सीएचसी की बदहाल व्यवस्था: डॉक्टरों की कमी, इलाज के लिए भटक रहे हजारों ग्रामीण
खबर सार :-
भीलवाड़ा के शाहपुरा विधानसभा क्षेत्र स्थित फूलियाकलां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हैं। ग्रामीणों ने डेपुटेशन खत्म कर स्थायी चिकित्सकों की नियुक्ति और व्यवस्था सुधारने की मांग की है।
खबर विस्तार : -
भीलवाड़ाः राजस्थान सरकार ग्रामीण क्षेत्रों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने और आमजन को गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने के दावे लगातार करती रही है। स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, नए अस्पताल भवन बनाए जा रहे हैं और आधुनिक चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराने की घोषणाएं भी की जाती हैं। लेकिन भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा विधानसभा क्षेत्र के अंतिम छोर पर स्थित फूलियाकलां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) की मौजूदा स्थिति इन दावों की जमीनी हकीकत को उजागर करती नजर आती है।
यहां डॉक्टरों की भारी कमी, स्वास्थ्यकर्मियों का लंबे समय से डेपुटेशन पर रहना, बंद पड़ी बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली, निष्क्रिय सीसीटीवी कैमरे और सीमित संसाधनों के बीच चल रही चिकित्सा व्यवस्था ने हजारों ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल अब इलाज का केंद्र कम और मरीजों को रेफर करने का केंद्र अधिक बन गया है।
डॉक्टरों की कमी से मरीज परेशान
फूलियाकलां सीएचसी में प्रतिदिन आसपास के दर्जनों गांवों से बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। लेकिन अस्पताल में चिकित्सकों की अनुपलब्धता के कारण अधिकांश मरीजों को निराश लौटना पड़ता है। गंभीर रोगियों को प्राथमिक उपचार के बाद दूसरे अस्पतालों के लिए रेफर कर दिया जाता है, जबकि सामान्य बीमारियों के मरीजों को भी पर्याप्त उपचार नहीं मिल पाता।
अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सत्यनारायण शर्मा एक जून से मेडिकल अवकाश पर हैं। वहीं डॉ. नितेश झाजोरिया दो जुलाई से अवैतनिक अवकाश पर चल रहे हैं। इसके अलावा डॉ. दुर्गेश खिंची को 23 मई से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कोठियां में डेपुटेशन पर भेजा गया है। परिणामस्वरूप अस्पताल में उपलब्ध चिकित्सकों की संख्या बेहद सीमित रह गई है।
डेपुटेशन से प्रभावित हुई स्वास्थ्य व्यवस्था
अस्पताल में केवल चिकित्सकों की ही नहीं, बल्कि अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की भी कमी बनी हुई है। फार्मासिस्ट हितेश सेन पिछले छह माह से केकड़ी में डेपुटेशन पर कार्यरत हैं, जबकि लैब टेक्नीशियन सालु खां पिछले पांच महीनों से बच्छखेड़ा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सेवाएं दे रहे हैं।
इन कर्मचारियों की अनुपस्थिति का सीधा असर दवा वितरण, पैथोलॉजी जांच और अन्य आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। कई मरीजों को आवश्यक जांच के लिए दूसरे अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जिससे समय और आर्थिक बोझ दोनों बढ़ रहे हैं।
नर्सिंग स्टाफ के भरोसे चल रहा अस्पताल
डॉक्टरों की कमी के कारण अस्पताल का अधिकांश संचालन नर्सिंग स्टाफ के भरोसे हो रहा है। हालांकि नर्सिंग स्टाफ अपनी क्षमता के अनुसार मरीजों की सेवा में जुटा है, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सकों की आवश्यकता वाले मामलों में उनकी सीमाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं।
दुर्घटनाओं, हृदय रोग, गंभीर संक्रमण और अन्य जटिल बीमारियों से पीड़ित मरीजों को तत्काल रेफर करना मजबूरी बन गया है। वहीं बुखार, वायरल संक्रमण, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य सामान्य रोगों के मरीज भी घंटों इंतजार के बाद बिना समुचित इलाज के लौटने को विवश हैं।
सीमांत क्षेत्र होने की कीमत चुका रहे ग्रामीण
फूलियाकलां क्षेत्र के ग्रामीणों का आरोप है कि जिले के अंतिम छोर पर स्थित होने के कारण यह अस्पताल वर्षों से प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है। उनका कहना है कि अधिकारियों के निरीक्षण बहुत कम होते हैं और जब निरीक्षण की सूचना मिलती है, तभी पूरा स्टाफ अस्पताल में उपस्थित दिखाई देता है। निरीक्षण समाप्त होते ही व्यवस्थाएं फिर पहले जैसी हो जाती हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि ऐसी स्थिति किसी जिला मुख्यालय या शहरी अस्पताल में होती तो तत्काल कार्रवाई होती, लेकिन सीमांत क्षेत्रों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
