Green-Crackers : हर साल दीपावली की रात रंग-बिरंगी रोशनी के साथ-साथ धुएं और शोर से भी सराबोर हो जाती है। पारंपरिक पटाखों में सल्फर, बेरियम नाइट्रेट, एंटीमोनी सल्फाइड, एल्यूमिनियम जैसे खतरनाक रसायन मिलाए जाते हैं, जो जलने पर जहरीली गैसें छोड़ते हैं। इनसे न केवल वायु की गुणवत्ता प्रभावित होती है बल्कि दिल के मरीजों, बच्चों और पक्षियों के लिए भी खतरनाक स्थिति बन जाती है।
ग्रीन पटाखे पारंपरिक पटाखों की तुलना में पर्यावरण के लिए कहीं अधिक सुरक्षित विकल्प हैं। इनमें ऐसे रसायनों का प्रयोग नहीं किया जाता जो वायुमंडल को गंभीर रूप से प्रदूषित करें। इन पटाखों में एल्युमिनियम, बेरियम और पोटेशियम नाइट्रेट जैसे तत्वों की जगह कम हानिकारक यौगिकों का इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि इनसे निकलने वाला धुआं और आवाज दोनों ही सीमित होते हैं। ग्रीन पटाखों का निर्माण वैज्ञानिक विधियों से किया जाता है, जिसमें प्रदूषण को कम करने वाले यौगिकों का चयन होता है। इनमें नाइट्रेट की मात्रा नियंत्रित होती है और ध्वनि स्तर भी तय सीमा में रखा जाता है। इनका आकार छोटा होता है और ये हल्की आवाज के साथ रंगीन रोशनी उत्पन्न करते हैं।
दिल्ली सरकार ने इस बार दीपावली पर ग्रीन पटाखों की अनुमति दी है। यह निर्णय वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग पारंपरिक पटाखों की जगह ग्रीन विकल्प अपनाएं, तो त्योहार की खुशी के साथ पर्यावरण की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है। हालांकि ग्रीन पटाखे सामान्य पटाखों से थोड़े महंगे होते हैं, लेकिन इनकी बढ़ती मांग के चलते अब ये बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं। कई कंपनियां इन्हें ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बेच रही हैं। दीपावली पर ग्रीन पटाखों का उपयोग न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी है, बल्कि यह एक जिम्मेदार नागरिक होने का प्रतीक भी है। यदि हम अपनी परंपराओं को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ें, तो त्योहारों की चमक और प्रकृति की शुद्धता दोनों को बनाए रखा जा सकता है।
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