Rahul on Iran-Israel war crisis : मध्य पूर्व (Middle East) में गहराते युद्ध के बादलों और ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या ने भारतीय राजनीति में हलचल मचा दी है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस गंभीर मुद्दे पर केंद्र की मोदी सरकार की विदेश नीति को कटघरे में खड़ा किया है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधा सवाल पूछा है कि क्या वे किसी राष्ट्र प्रमुख की हत्या को नई विश्व व्यवस्था (World Order) स्थापित करने का तरीका मानते हैं?

मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए राहुल गांधी ने अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक विदेश नीति हमेशा से संप्रभुता और शांतिपूर्ण समाधानों पर आधारित रही है, लेकिन वर्तमान चुप्पी भारत की वैश्विक स्थिति को कमजोर कर रही है। राहुल गांधी ने लिखा, "सुरक्षा की चिंताएं वास्तविक हो सकती हैं, लेकिन किसी देश की संप्रभुता का उल्लंघन कर किए गए हमले संकट को और भयावह बनाएंगे। पीएम मोदी को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे राज्य प्रमुखों की टारगेटेड हत्याओं का समर्थन करते हैं?"
ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच छिड़े इस रक्तरंजित संघर्ष पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए राहुल गांधी ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि हिंसा कभी भी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती। उन्होंने ईरान पर हुए एकतरफा हमलों और उसके बाद ईरान द्वारा मध्य पूर्व के अन्य देशों पर की गई जवाबी कार्रवाई, दोनों की कड़े शब्दों में निंदा की है। राहुल गांधी का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर केवल 'अहिंसा' और 'संवाद' ही वे एकमात्र रास्ते हैं, जिनसे शांति की बहाली संभव है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि मौजूदा संघर्ष ने न केवल मध्य पूर्व बल्कि पूरी दुनिया के करोड़ों लोगों के जीवन को अनिश्चितता और भय के साये में धकेल दिया है। उनके अनुसार, भारत को अपनी ऐतिहासिक भूमिका को पहचानते हुए अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों के पक्ष में बिना किसी हिचकिचाहट के बोलने का साहस दिखाना चाहिए, क्योंकि इस समय की चुप्पी भविष्य के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है।
राहुल गांधी के सुर में सुर मिलाते हुए कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने भी एक लेख के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की विदेश नीति पर तीखे सवाल दागे हैं। उन्होंने ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या पर भारत सरकार के नरम रुख को "डरपोक" करार देते हुए कहा कि यह तटस्थता नहीं, बल्कि अपनी वैश्विक जिम्मेदारी से भागने जैसा है। सोनिया गांधी ने तर्क दिया कि जिस समय ईरान और अमेरिका के बीच कूटनीतिक बातचीत के दरवाजे खुले थे, उस नाजुक मोड़ पर एक राष्ट्र प्रमुख की लक्षित हत्या करना अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में एक बेहद खतरनाक और चिंताजनक मिसाल पेश करता है। उन्होंने सरकार पर 'चयनात्मक निंदा' का आरोप लगाते हुए कहा कि पीएम मोदी ने ईरान द्वारा किए गए जवाबी हमलों की तो तुरंत निंदा कर दी, लेकिन उससे पहले अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों पर चुप्पी साधे रखी। उनके अनुसार, सरकार का यह दोहरा रवैया वैश्विक स्तर पर भारत की विश्वसनीयता और उसकी निष्पक्ष छवि पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच जारी तनाव ने अब एक ऐसा मोड़ ले लिया है, जिसने पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की आहट सुना दी है। घटनाक्रम की शुरुआत 28 फरवरी को हुई, जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर एक भीषण सैन्य हमला किया। इस हमले का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला परिणाम ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के रूप में सामने आया, जिसकी पुष्टि 1 मार्च को स्वयं ईरान ने की। यह हमला केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि इसने ईरान के सामरिक ढांचे को हिलाकर रख दिया है। सैन्य सूत्रों के अनुसार, इन हमलों में तेहरान सहित कई प्रमुख शहरों में स्थित सैन्य कमांड सेंटर, मिसाइल लॉन्चिंग साइट्स और अत्याधुनिक हवाई रक्षा प्रणालियों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है।
इस सैन्य कार्रवाई के साथ ही राजनीतिक मोर्चे पर भी बड़ी हलचल देखी गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी जनता से सीधा संवाद करते हुए अपील की है कि वे 1979 से चले आ रहे इस्लामिक नेतृत्व के शासन को उखाड़ फेंकें और अपनी नियति की कमान खुद संभालें। हमलों की इस आग में केवल खामेनेई ही नहीं, बल्कि ईरान के चार अन्य अत्यंत वरिष्ठ सैन्य और सुरक्षा अधिकारी भी मारे गए हैं, जिससे देश का रक्षा तंत्र नेतृत्व विहीन नजर आ रहा है। वहीं, भारत की भूमिका पर नजर डालें तो मोदी सरकार ने अब तक बेहद संतुलित और संभलकर प्रतिक्रिया दी है। सरकार ने केवल 'गहरी चिंता' जताते हुए कूटनीति और संवाद के पुराने फॉर्मूले की वकालत की है। हालांकि, राहुल गांधी और सोनिया गांधी जैसे विपक्षी नेताओं का मानना है कि इतनी बड़ी वैश्विक घटना पर भारत की यह सीमित टिप्पणी उसकी अंतरराष्ट्रीय साख और 'नैतिक साहस' पर सवाल खड़े करती है।
विपक्ष का मानना है कि भारत को इस वैश्विक संकट में एक 'नैतिक शक्ति' (Moral Power) के रूप में उभरना चाहिए था, लेकिन सरकार की चुप्पी उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग कर सकती है। अब देखना यह है कि क्या विदेश मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय इन तीखे सवालों का कोई औपचारिक जवाब देता है या भारत अपनी 'वेट एंड वॉच' की नीति पर ही कायम रहेगा।
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