भागलपुर में चारे की संकट से जूझ रहे 60 हजार से अधिक मवेशी, दुग्ध उत्पादन में 50 फीसदी तक गिरावट

खबर सार :-

भागलपुर में बाढ़ के बाद पशुपालकों के लिए चारे की कमी एक बड़ी समस्या बन गई है। 60 हजार से अधिक पशुधन के सामने चारे का संकट है, जिसका असर दुग्ध उत्पादन पर भी पड़ा है।
भागलपुर में बाढ़ से नष्ट हुईं फसलें, पशुपालकों के सामने चारे का संकट

खबर विस्तार : -

भागलपुर : जिले के करीब 13 प्रखंडों में गंगा व अन्य सहायक नदियों की बाढ़ का पानी भले ही धीरे-धीरे कम होने लगा है, लेकिन बाढ़ पीड़ितों व पशुपालकों की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है। राहत शिविरों में इंसानों के लिए भोजन और सहायता की व्यवस्था की गई है, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले 60 हजार से अधिक पशुधन इस समय गंभीर चारे संकट का सामना कर रहे हैं।

पर्याप्त चारा नहीं मिलने के कारण दुधारू पशुओं की दूध देने की क्षमता में 30 से 50 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है, जिसके कारण स्थानीय बाजारों में दूध की कीमत 10 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ गई है। गंगा के उफान और दियारा इलाकों में लंबे समय तक जलजमाव के कारण हजारों एकड़ मक्के की फसल और चारागाह पूरी तरह जलमग्न होकर नष्ट हो गये हैं। बाढ़ के पानी के कारण घरों व घरों में स्टॉक में रखा लगभग 50 प्रतिशत सूखा चारा भी सड़ गया है। सुदूरवर्ती एवं ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों में पानी भर जाने से पशुपालकों को हरे चारे का नामोनिशान नहीं रह गया है।

महंगा चारा खरीदने में असमर्थ पशुपालक

दियारा और बाढ़ प्रभावित निचले इलाकों के कई गांवों के पशुपालक अपने मवेशियों के साथ घर छोड़कर सड़क किनारे या ऊंचे स्थानों पर शरण ले चुके हैं। शंकरपुर दियारा और चवनिया दियारा के पशुपालकों का कहना है कि जो पुआल पहले 500 से 600 रुपये प्रति क्विंटल मिलता था, अब कालाबाजारी के कारण 800 से 1200 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है। आर्थिक तंगी के कारण पशुपालक महंगा चारा खरीदने में असमर्थ हैं। हालात ऐसे हैं कि मवेशियों को खिलाने के लिए पशुपालक उन्हें भागलपुर शहर की सड़कों और फुटपाथों पर खुला छोड़ने को मजबूर हैं, जिसके कारण शहर में कई जगहों पर ट्रैफिक जाम की स्थिति पैदा हो रही है।

मवेशियों के लिए 24x7 चिकित्सा शिविर स्थापित

पशुपालक खुद ही सुबह सत्तू बांधकर चारे की तलाश में दूर-दराज के इलाकों में भटकते नजर आते हैं। राहत शिविर और चिकित्सा शिविर जारी हैं। पशु संसाधन विभाग और जिला प्रशासन लगातार इस संकट पर नजर बनाये हुए है। आपदा प्रबंधन विभाग के नियंत्रण में पॉलिटेक्निक कॉलेज (बरारी), टीएनबी कॉलेज और बाल निकेतन जैसे प्रमुख राहत शिविरों में विस्थापित मवेशियों के लिए 24x7 चिकित्सा शिविर स्थापित किए जा रहे हैं। प्रशासन द्वारा प्रतिदिन बड़े पशुओं के लिए 6 किलो, छोटे पशुओं के लिए 3 किलो तथा बकरियों के लिए 1 किलो सूखा चारा वितरित किया जा रहा है। 

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पशुपालक बोले- सरकारी स्तर पर उपलब्ध चारा अपर्याप्त

