झारखंड में सड़क हादसों का कहर जारी: जनवरी से जून 2026 के बीच 2,478 लोगों की मौत

खबर सार :-

झारखंड में सड़क हादसों के आंकड़े डराने वाले हैं। जनवरी से जून 2026 के बीच राज्य में 3,078 दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 2,478 लोगों की मौत दर्ज की गई।
झारखंड में सड़क हादसे: छह माह में 2,478 मौतें, तेज रफ्तार बनी बड़ी चुनौती

खबर विस्तार : -

रांची : झारखंड में सड़क दुर्घटनाएं एक गंभीर सामाजिक और मानवीय चुनौती के रूप में सामने आ रही हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चालू वर्ष 2026 के पहले छह महीनों यानी जनवरी से जून के दौरान राज्यभर में कुल 3,078 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। इन हादसों में 2,478 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस प्रकार, छह महीने की अवधि में औसतन हर दिन करीब 17 दुर्घटनाएं हुईं और लगभग 14 लोगों की मौत दर्ज की गई।

पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े भी सड़क हादसों की भयावहता को स्पष्ट करते हैं। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2021 में 3,513, 2022 में 3,898, 2023 में 4,173 और 2024 में 4,114 लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत हुई थी। इसके अलावा, वर्ष 2025 में जनवरी से नवंबर के बीच 4,111 मौतें दर्ज की गईं। इन सभी अवधियों के आंकड़ों को मिलाने पर मृतकों की कुल संख्या 19,809 होती है, हालांकि 2025 का आंकड़ा नवंबर तक और 2026 का आंकड़ा जून तक का ही है।

विभिन्न जिलों में दुर्घटनाओं की स्थिति

राज्य पुलिस मुख्यालय के 2026 के पहले छह महीनों के आंकड़ों के अनुसार, राजधानी रांची में सबसे अधिक 408 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 286 लोगों की मौत हुई। इसके अलावा धनबाद में 208 हादसों में 118, हजारीबाग में 195 हादसों में 163 और गिरिडीह में 194 हादसों में 180 लोगों की जान गई।

पलामू में 170 दुर्घटनाओं में 135, बोकारो में 169 में 125, पूर्वी सिंहभूम में 166 में 117, गुमला में 150 में 136, दुमका में 134 में 122 और रामगढ़ में 126 हादसों में 107 लोगों की मौत दर्ज की गई। इसके अतिरिक्त देवघर, सरायकेला-खरसावां, पश्चिमी सिंहभूम, चतरा, सिमडेगा, लातेहार, गोड्डा, साहिबगंज, लोहरदगा, कोडरमा, जामताड़ा और पाकुड़ में भी सड़क हादसों में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है।

गिरिडीह, गुमला, पश्चिमी सिंहभूम और सिमडेगा जैसे जिलों के आंकड़े विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करते हैं, जहां दुर्घटनाओं की कुल संख्या की तुलना में मृतकों का आंकड़ा काफी अधिक है। इन आंकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि सड़क की स्थिति, वाहनों की गति, दुर्घटना के प्रकार और घायलों को समय पर चिकित्सा मिलने जैसे पहलुओं का अध्ययन करना बेहद जरूरी है।

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राष्ट्रीय राजमार्गों और तेज रफ्तार पर चिंता

राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी दुर्घटनाओं की स्थिति काफी गंभीर बनी हुई है। आंकड़ों के अनुसार, झारखंड के राष्ट्रीय राजमार्गों पर 2023 में 313 दुर्घटनाओं में 291 लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 2024 में यह संख्या बढ़कर 427 दुर्घटनाओं और 354 मौतों तक पहुंच गई, जबकि 2025 में 383 दुर्घटनाओं में 326 लोगों की जान गई। राष्ट्रीय राजमार्गों पर तेज रफ्तार, भारी वाहनों की आवाजाही, सड़क किनारे खड़े वाहन, अनियंत्रित कट और रात के समय कम दृश्यता जैसी समस्याएं जोखिम को और बढ़ा देती हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में तेज रफ्तार से जुड़ी कुल 3,715 दुर्घटनाएं हुईं। इनमें 2,910 लोगों की मौत हुई और 2,149 लोग घायल हुए। तेज रफ्तार के अलावा शराब या नशीले पदार्थों के सेवन के बाद वाहन चलाना, गलत तरीके से ओवरटेकिंग करना, हेलमेट और सीट बेल्ट का उपयोग न करना तथा ड्राइविंग के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना भी बड़े जोखिम कारक हैं।

समय और सड़क किनारे पार्किंग का जोखिम

एनसीआरबी के 2024 के आंकड़ों से यह भी सामने आया है कि शाम छह बजे से रात नौ बजे के बीच सबसे अधिक 1,079 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं। इसके बाद दोपहर तीन से शाम छह बजे के बीच 946 हादसे हुए। इस समय के दौरान बढ़ता यातायात, अंधेरा और कुछ मार्गों पर प्रकाश व्यवस्था का अभाव मुख्य कारण माने जा रहे हैं।

सड़क सुरक्षा के मुद्दे पर राज्य के परिवहन मंत्री दीपक बिरुवा ने जिलों के उपायुक्तों, जिला परिवहन पदाधिकारियों, मोटर वाहन निरीक्षकों और आम नागरिकों से अपील की है कि वे मुख्य और सहायक सड़कों पर अपने वाहन पार्क न करें। मंत्री के अनुसार, सड़क पर वाहन खड़े रहने से आवागमन बाधित होता है और दुर्घटनाओं की आशंका काफी बढ़ जाती है। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। सड़क सुरक्षा केवल हादसों को रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि दुर्घटना के बाद घायलों को समय पर उपचार उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने में होने वाली देरी स्थिति को और गंभीर बना सकती है। ब्लैक स्पॉट के आसपास एंबुलेंस की उपलब्धता, प्राथमिक उपचार और ट्रॉमा केयर सुविधाओं को मजबूत करना आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल चालान काटने और प्रवर्तन के भरोसे सड़क दुर्घटनाओं को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए सड़क डिजाइन, गति सीमा, भारी वाहनों की निगरानी और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर एक साथ काम करने की जरूरत है।

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