मिर्ज़ापुरः सरकार के निर्देश और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पवन कुमार गंगवार की गाइडेंस में, जिले में मनाए जा रहे राष्ट्रीय एकता हफ़्ते के तीसरे दिन, भाषाई सद्भाव दिवस के मौके पर जी.डी. बिनानी PG कॉलेज के ऑडिटोरियम में एक कविता गोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत मेहमानों ने सरस्वती की तस्वीर पर माल्यार्पण करके की। मशहूर साहित्यकार गणेश गंभीर, राजेंद्र तिवारी उर्फ लल्लू तिवारी, डॉ. अनुराधा ओस, खुर्शीद भारती, हेलाल मिर्ज़ापुरी, इरफ़ान कुरैशी, प्रो. वंदना मिश्रा और पत्रकार कृष्ण गोपाल वर्मा ने अपनी शानदार मौजूदगी और लेखों से दर्शकों का मन मोह लिया। कॉलेज के स्टूडेंट्स ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, कविताएं पढ़ीं और राष्ट्रीय एकता पर भाषण दिए। मौजूद लोगों में श्रुति चतुर्वेदी, तनवीर आलम, अन्नू, अदिति तिवारी, त्रिशा पाठक, राज झा, अखिलेश कुमार, आदर्श दुबे और नितिन तिवारी शामिल थे।
प्रोग्राम में सरस्वती वंदना त्रिशा पाठक ने की, जिसे प्रो. वंदना मिश्रा ने कंडक्ट और कोऑर्डिनेट किया। इस मौके पर कई मशहूर कवियों ने अपनी रचनाएं पेश कीं, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कवियों ने देशभक्ति, एकता और सद्भावना पर आधारित अपनी कविताएं सुनाईं, जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा। इस मौके पर कवि राजेंद्र तिवारी उर्फ लल्लू तिवारी ने अपनी कविता के जरिए सुनाया, "प्यार कच्चा नहीं होता, हर ताज जड़ा नहीं होता, ये तो मौके की बात है, वरना कोई छोटा या बड़ा नहीं होता..." कवि गणेश गंभीर ने अपनी कविता के जरिए सुनाया, "रंग-बिरंगे फूल बाग की शान बन गए, चांद-तारे नीले आसमान की शान बन गए और हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी अपनी जान देकर देश की शान बन गए।"
कवि इरफान कुरैशी ने सुनाया, "बिनानी की धरती को सलाम करता हूं, दिल से करता हूं तेरा सम्मान, कुछ वक्त चुराया है मैंने अपनी जिंदगी से, ये शाम एकता को समर्पित करता हूं..." कवि खुर्शीद भारती ने अपनी कविता के जरिए सुनाया, "पता नहीं किस डर ने मेरे गांव पर पहरा दिया है, बहुत दिनों से कोई घर से निकला नहीं है..." कवि अनुराधा ओस ने अपनी कविता के जरिए सुनाया, "एक ही चाहत काफी है अंधेरे से लड़ने के लिए, एक ही चिंगारी काफी है रूह में आग भरने के लिए..." कवि डॉ. वंदना मिश्रा ने कहा, "सच कहूँ तो, क्या तुम्हें कभी वो लड़की याद आती है जो कच्चे नारियल की तरह अपनी दूधिया मुस्कान की रोशनी फैलाती है, और मैं उसके छोटे बालों की घनी छाँव में बैठकर सोचता हूँ..." हेलाल मिर्ज़ापुरी ने अपनी कविता सुनाई, "जिस सुबह का हमें इंतज़ार था, वो नहीं आई; अब 21वीं सदी हमारे सामने है..."
प्रोग्राम को वसीम अकरम अंसारी ने मिलकर ऑर्गनाइज़ किया। प्रिंसिपल प्रोफेसर अशोक कुमार सिंह ने धन्यवाद दिया। प्रोग्राम में कॉलेज के सभी प्रोफेसर और स्टाफ़ मौजूद थे।
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