world-alzheimer's-day: शुरुआती मानसिक बदलाव पर हो जाएं गंभीर,

खबर सार :-

मिडल एज के लोगों को शोध में शामिल किया गया। डॉक्टरों को इसमें जानना था कि क्या दिमागी प्रक्रियाओं में शामिल होने वाली जीन मिडिल एज पर किस हद तक प्रभाव डालते हैं?
world-alzheimer's-day: ब्लड टेस्ट से पहले मिल सकती है इस बीमारी को पहचानने में मदद

खबर विस्तार : -

नई दिल्ली, अल्जाइमर रोग के बारे में कुछ भ्रांतियां हैं, जिन पर हमें विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर जानकारी रखना जरूरी हो गया है। अल्जाइमर से जुड़े कुछ मामलों में लोग कहते हैं कि मिडिल एज में इसे पहचानने में कठिनाई होती है, लेकिन डॉक्टरों की एक खास स्टडी में यह बात निकल कर आई है कि ब्लड टेस्ट के जरिए भी अल्जाइमर से जुड़े शुरुआती बदलाव को पहचाना जा सकता है। यह रिपोर्ट शोध द लैंसेट में प्रकाशित हुई है। खून में अल्जाइमर से जुड़े कुछ खास बायो मार्कर्स की जांच करने पर डॉक्टरों की शोध को आगे बढ़ाया गया है।

मिडिल एज के लोगों पर किया शोध

 वैज्ञानिकों ने मिडल एज के लोगों को ही शोध में शामिल किया। इसमें फास्फोराईलेटेड टाई अमाइलाइड जैसे संकेत देखे गए हैं। यह दिमागी प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं। इनमें खास तौर पर शोध में पाया गया कि यह एक प्रोटीन है जिनमें होने वाले बदलाव अल्जाइमर से संबंधित हैं। आमतौर पर इसे बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारी ही माना जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे शरीर और दिमाग में बदलाव काफी महत्व रखते हैं, क्योंकि जब कभी शरीर में लक्षण दिखाई देने लगते हैं, उससे पहले ही यह अपना प्रभाव बना सकते हैं।

इनको शुरू के लक्षणों में पहचाना जा सकता है किंतु वह मिडल एज में हों। मिडल एज में रहने वाले लोगों को ही डॉक्टरों ने अपने शोध में शामिल करना उचित माना। इनमें अल्जाइमर के स्पष्ट लक्षण जरूरी नहीं थे। इन लोगों में अल्जाइमर से जुड़ी न्यूरोपैथोलॉजी के संकेत शोधकर्ताओं को पहले से मिले, ऐसा पाया गया। यह प्रचलित नहीं है। इसका मतलब यह कि जरूरी नहीं है कि सभी मामले एक जैसे हों। 

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सोचने और समझने में बदलाव अचानक नहीं आता

सोचने, समझने, याददाश्त को रखने के मामले आदि स्थिति को प्रशिक्षण में शामिल किया जाता है। यह शक्ति अपेक्षाकृत कुछ लोगों में कमजोर मिली। जिन लोगों में यह बायो मार्कर्स अल्जाइमर जुड़े पाए गए, उनमें यह सब जांच की गई। शोध में उम्र, बॉडी का मास इंडेक्स, किडनी की कार्य क्षमता और एपीओई जीन कई कारकों को ध्यान में रखने के बाद देखा गया और फिर आगे बढ़े।

डॉक्टरों ने अपने शोध में ऐसे भी कुछ संकेत दिए हैं कि यदि कम खर्चीले ब्लड टेस्ट शुरुआत में ही हो जाएं तो काफी मदद मिल सकती है। अगर आसान और कम खर्चीले ब्लड टेस्ट से इन बदलाव का संकेत पहले मिल जाए, इसका मतलब यह है की ब्लड टेस्ट ज्यादा खर्चीले होने के कारण समय पर नहीं कराए जाते हैं। अल्जाइमर की बीमारी को पहचानने में यह कुछ कारण पीछे कर देते हैं। 

शोध में चार जीन पर किया गया मंथन

लक्षण सामने आने तक दिमाग में इनसे जुड़े बदलाव काफी पहले से चला करते हैं। शोध में यह भी बताया गया है कि ऐसे संबंधों में लिंग, एपीओए जीन और नस्लीय समूह के अनुसार अंतर हो सकता है। यह तुलना सभी में समान नहीं रहा है। इसमें बताया गया है कि महिलाओं में अधिक मजबूत संबंध दिखाई दिए। विश्लेषण में ब्लैक प्रतिभागियों एपीओई चार जीन वाले लोगों को शोध में शामिल किया गया। ब्लड टेस्ट भी अलग-अलग हो सकते हैं।

जरूरी नहीं है कि यह सामान्य ब्लड टेस्ट अभी अल्जाइमर की निश्चित भविष्यवाणी का आधार बन सकें। इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति के लिए सामान्य ब्लड टेस्ट हों, रिसर्च के शुरुआती पहचान वाली प्रक्रिया में यह संभावनाएं जताई गई हैं।

जैविक बदलाव के लक्षण शुरुआत हो सकती

 ऐसे मामलों को लेकर अभी टेस्ट के इस्तेमाल की सटीक पद्धति और क्लीनिकल उपयोग को लेकर आगे और अध्ययन करने की जरूरत है। यदि इस संबंध में आगे शोध किए जाएं, हो सकता है कि वर्तमान शोध में कुछ अंतर पाया जाए। ऐसा भी डॉक्टरों ने कहा है कि फिर भी स्टडी इस बात को मजबूती देती है कि अल्जाइमर केवल बुढ़ापे में अचानक शुरू होने वाली बीमारी नहीं है। यह कई साल पहले जब शरीर में बदलाव, जैविक बदलाव के लक्षण दिखने लगें, तब भी यह इसकी शुरुआत हो सकती है। बहरहाल यह तो तय है कि यदि किसी भी बीमारी की जांच समय पर कर ली जाए और उनके टेस्ट में कुछ पाया जाता है तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए।

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