस को करने में क्यों हिचकिचाती हैं। आयोग ने इस बात का भी संज्ञान लिया है कि इस तरह के आपत्तिजनक कंटेंट को इंस्टाग्राम पर विज्ञापनों के जरिए प्रमोट किया जा रहा है और टेलीग्राम चैनल पर भेजकर उपयोगकर्ताओं को बेचा जा रहा है।

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