प्रशिक्षण शिविर में योग साधकों को मिला मार्गदर्शन, अष्टांग और हठयोग का अभ्यास

खबर सार :-
योग प्रशिक्षक ने नाड़ी विज्ञान और स्वर विज्ञान की भी विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार ब्रह्मांड में विभिन्न शक्तियां विद्यमान हैं, उसी प्रकार मानव शरीर में भी सभी ऊर्जाएं मौजूद हैं। बाहरी जगत में सूर्य और चंद्र जीवन के आधार हैं, जबकि शरीर के भीतर इनका प्रतिनिधित्व इड़ा और पिंगला नाड़ियों के रूप में होता है।
प्रशिक्षण शिविर में योग साधकों को मिला मार्गदर्शन, अष्टांग और हठयोग का अभ्यास
खबर विस्तार : -

सोनभद्र/ओबराः परम् पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के निर्देशन में पतंजलि परिवार सोनभद्र के विभिन्न संगठनों के तत्वावधान में संचालित सहयोग शिक्षक प्रशिक्षण शिविर के 23वें दिन योग, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक जीवन शैली पर विशेष मार्गदर्शन दिया गया। यह प्रशिक्षण शिविर 20 मई से 15 जून तक चिल्ड्रेन पार्क, ओबरा नगर में आयोजित किया जा रहा है।

कार्यक्रम का शुभारंभ ओबरा परियोजना के सेवानिवृत्त अधिकारी एस.एन. गुप्ता तथा शिविर प्रभारी नरेंद्र सिंह द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। इसके बाद योग प्रशिक्षक वीरेंद्र योगी ने प्रतिभागियों को महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग एवं हठयोग का अभ्यास कराया।

अपने संबोधन में वीरेंद्र योगी ने कहा कि हठयोग और राजयोग एक-दूसरे के पूरक हैं। हठयोग के बिना राजयोग की सिद्धि संभव नहीं है तथा राजयोग के बिना हठयोग अधूरा माना जाता है। उन्होंने हठयोग प्रदीपिका के श्लोक का उल्लेख करते हुए बताया कि साधक को दोनों योग पद्धतियों का समन्वित और निरंतर अभ्यास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हठयोग में ‘ह’ का अर्थ सूर्य नाड़ी तथा ‘ठ’ का अर्थ चंद्र नाड़ी माना जाता है। सूर्य और चंद्र नाड़ियों के संतुलन से ही हठयोग की अवधारणा विकसित होती है। मानव शरीर में अग्नि शक्ति और सोम शक्ति दोनों विद्यमान रहती हैं। अग्नि शक्ति साहस, पराक्रम और ऊर्जा का प्रतीक है, जबकि सोम शक्ति शांति, श्रद्धा, धैर्य, प्रेम और सहानुभूति का प्रतिनिधित्व करती है। इन दोनों शक्तियों के संतुलन से एक दिव्य ऊर्जा का उदय होता है, जो व्यक्ति के समग्र विकास का आधार बनती है। जब दोनों नाड़ियों में संतुलन स्थापित होता है, तब सुषुम्ना नाड़ी सक्रिय होती है, जिसे योग में आध्यात्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण मार्ग माना गया है।

प्रातःकालीन सत्र में साधकों को ओम् ध्वनि, गायत्री मंत्र तथा ध्यान का अभ्यास कराया गया। योग प्रशिक्षक ने बताया कि मन की शांति, एकाग्रता और आत्मिक संतुलन हठयोग एवं राजयोग के नियमित अभ्यास से ही प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हठयोग की परंपरा के आदि प्रवर्तक भगवान शिव माने जाते हैं। बाद में मत्स्येंद्रनाथ, गुरु गोरखनाथ, मीननाथ, चौरंगीनाथ, स्वात्माराम और अन्य नाथ योगियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

शिविर में विभिन्न शारीरिक समस्याओं के समाधान हेतु योगासन और प्राणायाम का अभ्यास भी कराया गया। कमर दर्द के लिए मकरासन, शलभासन, भुजंगासन, नौकासन, धनुरासन, मरकटासन और पवनमुक्तासन का अभ्यास कराया गया। वहीं मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए मंडूकासन, कूर्मासन, शशकासन, गोमुखासन और वक्रासन के लाभ बताए गए। उच्च रक्तचाप के नियंत्रण हेतु अनुलोम-विलोम प्राणायाम तथा पेट संबंधी समस्याओं के लिए कपालभाति प्राणायाम का अभ्यास कराया गया।

मुख्य अतिथि एवं ओबरा परियोजना के सेवानिवृत्त अधिकारी एस.एन. गुप्ता ने कहा कि योग जीवन को स्वस्थ और संतुलित बनाने का सबसे सरल माध्यम है। उन्होंने कहा कि नियमित योगाभ्यास से उन्हें स्वयं अनेक लाभ प्राप्त हुए हैं। उन्होंने पतंजलि परिवार और योग प्रशिक्षकों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि समाज में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने में योग शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

कार्यक्रम में पतंजलि परिवार के अनेक पदाधिकारी, योग शिक्षक एवं साधक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन जिला कोषाध्यक्ष जितेंद्र सिंह ने किया। अंत में वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में स्वस्थ, संतुलित और सुखी जीवन शैली का आधार हठयोग और राजयोग का नियमित अभ्यास ही है।

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