महाराजा मानसिंह प्रथम की पुण्यतिथि पर चाकसू में श्रद्धांजलि सभा, वक्ताओं ने उनके शौर्य और राष्ट्रसेवा को किया नमन

खबर सार :-

जयपुर के चाकसू में महाराजा मानसिंह प्रथम की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। वक्ताओं ने उनके शौर्य, राष्ट्रभक्ति, सनातन धर्म की रक्षा और ऐतिहासिक योगदान को याद करते हुए युवाओं से उनके आदर्शों पर चलने का आह्वान किया।
महाराजा मानसिंह प्रथम की पुण्यतिथि पर चाकसू में श्रद्धांजलि सभा, वक्ताओं ने उनके शौर्य और राष्ट्रसेवा को किया नमन

खबर विस्तार : -

जयपुर: आमेर नरेश, महान योद्धा और सनातन धर्म के रक्षक महाराजा मानसिंह प्रथम की पुण्यतिथि पर रविवार को चाकसू में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। श्री क्षत्रिय युवक संघ बालिका प्रथम राजा मानसिंह शाखा, चाकसू के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में समाज के लोगों ने महाराजा मानसिंह प्रथम के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी और उनके शौर्य, राष्ट्रभक्ति तथा धर्म रक्षा में दिए गए योगदान को याद किया।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि महाराजा मानसिंह प्रथम भारतीय इतिहास के उन वीर योद्धाओं में शामिल हैं, जिन्होंने अपने पराक्रम, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रहित के लिए किए गए कार्यों से अमिट पहचान बनाई। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र, समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।

शाखा की प्रतिनिधि ने बताया इतिहास

शाखा की प्रतिनिधि आदिति राजावत (हिंगोनिया) ने अपने संबोधन में बताया कि महाराजा मानसिंह प्रथम की छतरी महाराष्ट्र के एलिचपुर (अचलपुर) में स्थित है। उन्होंने कहा कि महाराजा मानसिंह प्रथम अपने जीवनकाल में लगभग 77 युद्धों में विजयी रहे और अंतिम समय तक अपराजित योद्धा के रूप में इतिहास में दर्ज हैं। उनका निधन 6 जुलाई 1614 को एलिचपुर में हुआ था। उनकी समाधि के ऊपर भगवान शिव का मंदिर बना हुआ है, जबकि उनकी दो रानियों की छतरियां भी मंदिर शैली में निर्मित हैं।

उन्होंने बताया कि जयपुर के अंतिम शासक महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय ने वर्ष 1935 में इन ऐतिहासिक छतरियों का जीर्णोद्धार कराया था। इसके अलावा महाराजा मानसिंह प्रथम ने वृंदावन के प्रसिद्ध गोविंद देवजी मंदिर, हरिद्वार के हर की पौड़ी घाट और गंगा मंदिर सहित कई धार्मिक स्थलों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने काशी, मथुरा और अन्य स्थानों पर अनेक हिंदू मंदिरों के निर्माण और संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही जयगढ़ में तोप निर्माण कारखाने की स्थापना कर सैन्य शक्ति को भी नई दिशा दी।

कार्यक्रम के दौरान महाराजा मानसिंह प्रथम के जीवन से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों पर भी प्रकाश डाला गया। बताया गया कि उनका जन्म 21 दिसंबर 1550 को आमेर के राजमहल में आमेर नरेश राजा भगवंत दास के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था। उनके परिवार में 26 रानियां, 11 पुत्र और 5 पुत्रियां थीं। उनकी पटरानी कनकावती पंवार ने अपने पुत्र जगत सिंह की स्मृति में आमेर का प्रसिद्ध जगत शिरोमणि मंदिर बनवाया था, जो आज भी अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता के लिए प्रसिद्ध है।

कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने युवाओं से आह्वान किया कि वे महाराजा मानसिंह प्रथम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं और राष्ट्र, समाज तथा सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव समर्पित रहें। उन्होंने कहा कि ऐसे महापुरुषों का जीवन समाज को एकता, साहस और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश देता है।

इस अवसर पर भंवर कंवर, एडवोकेट अर्जुन सिंह राजावत (हिंगोनिया), सज्जन कंवर, परमेश्वर कंवर, मूल सिंह राजावत सहित समाज के अनेक गणमान्य नागरिक एवं सर्व समाज के लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन महाराजा मानसिंह प्रथम के आदर्शों पर चलने के संकल्प और श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुआ।

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