नई दिल्ली: वैश्विक राजनीति के मंच पर युद्ध की आहट ने एक बार फिर भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती खड़ी कर दी है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल खाड़ी देशों में अस्थिरता पैदा की है, बल्कि भारत की तेल आपूर्ति श्रृंखला के लिए भी खतरे की घंटी बजा दी है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) द्वारा 28 मार्च, 2026 को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण **स्ट्रेट ऑफ होर्मुज** को बंद करने के ऐलान ने भारत सरकार और तेल कंपनियों की धड़कनें तेज कर दी हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकरा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण जलमार्ग है। यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। भारत के लिए इसकी अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के कुल कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से आता है। सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देशों से होने वाला व्यापार इसी जलडमरूमध्य पर निर्भर है। यदि यह मार्ग बंद होता है, तो भारत की तेल और गैस आपूर्ति पूरी तरह ठप हो सकती है।
पश्चिम एशिया में गहराते संकट को देखते हुए भारत सरकार अब एक 'कंटिंजेंसी प्लान' यानी आकस्मिक रणनीति पर काम कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, अगर खाड़ी देशों से सप्लाई बाधित होती है, तो भारत **रूस से कच्चे तेल** की खरीद में भारी बढ़ोतरी कर सकता है। रूसी तेल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी डिलीवरी के लिए भारत को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, जिससे सप्लाई सुरक्षित बनी रहती है।
रूस और भारत के बीच कच्चे तेल के व्यापारिक समीकरणों में पिछले कुछ समय में बड़े उतार-चढ़ाव देखे गए हैं। कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म 'केप्लर' द्वारा जारी हालिया डेटा इस बात की तस्दीक करता है कि भारतीय बाजार में रूसी तेल की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जहाँ वर्ष 2025 में भारत रूस से औसतन 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात कर रहा था, वहीं फरवरी 2026 तक आते-आते यह आंकड़ा घटकर महज 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर सिमट गया है।
आयात की इस सुस्त रफ्तार का असर भारतीय बंदरगाहों पर होने वाली तेल की लोडिंग पर भी साफ दिखाई दे रहा है। पिछले साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो रूसी कच्चे तेल की लोडिंग का औसत 1.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, जो अब भारी गिरावट के साथ केवल 0.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है। यह गिरावट न केवल बदलती भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाती है, बल्कि अमेरिका के साथ हुई व्यापारिक वार्ताओं और टैरिफ नीतियों के प्रभाव को भी उजागर करती है। हालांकि, मौजूदा वैश्विक संकट और खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि भारत एक बार फिर इन आंकड़ों को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है।
हाल के महीनों में अमेरिका के साथ व्यापारिक वार्ताओं और रूसी तेल पर लगाए गए 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ के कारण भारत ने रूस से दूरी बनाई थी। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय सामानों पर टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने के फैसले ने कूटनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। ट्रंप ने यह भी आशंका जताई है कि यह युद्ध चार हफ्तों तक खिंच सकता है, जो भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
यदि युद्ध के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की किल्लत होती है, तो भारत सरकार कुछ सख्त कदम उठा सकती है। अपनी घरेलू खपत को सुरक्षित रखने के लिए सरकार **पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर प्रतिबंध** लगाने पर विचार कर रही है। वर्तमान में भारत अपनी कुल क्षमता का एक तिहाई पेट्रोल और एक चौथाई डीजल विदेशों में निर्यात करता है। संकट की स्थिति में इस स्टॉक का उपयोग देश के भीतर ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए किया जाएगा। भारत के सामने इस समय दोहरी चुनौती है, एक तरफ वैश्विक कूटनीति का दबाव और दूसरी तरफ देश की ऊर्जा जरूरतें। रूस एक बार फिर भारत के लिए एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रहा है। अब देखना यह होगा कि आने वाले हफ्तों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें और उपलब्धता क्या रुख अपनाती हैं।
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