नई दिल्लीः अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति से ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री पूरी तरह से बेअसर है। दुनिया के ज्यादातर ऑटो निर्यातकों के पास डेट और लिक्विडिटी पर्याप्त मात्रा में हैं। ये अलग बात है कि कारोबार में मार्जिन को लेकर दबाव और वर्किंग कैपिटल की आवश्यकता बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
निवेश सूचना और क्रेडिट रेटिंग एजेंसी यानी आईसीआरए की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 24 में भारतीय ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री की 70 प्रतिशत आय घरेलू इंडस्ट्री से आई थी और इंडस्ट्री की कुल आय में अमेरिकी मार्केट की हिस्सेदारी केवल 8 प्रतिशत थी। यही नहीं, 2020 से लेकर 2024 के दौरान अमेरिका को होने वाले ऑटो कंपोनेंट निर्यात में 15 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर यानी सीएजीआर से बढ़ोत्तरी हुई थी। ग्लोबल ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर द्वारा वेंडर डाइवर्सिफिकेशन के कारण नए प्लेटफार्मों को बढ़ती आपूर्ति और हाई वैल्यू एडिशन जैसे कारकों ने भारतीय ऑटो कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर को फायदा पहुंचाया है, जबकि अमेरिका में पूर्व-कोविड स्तरों की तुलना में नए वाहन के पंजीकरण की वृद्धि धीमी रही है।
आईसीआरए लिमिटेड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट शमशेर दीवान ने कहा कि ऑटो कंपोनेंट सप्लायर्स ने संकेत दिया है कि बढ़ती लागत का अधिकांश हिस्सा आगे पास किया जाएगा। हालांकि, किसी भी क्रेता-आपूर्तिकर्ता वार्ता की तरह, पास-थ्रू की सीमा आपूर्तिकर्ता की गंभीरता, व्यापार में हिस्सेदारी, प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति किए गए कंपोनेंट की तकनीक पर निर्भर करेगी। भारतीय ऑटो कंपोनेंट निर्यातकों द्वारा बढ़ी हुई टैरिफ लागत का औसतन 30-50 प्रतिशत वहन किया जाता है, इससे अनुमानतः 2,700-4,500 करोड़ की आय प्रभावित होगी। ट्रंप सरकार की ओर से 26 मार्च, 2025 को जारी किए गए आदेश में आयातित प्रमुख ऑटोमोबाइल पार्ट्स, जिनमें इंजन, ट्रांसमिशन, पावरट्रेन और इलेक्ट्रिकल कंपोनेंट शामिल हैं, पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया गया था। आईसीआरए का मानना है कि निकट भविष्य में ग्राहकों के साथ बिजनेस शेयर में कमी आ सकती है,क्योंकि स्विचिंग लागत अधिक होने के साथ ही प्रोडक्ट डेवलपमेंट, टेस्टिंग और अप्रूवल साइकिल भी काफी लंबे हैं।
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