West Asia Crisis: भारतीय विमानन उद्योग की रिकवरी पर बढ़ा दबाव, महंगे ईंधन ने रोकी उड़ानों की रफ्तार

खबर सार :-
West Asia Crisis, महंगे ईंधन और कमजोर रुपये की वजह से भारतीय विमानन उद्योग फिलहाल कठिन दौर से गुजर रहा है। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों बाजारों में मांग पर दबाव बना हुआ है, जबकि परिचालन लागत लगातार बढ़ रही है। Airlines क्षमता समायोजन और मार्ग परिवर्तन जैसे कदम उठा रही हैं, लेकिन मौजूदा हालात में विमानन क्षेत्र की पूर्ण रिकवरी में अभी समय लग सकता है।
West Asia Crisis: भारतीय विमानन उद्योग की रिकवरी पर बढ़ा दबाव, महंगे ईंधन ने रोकी उड़ानों की रफ्तार
खबर विस्तार : -

Aviation Crisis 2026: भारतीय विमानन क्षेत्र को महामारी के बाद पटरी पर लौटाने की कोशिशों के बीच पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भू-राजनीतिक तनाव, महंगे ईंधन और कमजोर होते रुपये के कारण एयरलाइंस की परिचालन लागत बढ़ रही है, जबकि यात्रियों की मांग अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है। इसका सीधा असर विमानन क्षेत्र की रिकवरी और एयरलाइंस की लाभप्रदता पर दिखाई दे रहा है।

‘Aviation Tracker’ Report: अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के उपयोग में कमी

इक्विरस सिक्योरिटीज की नवीनतम ‘एविएशन ट्रैकर’ रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल 2026 के दौरान भारतीय एयरलाइंस का अंतरराष्ट्रीय यात्री यातायात दबाव में बना रहा। इस अवधि में लगभग 18 लाख यात्रियों ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का उपयोग किया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 39 प्रतिशत कम रहा। वहीं मार्च 2026 की तुलना में भी इसमें करीब 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय यात्रा गतिविधियों को मापने वाला प्रमुख संकेतक रेवेन्यू पैसेंजर किलोमीटर (आरपीके) भी सालाना आधार पर लगभग 33 प्रतिशत घटकर 7.2 अरब रह गया। उड़ानों की संख्या में भी करीब 37 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि मासिक आधार पर कुछ सुधार देखने को मिला, लेकिन यह क्षेत्र अभी भी चुनौतियों से पूरी तरह उबर नहीं पाया है।

ASK Decline: सालाना आधार पर लगभग 28 प्रतिशत की कमी

एयरलाइंस ने मांग में कमजोरी को देखते हुए अपनी क्षमता में कटौती जारी रखी। अवेलेबल सीट किलोमीटर (एएसके) में सालाना आधार पर लगभग 28 प्रतिशत की कमी आई। इसके बावजूद यात्रियों की मांग क्षमता में कटौती से भी अधिक कमजोर रही, जिससे पैसेंजर लोड फैक्टर (पीएलएफ) घटकर करीब 75.5 प्रतिशत पर पहुंच गया। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में 6.17 प्रतिशत अंक और मार्च 2026 की तुलना में 7.35 प्रतिशत अंक कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय यात्रा पैटर्न को प्रभावित किया है। कई यात्रियों ने अपनी यात्रा योजनाओं में बदलाव किया है, जबकि कुछ एयरलाइंस को परिचालन मार्गों में भी संशोधन करना पड़ा है। इससे नेटवर्क संचालन और यात्री संख्या दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

Rising Fuel Costs: ब्रेंट क्रूड की कीमतों में बढ़ोतरी

विमानन उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ईंधन की बढ़ती लागत है। रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2026 में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत लगभग 92 डॉलर प्रति बैरल रही, जो एक वर्ष पहले की तुलना में 44 प्रतिशत अधिक है। वहीं सिंगापुर जेट फ्यूल की कीमत 128 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो सालाना आधार पर 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाती है। ईंधन एयरलाइंस के कुल परिचालन खर्च का बड़ा हिस्सा होता है, ऐसे में इसकी कीमतों में वृद्धि कंपनियों के मुनाफे पर सीधा असर डाल रही है।

इस स्थिति को और जटिल बनाने वाला एक अन्य कारक भारतीय रुपये की कमजोरी है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 95 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 11 प्रतिशत कमजोर है। चूंकि विमान लीज, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और कई अन्य खर्च डॉलर में होते हैं, इसलिए रुपये की कमजोरी एयरलाइंस की लागत को और बढ़ा रही है।

Domestic Aviation Sector: घरेलू य़ात्रियों की संख्या में गिरावट

घरेलू विमानन क्षेत्र भी पूरी तरह अछूता नहीं रहा है। अप्रैल 2026 में घरेलू यात्री संख्या घटकर करीब 1.39 करोड़ रह गई, जो सालाना आधार पर 3 प्रतिशत और मासिक आधार पर 4 प्रतिशत कम है। हालांकि एयरलाइंस ने क्षमता विस्तार जारी रखा और उपलब्ध सीट किलोमीटर में करीब 3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, लेकिन मांग अपेक्षा से कमजोर रहने के कारण सीट उपयोग दर में गिरावट देखने को मिली।

ATF Prices: एयरलाइंस की चिंता बढ़ी

देश में एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) की कीमतें भी एयरलाइंस की चिंता बढ़ा रही हैं। अप्रैल के दौरान एटीएफ की कीमत लगभग 1.05 लाख रुपये प्रति किलोलीटर रही, जो पिछले वर्ष की तुलना में 18 प्रतिशत और पिछले महीने की तुलना में 9 प्रतिशत अधिक है। हालांकि सरकार के कुछ हस्तक्षेपों के कारण वैश्विक ईंधन महंगाई का पूरा बोझ यात्रियों पर नहीं डाला गया, लेकिन एयरलाइंस की वित्तीय स्थिति पर इसका दबाव बना हुआ है।

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