चाईबासा में आस्था और भक्ति के साथ शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुई दुर्गा पूजा, भक्तों ने मां को दी विदाई

खबर सार :-

झारखंड के चाईबासा में आस्था और भक्ति के साथ शांतिपूर्ण माहौल में दुर्गा पूजा संपन्न हुई। विजयादशमी के दिन भक्तों ने मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया।
झारखंड के चाईबासा में शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुई दुर्गा पूजा

खबर विस्तार : -

पश्चिमी सिंहभूम: पश्चिमी सिंहभूम के जिला मुख्यालय चाईबासा में पांच दिवसीय शारदीय दुर्गा पूजा का त्योहार बुधवार देर रात देवी दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ संपन्न हुआ। 17 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक, शहर के 22 पूजा पंडालों में देवी दुर्गा की पूजा पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई। इस दौरान श्रद्धालु पूरे उत्साह में रहे। प्रशासन, पूजा समितियों और विभिन्न समुदायों के आपसी सहयोग से प्रतिमा विसर्जन की प्रक्रिया शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुई।

बुधवार सुबह महादशमी के अवसर पर, विवाहित महिलाओं ने देवी दुर्गा को सिंदूर अर्पित करके पारंपरिक 'सिंदूर खेला' की रस्म निभाई। इसके बाद 'घट विसर्जन' (घट स्थापना के समापन की रस्म) संपन्न हुई। शाम होते ही, विभिन्न पूजा पंडालों से प्रतिमाओं को लेकर शोभायात्राएं निकलीं। पारंपरिक ढोल (ढाक) की थाप, भक्ति गीतों और मंत्रोच्चार के बीच, श्रद्धालु गाते-नाचते हुए शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए गांधी मैदान और नागदा चौक की ओर बढ़े। इसके बाद प्रतिमाओं को जुबली तालाब और रोरो नदी में विसर्जित कर दिया गया। विसर्जन की प्रक्रिया देर रात तक चलती रही। प्रशासन के अनुसार, कहीं से भी किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली।

सांप्रदायिक सद्भाव की झलक

विसर्जन शोभायात्रा के दौरान चाईबासा में सांप्रदायिक सद्भाव और भाईचारे की एक सुंदर मिसाल देखने को मिली। अंजुमन इस्लामिया के सचिव फैयाज खान (जिन्हें बल्लो खान के नाम से भी जाना जाता है) ने संगठन के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर, उर्दू लाइब्रेरी के पास शोभायात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के बीच फल और पानी बांटा। उन्होंने कहा कि सभी धर्मों का सम्मान करना और जरूरत के समय एक-दूसरे की सेवा करना ही मानवता का असली सार है। उन्होंने कहा कि धर्म नफरत नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव और भाईचारा सिखाते हैं।

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पुलिस-प्रशासन ने की सराहना

गुरुवार को नगर परिषद के अध्यक्ष और केंद्रीय दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष नितिन प्रकाश ने सभी पूजा समितियों के पदाधिकारियों और स्वयंसेवकों को त्योहार शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए बधाई दी। उप-विभागीय अधिकारी संजय कुमार ने बताया कि बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भागीदारी के बावजूद विसर्जन प्रक्रिया का शांतिपूर्ण समापन सभी समुदायों, पूजा समितियों और प्रशासन के सामूहिक प्रयासों का परिणाम था। उप-विभागीय पुलिस अधिकारी बहमन टुटी और सदर थाना प्रभारी (SHO) चंद्रशेखर चौधरी ने भी इस आयोजन में योगदान देने वाले सभी लोगों की सराहना की।

कड़ी सुरक्षा में हुआ प्रतिमाओं का विसर्जन

विसर्जन के दौरान अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राहुल देव बराइक, सर्कल अधिकारी उपेंद्र कुमार, ट्रैफिक प्रभारी संतोष कुमार, नगर परिषद की कार्यकारी अधिकारी संतोषिनी मुर्मू और मुफस्सिल थाना प्रभारी विनोद कुमार सहित कई अधिकारी मौजूद थे। सुरक्षा के मद्देनजर, वर्दीधारी और सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों (पुरुष और महिला दोनों) को तैनात किया गया था। केंद्रीय दुर्गा पूजा समिति के सदस्यों (महासचिव आनंद प्रियदर्शी, उपाध्यक्ष त्रिशानु राय और चंदन पांडे, तथा संरक्षक राजीव नयनम) ने भी व्यवस्थाओं को संभालने में सहयोग दिया। सभी के सहयोग से, चाईबासा में दुर्गा पूजा उत्सव और मूर्ति विसर्जन का कार्य आपसी सद्भाव और शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ।

गरीबों के लिए सहारा बने प्रतिमा के बांस-बल्ली

गुरुवार सुबह, देवी दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद, सुवर्णरेखा नदी के किनारे एक ऐसा मार्मिक दृश्य देखने को मिला जिसने वहां मौजूद लोगों को गहराई से झकझोर दिया। नदी के किनारे पूजा-पाठ की बची हुई सामग्री और प्रतिमाएं बनाने में इस्तेमाल हुआ सामान बिखरा पड़ा था। इसी बीच, कुछ जरूरतमंद लोग इस मलबे में अपने काम की चीजें तलाशते हुए दिखाई दिए। कुछ लोगों ने बांस के डंडे इकट्ठे किए, तो कुछ ने लकड़ी के लट्ठे और अन्य उपयोगी सामग्री जमा करके किनारे पर ढेर लगा दिया। जो चीजें आम लोगों के लिए बेकार कचरा बन चुकी थीं, वे इन गरीब परिवारों के लिए एक बड़ी राहत साबित हुईं।

विजयादशमी के अवसर पर, जब भक्त देवी दुर्गा को विदा कर रहे थे, तो शहर के विभिन्न विसर्जन स्थलों पर कई लोगों की आंखें नम हो गईं। ढोल-नगाड़ों की गूंज, जोश से भरे जयकारे और अगले साल फिर आने की प्रार्थनाओं के बीच, प्रतिमाओं को जल में विसर्जित कर दिया गया। जब उत्सव समाप्त हुआ और नदी के किनारे भीड़ कम हो गई, तो एक अलग ही और गंभीर तस्वीर सामने आई, जो जीवन की कठोर वास्तविकताओं से जूझ रहे लोगों के संघर्ष को दर्शाती थी। बांस और लकड़ी के लट्ठे इकट्ठा कर रहे कुछ लोगों ने बताया कि मानसून की बारिश में उनके घर क्षतिग्रस्त हो गए थे। भारी आर्थिक तंगी के कारण, वे मरम्मत के लिए नया सामान खरीदने में असमर्थ थे। ऐसे में, दुर्गा प्रतिमाओं को बनाने में इस्तेमाल हुए बांस और लकड़ी उनके लिए बहुत कीमती साबित हुए। उन्हें उम्मीद थी कि इन चीजों की मदद से वे अपने जर्जर घरों की मरम्मत कर सकेंगे और अपने परिवारों के सिर पर एक सुरक्षित छत दे पाएंगे। 

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