जयपुर में शंख, घंटी और भजन-कीर्तन के साथ मनाई गई जलझूलनी एकादशी, ठाकुर जी को कराया जल-विहार
खबर सार :-
जलझूलनी एकादशी पर जयपुर के प्रमुख वैष्णव मंदिरों में उत्सव का माहौल दिखा। शंख, घंटी के साथ डोल उत्सव निकाली गई। ठाकुर जी का पंचामृत अभिषेक कर फूलों से सजाया गया।
खबर विस्तार : -
जयपुर: मंगलवार को 'छोटी काशी' (जयपुर) में जलझूलनी एकादशी, (जो भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को आती है) भक्ति और उत्साह के साथ मनाई गई। शहर के प्रमुख वैष्णव मंदिरों में दिनभर धार्मिक कार्यक्रम होते रहे। शाम को शंख, घंटी और घंटों की शुभ ध्वनियों के बीच डोल उत्सव (शोभायात्रा) निकाली गई, जिसमें भगवान शालिग्राम-जी को पालकी में बिठाया गया था। विभिन्न रास्तों और मोहल्लों से शोभायात्रा निकालने के बाद भगवान को वापस मंदिर लाकर पुनः स्थापित किया गया।
इस बीच, जय निवास बाग स्थित श्री गोविंद देव-जी महाराज के ठिकाना मंदिर में भगवान को नटवर (दिव्य नर्तक) के रूप में सजाया गया। मंदिर प्रशासन के अनुसार, ग्वाल झांकी (दोपहर के दर्शन) के बाद शाम 4:45 बजे से 5:15 बजे तक दर्शन के कपाट बंद रहे। इस दौरान, मंदिर के महंत अंजन कुमार गोस्वामी ने जलझूलनी एकादशी की विशेष पूजा-अर्चना की।
पंचामृत अभिषेक, चंदन श्रृंगार और विशेष आरती
भगवान शालिग्राम-जी (नारायण-जी) को एक खाट पर बिठाकर मंदिर के दक्षिण-पश्चिम आंगन में स्थित तुलसी मंच (पवित्र तुलसी का चबूतरा) तक ले जाया गया। वहां पंचामृत अभिषेक (पांच पवित्र पदार्थों से स्नान), चंदन श्रृंगार और विशेष आरती की गई। इसके बाद, तुलसी मंच की चार बार परिक्रमा की गई। फिर, शालिग्राम-जी को खाट पर ही मंदिर के चारों ओर शोभायात्रा में घुमाया गया और वापस गर्भगृह में लाकर मुख्य देवता श्री गोविंद देव-जी के बगल में स्थापित किया गया। धार्मिक अनुष्ठान पूरे होने के बाद दर्शन के कपाट खोल दिए गए, जिससे भक्त शाम की झांकी के दौरान भगवान के दर्शन कर सके और आरती में शामिल हो सके।
भक्ति गीत गाकर भगवान का उत्सव मनाया
सुभाष चौक (पानों का दरीबा) स्थित श्री सरस निकुंज में शुक संप्रदाय के प्रमुख अलबेली माधुरी शरण महाराज की देखरेख में सुबह वैदिक मंत्रों के साथ श्री राधा सरस बिहारी सरकार का पंचामृत अभिषेक किया गया। भगवान को मौसमी फूलों से सजाया गया और सागरी (व्रत के अनुकूल) भोग लगाया गया। शाम को जलझूलनी एकादशी के उपलक्ष्य में भक्ति गीत (पद) गाकर भगवान का उत्सव मनाया गया। पुरानी बस्ती स्थित श्री राधा गोपीनाथ-जी मंदिर में महंत सिद्धार्थ गोस्वामी के मार्गदर्शन में अभिषेक, श्रृंगार और भजन-कीर्तन जैसे अनुष्ठान हुए। इसी तरह, चौड़ा रास्ता स्थित राधा दामोदर-जी मंदिर में महंत मलय गोस्वामी की देखरेख में एकादशी का त्योहार मनाया गया। साथ ही, मदनगोपालजी, लाडलीजी (रामगंज बाजार), ब्रजनिधिजी और आनंद कृष्ण बिहारीजी (चांदनी चौक) और श्री मुरली मनोहरजी (रामगंज चौपड़) सहित कई अन्य वैष्णव मंदिरों में भी जल-झूलनी एकादशी का उत्सव मनाया गया।
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गोनर में भक्तों की भारी भीड़