बाढ़ के दूषित पानी के कारण मवेशियों में संक्रमण और कमजोरी के प्रसार को रोकने के लिए भागलपुर डेयरी और पशुपालन विभाग के डॉक्टरों की टीम द्वारा निःशुल्क पशु चिकित्सा शिविर चलाया जा रहा है, जहां जानवरों के स्वास्थ्य की जांच की जाती है और कृमिनाशक दवाएं और आवश्यक खुराक का वितरण किया जा रहा है। राहत शिविरों में रह रहे पशुपालकों का आरोप है कि पशुओं की संख्या अधिक होने के कारण सरकारी स्तर पर उपलब्ध चारा अपर्याप्त है। सुदूरवर्ती बाढ़ प्रभावित गांवों के अंदरूनी हिस्सों में पर्याप्त नावों के माध्यम से अभी भी भूसा नहीं पहुंच रहा है। पशुपालकों ने मांग की है कि प्रभावित इलाकों के हर गांव में युद्धस्तर पर सूखा और हरा चारा उपलब्ध कराया जाये, ताकि इस बेजुबान आबादी को भुखमरी और गंभीर बीमारियों से बचाया जा सके।

गाद हटाने से गंगा डॉल्फिन का आवास खतरे में

इस साल बाढ़ की विभीषिका झेलने के बाद भागलपुर के टूटे तटबंधों के सामने गंगा नदी में जमा बालू और गाद को हटाने के लिए ड्रेजिंग की तैयारी शुरू हो गयी है। दावा किया जाता है कि नदी तल साफ करने से जल प्रवाह में सुधार होगा और बाढ़-कटाव से राहत मिलेगी, लेकिन गंगा जैसी जीवंत नदी में बड़े पैमाने पर ड्रेजिंग सिर्फ एक तकनीकी अभ्यास नहीं है। पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस कदम से राष्ट्रीय जलीय जीव, गंगा डॉल्फिन और अन्य जलीय प्रजातियों के पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर खतरा हो सकता है।

यह क्षेत्र 'डॉल्फिन अभयारण्य' के रूप में संरक्षित

उल्लेखनीय है कि भागलपुर का सुल्तानगंज से कहलगांव तक का क्षेत्र 'विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य' के रूप में संरक्षित है। ड्रेजिंग के कारण नदी के शांत वातावरण में भारी मशीनों का शोर गूंजेगा। चूंकि डॉल्फिन देख नहीं सकतीं और दिशा और शिकार के लिए केवल 'इकोलोकेशन' (ध्वनि तरंगों) पर निर्भर रहती हैं, मशीनों का तेज शोर उन्हें भटका देगा और तनावग्रस्त कर देगा। इसके अतिरिक्त, तली को खोदने से पानी अत्यधिक गंदा हो जाएगा, जिससे पानी में ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाएगा और डॉल्फिन सहित कई मछलियों का दम घुट जाएगा। नदी के तल में जमा गाद और रेत कई जलीय जानवरों और छोटी मछलियों का प्राकृतिक आवास है, जो डॉल्फिन का मुख्य भोजन हैं। ड्रेजिंग इस पूरे खाद्य जाल को नष्ट कर सकती है।

FAQ

1- भागलपुर में बाढ़ आने का क्या कारण है?

बिहार में गंगा, गंडक, कोसी, बूढ़ी गंडक, पुनपुन और बागमती समेत कई नदियों के अलग-अलग जगहों पर खतरे के निशान से ऊपर बहने और नदियों के तल में मिट्टी और गाद जमा होने के कारण पानी गांवों तक फैल गया। 

2- बिहार के कितने जिले बाढ़ से प्रभावित हैं?

बिहार में नदियों के जलस्तर में वृद्धि के कारण राज्य के 15 जिलों के 575 ग्राम पंचायतों में करीब 47.92 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं।

3- बाढ़ पीड़ितों के लिए प्रशासन की ओर से क्या मदद दी जा रही है?

आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए विभिन्न जिलों में 1,245 सामुदायिक रसोई केंद्र संचालित किये जा रहे हैं। इन केन्द्रों के माध्यम से अब तक लगभग 73.30 लाख थाली भोजन उपलब्ध कराया जा चुका है। वहीं, 13 राहत शिविरों में 12,260 बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए आवास, भोजन और चिकित्सा सहित अन्य सुविधाओं की व्यवस्था की गई है।

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