स्टिंग ऑपरेशन से अदालती चक्कर तक: तरुण तेजपाल कानूनी लड़ाई और 13 साल का सफर

खबर सार :-

तहलका के पूर्व मुख्य संपादक तरुण तेजपाल को 2013 के यौन उत्पीड़न मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद 13 साल लंबा कानूनी घटनाक्रम एक बार फिर चर्चा में है।
तरुण तेजपाल केस: खोजी पत्रकारिता से कानूनी उलझन तक का सफर

खबर विस्तार : -

New Delhi : तहलका पत्रिका के जरिए देश में चर्चित खोजी पत्रकारिता और स्टिंग ऑपरेशनों का नेतृत्व करने वाले पूर्व मुख्य संपादक तरुण तेजपाल आज खुद एक लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौर से गुजर रहे हैं। वर्ष 2013 में अपनी ही एक महिला सहकर्मी द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद से शुरू हुआ यह मामला पिछले 13 वर्षों में कई अदालती पड़ावों और कानूनी बहसों का गवाह रहा है। हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ द्वारा सत्र अदालत के बरी करने के फैसले को पलटते हुए 10 साल की सजा सुनाए जाने के बाद तेजपाल ने इस कानूनी लड़ाई को सर्वोच्च न्यायालय ले जाने का फैसला किया है।

निचली अदालत से उच्च न्यायालय तक का कानूनी सफर

यह मामला पहली बार नवंबर 2013 में सामने आया था, जब गोवा में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान तरुण तेजपाल पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा था। इसके तुरंत बाद दर्ज एफआईआर के बाद पुलिस जांच, गिरफ्तारी और चार्जशीट की प्रक्रिया शुरू हुई। जुलाई 2014 में शीर्ष अदालत से जमानत मिलने तक तेजपाल को हिरासत में रहना पड़ा। इसके बाद सत्र अदालत में लगभग साढ़े सात साल तक मुकदमा चला। मई 2021 में गोवा की सत्र अदालत ने साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद तेजपाल को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया था। हालांकि, राज्य सरकार ने इस फैसले को स्वीकार न करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच में अपील दायर की। उच्च न्यायालय में चली लंबी सुनवाई के बाद आखिरकार अगस्त 2026 में सत्र अदालत के फैसले को रद्द कर दिया गया और तेजपाल को दोषी ठहराया गया।

बचाव पक्ष का तर्क और राजनीतिक प्रतिशोध का दावा

कानूनी प्रक्रियाओं के बीच तरुण तेजपाल और उनके कानूनी दल ने लगातार यह तर्क दिया है कि उन्हें दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाया गया है। तेजपाल के अनुसार, तहलका द्वारा की गई खोजी पत्रकारिता और रिपोर्टिंग से कई राजनीतिक व प्रशासनिक हित प्रभावित हुए थे, जिसके कारण उनके खिलाफ यह कार्रवाई की गई। अदालत में सजा सुनाए जाने के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने नरमी की अपील करते हुए तर्क दिया कि तेजपाल पिछले 13 वर्षों से इस कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं और वे दो बेटियों के पिता हैं। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता को रेखांकित करते हुए सख्त सजा की मांग की, जिसे स्वीकार करते हुए अदालत ने 10 साल के कठोर कारावास का आदेश पारित किया।

शीर्ष अदालत में चुनौती देने की तैयारी

अदालती आदेश के बाद तरुण तेजपाल ने स्पष्ट किया कि वे उच्च न्यायालय के इस फैसले से सहमत नहीं हैं और न्याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे। उनका कहना है कि वे ट्रायल कोर्ट के दौरान अपने निर्दोष होने के प्रमाण पेश कर चुके हैं और अब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपने सभी साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे। अदालत ने उन्हें आत्मसमर्पण के लिए प्रारंभ में दो सप्ताह का समय दिया था, जिसे बाद में बचाव पक्ष के आवेदन पर बढ़ाकर चार सप्ताह कर दिया गया है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सर्वोच्च न्यायालय में दायर होने वाली याचिका में बचाव पक्ष किन मुख्य कानूनी बिंदुओं को आधार बनाता है।

साल 2013 में मामला दर्ज होने के बाद से ही इस केस में कई महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ आए। 2017 में तेजपाल ने अपने खिलाफ तय आरोपों को रद्द कराने के लिए याचिका दाखिल की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने केस का तेजी से निपटारा करने के निर्देश दिए थे। 2021 में ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के बाद राज्य सरकार की अपील पर 6 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बरी करने के आदेश को निरस्त कर दिया और 10 साल की जेल व 10 लाख रुपये जुर्माने का फैसला सुनाया।

FAQ...

1: तरुण तेजपाल कौन हैं?

तरुण तेजपाल 'तहलका' पत्रिका के संस्थापक और पूर्व मुख्य संपादक हैं, जो अपनी खोजी पत्रकारिता और स्टिंग ऑपरेशन्स के लिए जाने जाते हैं।

2: उनके खिलाफ क्या मामला दर्ज था?

उन पर नवंबर 2013 में गोवा के एक होटल में अपनी ही सहकर्मी (महिला पत्रकार) का यौन उत्पीड़न करने का आरोप था।

3: बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है?

उच्च न्यायालय की गोवा पीठ ने निचली अदालत से बरी करने का फैसला पलटते हुए तेजपाल को दोषी ठहराया और 10 साल के सश्रम कारावास के साथ 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

4: क्या उन्हें तुरंत जेल जाना होगा?

अदालत ने उन्हें आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।

5: इस फैसले पर तरुण तेजपाल का क्या रुख है?

तेजपाल ने फैसले पर निराशा जताई है, इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया है और कहा है कि वे इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।

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