गोनर स्थित श्री लक्ष्मी-जगदीशजी मंदिर में वार्षिक जल-झूलनी एकादशी मेला आयोजित किया गया। जयपुर, अन्य जिलों और मध्य प्रदेश से हजारों भक्त भगवान का आशीर्वाद लेने पहुंचे। सुबह से ही मंदिर में दर्शनार्थियों की कतारें लग गईं। शाम को मुख्य उत्सव के तहत, श्री लक्ष्मी-जगदीश महाराज को पालकी में बिठाकर बैंड-बाजे के साथ जगन्नाथ सरोवर (झील) ले जाया गया। भक्त भजन और भक्ति के जयकारे लगाते हुए साथ-साथ चल रहे थे।
झील पर पहुंचने के बाद, भगवान को औपचारिक जल-विहार के लिए नाव में बिठाया गया। जुलूस के दौरान लगभग 30 झांकियां आकर्षण का केंद्र रहीं। इन झांकियों के साथ सजे-धजे घोड़े, बैंड-बाजे और बलवंत व्यायामशाला के स्वयंसेवक अपने कौशल का प्रदर्शन करते हुए चल रहे थे। मंदिर के महंत हनुमान प्रसाद शर्मा ने बताया कि जल-विहार के बाद भगवान की पालकी मंदिर के लिए रवाना हुई। रास्ते में कई जगहों पर भक्तों और ग्रामीणों ने आरती की। भक्तों ने पालकी के नीचे से निकलने की परंपरा का भी पालन किया। जयपुर के अलावा, दौसा, उदयपुर, अजमेर, सुजानगढ़, कुचामन सिटी, बांदीकुई, चाकसू, लालसोट, जमवारामगढ़, बस्सी, फागी, चौमू और बगरू के साथ-साथ मध्य प्रदेश के इंदौर, रतलाम और खलघाट से भी भक्त आए थे।
162 साल पुरानी पालकी में निकाली गई शोभायात्रा
खातीपुरा के प्राचीन नरसिंह मंदिर में जलझूलनी एकादशी का त्योहार बहुत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। लक्ष्मी और शालिग्राम-जी की मूर्तियों के साथ एक शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें हाथी, घोड़े, पालकी और म्यूजिक बैंड शामिल थे। कई रास्तों से होते हुए यह शोभायात्रा झारखंड महादेव मंदिर पहुंची। वहां मूर्तियों को रस्म के अनुसार जल से स्नान कराया गया और फिर शाम की आरती हुई। इसके बाद, शोभायात्रा वापस नरसिंह मंदिर लौट आई। मंदिर पहुँचने पर रात में भजन, कीर्तन और नृत्य कार्यक्रम हुए। इस कार्यक्रम का संचालन नृत्य गुरु रूपसिंह शेखावत ने किया। इस शोभायात्रा का मुख्य आकर्षण लगभग 50 किलो वजन वाली 162 साल पुरानी पालकी थी। चीड़ और चंदन की लकड़ी से बनी इस पालकी को चार भक्तों ने उठाया था। इसे बहुत खूबसूरती से सजाया गया था और देवता (ठाकुर-जी) को नए कपड़े पहनाए गए थे। देवता को अंदर बिठाने से पहले, पालकी में चांदी का सिंहासन लगाया गया, जिस पर सोने की सात छतरियां लगी थीं। महंत मदनगोपाल दाधीच ने बताया कि जलझूलनी एकादशी पर यह शोभायात्रा निकालने की परंपरा 162 साल पहले शुरू हुई थी।
दुर्गापुरा में राधामोहन-जी और सीताराम-जी की 'डोल यात्रा'
दुर्गापुरा के राधामोहन-जी मंदिर से राधामोहन-जी और सीताराम-जी की 'डोल यात्रा' (धार्मिक शोभायात्रा) भी निकाली गई। महंत जगदीश शर्मा ने बताया कि शोभायात्रा शाम 6:00 बजे मंदिर से रवाना हुई। बैंड के साथ निकली इस शोभायात्रा में झांकियांभी थीं, जिन्होंने देखने वालों का मन मोह लिया। यह शोभायात्रा दुर्गापुरा के मुख्य बाजार से गुजरी और दुर्गा विहार, राजपूतों का मोहल्ला और ग्रीन नगर से होते हुए आगे बढ़ी। अंत में यह 'टंकी-वाले शिव हनुमान मंदिर' के मेला मैदान में पहुंची, जहां धार्मिक अनुष्ठान किए गए। भक्तों ने पूजा-अर्चना की और देवी-देवताओं से आशीर्वाद मांगा।
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