लखनऊ: गोमतीनगर के तीन साल के मासूम कार्तिक के लिए 16 अगस्त की रात किसी दुःस्वप्न से कम नहीं थी। एक भयावह हादसे में वह लगभग 20 फीट की ऊंचाई से नीचे गिर गया। नीचे गिरी रेलिंग की लोहे की छड़ उसके सिर और कंधे के आर-पार हो गई। दर्द से तड़पते बच्चे को परिजन एक निजी अस्पताल लेकर गए, जहां ऑपरेशन का खर्च 15 लाख रुपए से ज्यादा बताया गया।
निराश और असहाय परिवार रात लगभग 11:45 बजे उस भयानक लोहे की ग्रिल के साथ ही बच्चे को लेकर किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के ट्रॉमा सेंटर पहुंचा।
बच्चे की गंभीर हालत को देखते हुए, KGMU की न्यूरोसर्जरी टीम तुरंत हरकत में आई। यह सिर्फ एक सर्जरी नहीं थी, बल्कि चुनौतियों का एक पहाड़ था।
पहली चुनौती: बच्चे के सिर में धंसी हुई ग्रिल को काटना। ग्रिल सिर के इतने करीब थी कि इसे काटना बहुत जोखिम भरा था। रात में ही एक्सपर्ट्स को बुलाया गया, लेकिन कोई भी औजार कामयाब नहीं हुआ।
दूसरी चुनौती: ग्रिल के साथ सीटी स्कैन करना नामुमकिन था, जिससे ऑपरेशन की योजना बनाना मुश्किल हो रहा था।
तीसरी चुनौती: ऑपरेशन टेबल पर बच्चे को सही से लिटाना, क्योंकि लोहे की छड़ उसके सिर के आर-पार थी।
इन सभी बाधाओं के बावजूद, न्यूरोसर्जरी के विभागाध्यक्ष डॉ. बीके ओझा की देखरेख में डॉ. अंकुर बजाज ने अपनी टीम के साथ मिलकर एक साहसिक फैसला लिया: ऑपरेशन करने का। डॉ. सौरभ रैना, डॉ. जेसन और डॉ. बसु भी इस मुश्किल ऑपरेशन का हिस्सा थे। एनेस्थीसिया और ट्रॉमा सर्जरी के विभागों ने भी इस सर्जरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लगभग साढ़े तीन घंटे तक चली इस मैराथन सर्जरी के बाद डॉक्टरों की मेहनत रंग लाई और उन्होंने लोहे की छड़ को बच्चे के सिर और कंधे से सफलतापूर्वक निकाल दिया। यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि मौत और जिंदगी के बीच की जंग थी, जिसे KGMU की टीम ने जीत लिया।
अब बच्चे की हालत में सुधार है, और वह बाल रोग विभाग के आईसीयू में वेंटिलेटर पर है। उसकी जान बचाने वाली टीम को भावुक परिजनों ने "भगवान का स्वरूप" बताया और KGMU को "मंदिर" की संज्ञा दी।
कुलपति पद्मश्री श्रीमती सोनिया नित्यानंद ने पूरी टीम की सराहना करते हुए कहा कि यह KGMU की उत्कृष्ट चिकित्सा क्षमता का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह मेडिकल साइंस का वो चमत्कार था, जिसने एक मासूम को नई जिंदगी दी।
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