कभी नक्सली एरिया कमांडर रहे, अब परिवार के साथ सामान्य जीवन जी रहे
खबर सार :-
बलरामपुर के सीताराम सोनवानी कभी गरीबी और बेरोजगारी के कारण हिंसा का रास्ता चुनने के लिए मजबूर हुआ था। जब उसने हिंसा का रास्ता त्यागा तो, सरकार ने भी मदद की। कुछ महीने जेल में बिताए और फिर पुनर्वास के अवसर मिले। सीताराम कभी उत्तरी छत्तीसगढ़ में एक नक्सली संगठन में अहम जिम्मेदारी संभालते थे।
खबर विस्तार : -
बलरामपुर, बलरामपुर जिले के चलगली थाना क्षेत्र में भी नक्सलियों की पहुंच रही है। यहां के गम्हरिया गांव के रहने वाले 48 वर्षीय सीताराम सोनवानी उत्तरी छत्तीसगढ़ में एक नक्सली संगठन के एरिया कमांडर थे। वह बलरामपुर जिले में हुई कई नक्सली घटना में शामिल भी थे। इन दिनों वह संगठन से नहीं जुड़े हैं। उन्होंने हथियार छोड़ने के बाद अपने परिवार के साथ एक सामान्य जीवन जीना पसंद किया हैं। अब वह सीताराम संगठन से दूर रहकर ज्यादा खुश हैं।
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छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की लड़ाई चली
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ लंबे समय से सरकार की लड़ाई चली। लंकिन अब वह खत्म हो गई है। 24 अगस्त 2024 को बस्तर दौरे के दौरान, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जनता के बीच खुशखबरी सुनाई थी। उन्होंने 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने का संकल्प लिया था। इसके बाद, सुरक्षा बलों ने लगातार अभियान चलाकर नक्सलियों की कमर तोड़ दी। ताबड़तोड़ कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। जिन्होंने हथियार डालने से इनकार किया, वे मुठभेड़ों में मारे गए। उत्तरी छत्तीसगढ़ तो नक्सल प्रभावित रहा है। वह कभी नक्सली गतिविधियों से कराह रहा था। अब इस खतरे से मुक्त हो चुका है।
इसी पृष्ठभूमि में, बलरामपुर जिले से एक व्यक्ति की सत्य घटना सामने आई है। इसकी जिंदगी एक कहानी सी बन गई। परन्तु उसने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटकर यह जरूर बताया है कि जिंदगी सत्य एवं कर्म के मार्ग पर चलने को कहते हैं। सीताराम सोनवानी ने बताया कि 1990 के आसपास, उनका इलाका भीषण गरीबी और बेरोजगारी की चपेट में था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। अपने परिवार के हालात सुधारने की उम्मीद में, वह 1998 में माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया के लोगों से मिल और हथियार उठा लिए।
2004 में फिर गोवर्धनपुर में पुलिस के साथ एक मुठभेड़ हुई
बाद में संगठन माओइस्ट हो गया। संगठन में तरक्की भी होती थी। उनकी जिम्मेदारियां बढ़ीं और उत्तरी छत्तीसगढ़ के लिए एरिया कमांडर बना दिया गया। सीताराम बताते हैं कि 2003 का दौर बड़ा सबक सिखाने वाला रहा। मन वहीं से बदल रहा था। अब निकल जाएं कि कब निकल जाएं? यही चलता रहा। उसी दौर में त्रिकुंडा पुलिस से मरमा चौकी के पास मुठभेड़ हुई थी। उस समय एसपी शिवराम प्रसाद कल्लूरी के पैर में गोली लग गई थी। इस घटन में नक्सली संगठन के दो सदस्य मारे गए थे। 2004 में फिर गोवर्धनपुर में पुलिस के साथ एक मुठभेड़ हुई। इसमें उनका साथी शंकर यादव पकड़ा गया।
इसके बाद मन भर चुका था। 2005 में नक्सली संगठन छोड़कर अपनी पत्नी विराजो के साथ असम चले गए। जोरहाट जिले में नेकी के रास्ते पर चले। 16 वर्षों तक मजदूर की। इसी तरह से अपनी आजीविका चलाई। इन सालों में सुरक्षा के लिहाज से दूर-दूर ही रहता था। कभी संगठन का डर तो कभी पुलिस का डर था। कोविड-19 महामारी के दौरान, उन्हें समाचार पत्रों के माध्यम से सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के बारे में पता चला। उनकी पत्नी ने भी उनसे बार-बार हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन में लौटने का आग्रह किया। बाद में पत्नी की बात मान ली। सरकार उस समय पुनर्वास नीति चला रही थी।
बलरामपुर जिले में कुल 24 पूर्व नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया
इसी समय 26 फरवरी 2021 को तत्कालीन एसपी रामकृष्ण साहू के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। सीताराम ने लगभग 14 महीने रामानुजगंज जेल में बिताए और फिर उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। सरकार की पुनर्वास योजना के तहत, उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से एक पक्का घर मिला। कभी वह जंगलों में रहते थे, अब अपने परिवार के साथ घर में रह रहे हैं। बुधवार को बलरामपुर के पुलिस रिजर्व परेड ग्राउंड में पुलिस स्मृति दिवस (पुलिस कमेमोरेशन डे) मनाया गया। इस कार्यक्रम के दौरान, आत्मसमर्पण करके मुख्यधारा में लौटने वाले पूर्व नक्सलियों को लंबे समय से लंबित प्रोत्साहन राशि वितरित की गई। जिले के एसपी वैभव बैंकर ने बताया कि बलरामपुर जिले में कुल 24 पूर्व नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है।
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