डेपुटेशन नीति पर उठ रहे सवाल
ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि राज्य सरकार पहले ही अनावश्यक डेपुटेशन पर रोक लगाने के निर्देश जारी कर चुकी है। इसके बावजूद फूलियाकलां सीएचसी से डॉक्टरों और कर्मचारियों को अन्य संस्थानों में भेजा गया।
स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब अस्पताल पहले से ही स्टाफ की कमी से जूझ रहा था, तब उपलब्ध कर्मचारियों को भी दूसरे स्थानों पर भेजने का निर्णय किस आधार पर लिया गया। उनका मानना है कि यह विभागीय समन्वय और जवाबदेही की कमी को दर्शाता है।
बायोमेट्रिक और सीसीटीवी भी बंद
अस्पताल में प्रशासनिक निगरानी की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। जानकारी के अनुसार बायोमेट्रिक उपस्थिति मशीन लंबे समय से बंद पड़ी है। इसके चलते कर्मचारियों की वास्तविक उपस्थिति का रिकॉर्ड प्रभावित हो रहा है।
वहीं अस्पताल परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरे भी लंबे समय से निष्क्रिय हैं। ऐसे में अस्पताल की गतिविधियों की निगरानी करना और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करना मुश्किल हो गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि बायोमेट्रिक और सीसीटीवी व्यवस्था नियमित रूप से संचालित हो तो कार्यप्रणाली में काफी सुधार आ सकता है।
गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों की बढ़ी चिंता
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार डॉक्टरों की कमी का सबसे अधिक असर गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों पर पड़ता है। समय पर विशेषज्ञ उपचार नहीं मिलने से कई बार छोटी बीमारी भी गंभीर रूप ले सकती है।
ग्रामीणों का कहना है कि रात के समय स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है। आपातकालीन मामलों में मरीजों को कई किलोमीटर दूर दूसरे अस्पतालों तक ले जाना पड़ता है, जिससे उपचार में देरी होने का खतरा बना रहता है।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल
क्षेत्रवासियों का कहना है कि स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधा प्रभावित होने के बावजूद जनप्रतिनिधियों की सक्रियता अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं देती। चुनाव के दौरान बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के वादे किए जाते हैं, लेकिन अस्पतालों की वास्तविक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पा रहा है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि अस्पताल में स्थायी चिकित्सकों की तत्काल नियुक्ति की जाए, डेपुटेशन पर भेजे गए कर्मचारियों को वापस बुलाया जाए, बायोमेट्रिक और सीसीटीवी प्रणाली को चालू किया जाए तथा दवा और जांच जैसी मूलभूत सुविधाओं को नियमित किया जाए।
विभाग ने दिया आश्वासन
इस संबंध में भीलवाड़ा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. संजीव शर्मा ने कहा कि फूलियाकलां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति विभाग के संज्ञान में है। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु बनाए रखने के लिए जल्द ही वैकल्पिक व्यवस्था करने का प्रयास किया जाएगा।
हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि धरातल पर बदलाव चाहिए। उनका मानना है कि यदि समय रहते डॉक्टरों की नियुक्ति, कर्मचारियों की उपलब्धता और अस्पताल की प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो हजारों ग्रामीणों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रहना पड़ेगा।
फूलियाकलां सीएचसी की स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि जब ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को सरकार की प्राथमिकता बताया जाता है, तब सीमांत क्षेत्रों के अस्पतालों में बुनियादी संसाधनों और पर्याप्त स्टाफ की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विभाग अपने आश्वासन को कितनी जल्दी वास्तविक कार्रवाई में बदल पाता है।
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