नई दिल्ली : “हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें। भेदभाव अपने दिल से साफ कर सकें, दोस्तों से भूल हो तो माफ कर सकें, झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें, दूसरों की जय से पहले खुद को जय करें। देशभर के स्कूलों के इस प्रार्थना गीत की पंक्तियां आज भी मन को भीतर तक छूती हैं और उसी विशिष्ट स्वर की याद दिलाती हैं, जिसे ‘आधुनिक भारत की मीरा’ के रूप में पहचान मिली। यह स्वर था मधुरता और भावनाओं से भरपूर गायिका वाणी जयराम का।
वाणी जयराम की आवाज में भक्ति, करुणा और आत्मिक शांति का ऐसा संगम है, जिसने पीढ़ियों तक श्रोताओं के मन पर अमिट छाप छोड़ी। शास्त्रीय संगीत की गहरी समझ और सहज भाव-प्रस्तुति के कारण उनके गीत केवल सुने नहीं जाते, बल्कि महसूस किए जाते हैं। 30 नवंबर 1945 को तमिलनाडु के वेल्लोर में जन्मी वाणी जयराम को बचपन से ही शास्त्रीय संगीतज्ञ परिवार का माहौल मिला।
वाणी जयराम का असली नाम कलाईवाणी था। उन्होंने कदलुर श्रीनिवास अयंगर, टीआर बालासुब्रमण्यम और आरएस मणि के मार्गदर्शन में औपचारिक कर्नाटक संगीत प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने पटियाला घराने के उस्ताद अब्दुल रहमान खान से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण लिया।
मात्र 8 साल की उम्र में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो मद्रास में अपनी सार्वजनिक परफॉरमेंस दी। उनका संगीत करियर 1971 में फिल्म 'गुड्डी' से शुरू हुआ। इस फिल्म का गीत 'बोले रे पपीहरा' देशभर में लोकप्रिय हुआ। उसी फिल्म का गीत 'हमको मन की शक्ति देना' स्कूलों में सुबह का प्रार्थना गीत बन गया, जिसने उनकी आवाज को और भी जनप्रिय बना दिया। "मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाके सर मोर मुकुट मेरो पति सोई, मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, 1982 की फिल्म 'मीरा' का यह गीत भी बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसे वाणी जयराम ने अपनी आवाज दी थी।
उनकी आवाज की मधुरता, शुद्धता और सहजता ने एक अलग पहचान बनाई। वाणी जयराम सिर्फ एक गायिका ही नहीं थीं, बल्कि वह एक ऐसी आवाज थीं, जिन्होंने संगीत को जीवंत एहसास और भावनाओं का स्वरूप दिया। वाणी जयराम ने एक हजार से अधिक भारतीय फिल्मों में 20,000 से ज्यादा गाने गाए। इसके अलावा, उन्होंने हजारों भक्ति गीत और निजी एल्बम भी रिकॉर्ड किए।
उनकी काबिलियत और शक्ति को इसी से पहचाना जा सकता है कि भारत में अधिकतर बोली जाने वाली भाषाएं, चाहे वह हिंदी हो या तमिल, तेलुगु, मलयालम, मराठी, उड़िया, संस्कृत, गुजराती, हरियाणवी, असमिया, कश्मीरी, भोजपुरी, मारवाड़ी, उर्दू, पंजाबी और बंगाली, सभी में वाणी जयराम ने अपनी छाप छोड़ी।
उनकी गायन क्षमता और किसी भी कठिन रचना को सहजता से निभाने की कला ने उन्हें पूरे भारत में सम्मान दिलाया। 4 फरवरी 2023 का दिन हर हिंदुस्तानी के लिए दुखद था, क्योंकि हर देशवासी उस 'आधुनिक भारत की मीरा' को खो चुका था। वाणी जयराम का निधन चेन्नई के नुंगमबक्कम स्थित उनके आवास पर हुआ था।
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