वर्ल्ड बैंक का कर्ज: क्या भारत ने पाकिस्तान को कर्ज के मामले में पीछे छोड़ दिया है? जानिए सच।
खबर सार :-
वर्ल्ड बैंक के कर्ज के आंकड़ों को लेकर भारत और पाकिस्तान की तुलना करना क्यों बेमानी है? जानें क्या है आर्थिक सच और क्यों सिर्फ कर्ज की रकम से नहीं मापी जा सकती देश की साख।
खबर विस्तार : -
New Delhi : हाल ही में सोशल मीडिया पर एक बहस छिड़ी कि क्या वर्ल्ड बैंक का कर्ज भारत ने पाकिस्तान से कहीं ज्यादा ले लिया है? टीएमसी के पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार के एक दावे के बाद से यह चर्चा आम हो गई है। लेकिन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को समझने का नजरिया अगर सिर्फ लिए गए उधार की रकम तक सीमित रहे, तो वह पूरी सच्चाई से कोसों दूर है। आइए, इसे आंकड़ों और जमीनी हकीकत के आईने में देखते हैं।
उधार लेना मजबूरी या विकास की रणनीति?
यह सच है कि वर्ल्ड बैंक के रिकॉर्ड में भारत का आउटस्टैंडिंग कर्ज पाकिस्तान के मुकाबले कहीं ज्यादा है। लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि वर्ल्ड बैंक से कर्ज लेने का मतलब सिर्फ दिवालियापन नहीं होता, बल्कि यह देश की विकास परियोजनाओं की भूख को भी दर्शाता है। भारत 1949 से ही वर्ल्ड बैंक के साथ जुड़ा है। उस वक्त से लेकर आज तक, हमने रेलवे से लेकर गंगा की सफाई और रिन्यूएबल एनर्जी तक के लिए फंड जुटाया है। जब कोई देश तेजी से आगे बढ़ रहा होता है, तो उसे अपनी ढांचागत जरूरतों को पूरा करने के लिए सस्ते अंतरराष्ट्रीय कर्ज की जरूरत पड़ती है। भारत की अर्थव्यवस्था का आकार पिछले कई दशकों में जिस तरह से बढ़ा है, उसे देखते हुए वर्ल्ड बैंक का कर्ज भारत ने पाकिस्तान के तुलनात्मक आंकड़ों में अधिक दिखना महज एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
अर्थव्यवस्था का आकार बनाम कर्ज का बोझ
भारत और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना करना कुछ वैसा ही है जैसे एक हाथी की भूख की तुलना एक बिल्ली की भूख से करना। आज भारत की जीडीपी करीब 4 ट्रिलियन डॉलर के करीब है, जबकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इससे लगभग दस गुना छोटी है। जब आप अपनी जीडीपी के मुकाबले कर्ज के प्रतिशत को देखते हैं, तभी असली तस्वीर सामने आती है।
अक्सर यह गलतफहमी फैल जाती है कि जिस देश ने ज्यादा डॉलर लिए हैं, वह ज्यादा कर्जदार है। हकीकत यह है कि भारत के लिए वर्ल्ड बैंक का कर्ज भारत ने पाकिस्तान की तुलना में अधिक लिया जरूर है, लेकिन भारत की रीपेमेंट क्षमता, विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक निवेशकों का भरोसा पाकिस्तान से कहीं ज्यादा मजबूत है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी देश की साख सिर्फ इस पर तय नहीं होती कि उसने कितना लोन लिया, बल्कि इस पर तय होती है कि वह उसे लौटाने और अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने में कितना सक्षम है।
भ्रम और आंकड़ों का मायाजाल
प्रसार भारती के पूर्व सीईओ के ट्वीट के बाद से लोगों में यह डर बैठ गया कि शायद भारत गलत दिशा में जा रहा है। पर तथ्य यह है कि भारत का वर्ल्ड बैंक कर्ज 2020 के मुकाबले 2026 में 13 प्रतिशत कम हुआ है। यह कमी दर्शाती है कि भारत अब अपने आंतरिक संसाधनों और निजी क्षेत्र की मदद से विकास को गति दे रहा है। अगर हम चीन या इंडोनेशिया जैसे देशों को देखें, तो वहां भी प्रोजेक्ट कमिटमेंट के आंकड़े काफी बड़े हैं। यह एक वैश्विक वित्तीय प्रणाली का हिस्सा है। वर्ल्ड बैंक का कर्ज भारत ने पाकिस्तान से ज्यादा लिया, इसका मतलब यह नहीं है कि हम आर्थिक संकट में हैं। यह केवल यह बताता है कि भारत की विकास परियोजनाएं बड़े स्तर की हैं और वर्ल्ड बैंक उन्हें प्राथमिकता दे रहा है। पाकिस्तान के साथ इसकी तुलना केवल आंकड़ों की बाजीगरी है, जो बुनियादी आर्थिक सिद्धांतों को नजरअंदाज करती है।
सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत
हमें यह समझना होगा कि वर्ल्ड बैंक का कर्ज भारत ने पाकिस्तान के मुकाबले भले ही संख्या में अधिक ले रखा हो, लेकिन यह कर्ज हमारी विकास गाथा का एक हिस्सा है। आज भारत जिस तरह से इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी में निवेश कर रहा है, उसके लिए अंतरराष्ट्रीय फंडिंग एक ईंधन की तरह काम करती है। किसी भी जिम्मेदार नागरिक को सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले आधे-अधूरे आंकड़ों से बहकने के बजाय, आर्थिक स्थिति के बड़े पहलुओं, जैसे जीडीपी अनुपात और विकास दर को देखना चाहिए। भारत की अर्थव्यवस्था आज पूरी मजबूती के साथ वैश्विक पटल पर खड़ी है, और यह कर्ज उसी विकास का एक छोटा सा हिस्सा है, न कि कोई बोझ।
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