Assam Floods: देबब्रत सैकिया ने असम सरकार से की पुनर्वास परियोजना शुरू करने की अपील

खबर सार :-

असम के पूर्व नेता प्रतिपक्ष देबब्रत सैकिया ने डीएमएफटी और पीएमकेकेकेवाई के तहत स्पेशल इंटीग्रेटेड दिखो नदी बेसिन पुनर्वास परियोजना शुरू करने की मांग की। उन्होंने बाढ़ प्रभावित परिवारों के दीर्घकालिक पुनर्वास और पारिस्थितिक बहाली पर जोर दिया।
Assam Floods: देबब्रत सैकिया ने असम सरकार से की पुनर्वास परियोजना शुरू करने की अपील

खबर विस्तार : -

गुवाहाटी: असम के पूर्व नेता प्रतिपक्ष और पूर्व विधायक देबब्रत सैकिया ने राज्य सरकार से डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) और प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेकेवाई) के तहत एक स्पेशल इंटीग्रेटेड दिखो नदी बेसिन पुनर्वास परियोजना शुरू करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि हालिया बाढ़ ने ऊपरी असम के कई जिलों में व्यापक तबाही मचाई है और अब केवल राहत पैकेज से काम नहीं चलेगा। इसके लिए दीर्घकालिक पुनर्वास, वैज्ञानिक अध्ययन और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन पर आधारित व्यापक योजना लागू की जानी चाहिए।

आम लोगों को हो रही भारी हानि

मुख्य सचिव रवि कोटा को सौंपे गए एक विस्तृत ज्ञापन में सैकिया ने कहा कि शिवसागर, चराईदेव, जोरहाट और आसपास के जिलों में आई विनाशकारी बाढ़ ने हजारों परिवारों की आजीविका और आवास को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ऐसे में सरकार को अस्थायी राहत उपायों से आगे बढ़ते हुए दीर्घकालिक पुनर्वास नीति तैयार करनी चाहिए।

सैकिया ने अपने ज्ञापन में विशेष रूप से शिवसागर जिले की स्थिति का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हालिया बाढ़ के दौरान यह जिला सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल रहा, जहां अलग-अलग चरणों में लगभग तीन लाख लोग प्रभावित हुए। नजीरा को-डिस्ट्रिक्ट में हालात और भी गंभीर रहे, जहां बड़ी संख्या में घर क्षतिग्रस्त हुए, खेती की जमीन बर्बाद हुई, मत्स्य पालन को नुकसान पहुंचा, पशुधन की हानि हुई और कई गांव लंबे समय तक पानी में डूबे रहे।

कांग्रेस नेता ने सुझाव दिया कि पूरे दिखो नदी बेसिन को डीएमएफटी और पीएमकेकेकेवाई के तहत एक विशेष पुनर्वास परियोजना घोषित किया जाए। उनका कहना है कि इन योजनाओं के माध्यम से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग केवल खनन प्रभावित क्षेत्रों तक सीमित न रहकर उन इलाकों में भी किया जाना चाहिए, जहां खनन और पर्यावरणीय बदलावों का अप्रत्यक्ष प्रभाव बाढ़ और भूमि क्षरण के रूप में सामने आ रहा है।

विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग 

हालांकि सैकिया ने बाढ़ के लिए सीधे तौर पर खनन गतिविधियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया, लेकिन उन्होंने इस संबंध में व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि अधिकृत और अवैध खनन, नदी के प्राकृतिक स्वरूप में हुए बदलाव, तटों पर बढ़ते अतिक्रमण और अन्य मानवीय हस्तक्षेपों ने किस हद तक बाढ़ की गंभीरता को बढ़ाया है।

उन्होंने सरकार से एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने की भी मांग की है। प्रस्तावित समिति में खान एवं खनिज विभाग, जल संसाधन विभाग, असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एएसडीएमए), आईआईटी गुवाहाटी के विशेषज्ञ, नदी वैज्ञानिक, पर्यावरण विशेषज्ञ और प्रभावित समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल करने का सुझाव दिया गया है। यह समिति दिखो नदी बेसिन में खनन गतिविधियों के समग्र प्रभाव का अध्ययन करेगी और भविष्य में बाढ़ की पुनरावृत्ति रोकने के लिए दीर्घकालिक समाधान सुझाएगी।

ज्ञापन में बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए कई अन्य महत्वपूर्ण मांगें भी रखी गई हैं। इनमें स्थायी और आपदा-प्रतिरोधी आवासों का निर्माण, आजीविका बहाल करने के लिए विशेष अनुदान, कृषि भूमि से वैज्ञानिक तरीके से रेत और गाद हटाने की योजना, क्षतिग्रस्त सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण, दिखो नदी के पारिस्थितिक तंत्र की बहाली, खनन गतिविधियों की कड़ी निगरानी और डीएमएफटी फंड के पारदर्शी उपयोग की व्यवस्था शामिल है।

स्थायी समाधान की मांग

सैकिया ने कहा कि वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा घोषित मुआवजा उन परिवारों के लिए पर्याप्त नहीं है जिन्होंने अपने घर, खेती, पशुधन और रोजगार के साधन पूरी तरह खो दिए हैं। उनका मानना है कि केवल आर्थिक सहायता देने के बजाय सरकार को पुनर्वास, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलने वाली समग्र नीति अपनानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण असम में बाढ़ की चुनौती लगातार बढ़ रही है। इसलिए भविष्य में ऐसी आपदाओं से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए वैज्ञानिक योजना, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

सैकिया की यह मांग ऐसे समय आई है जब असम के कई हिस्से लगातार बाढ़ और नदी कटाव की समस्या का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का भी मानना है कि केवल राहत और मुआवजे की नीति से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। नदी बेसिन आधारित समग्र प्रबंधन, पर्यावरणीय संतुलन की बहाली और स्थानीय लोगों की आजीविका को सुरक्षित करने वाली योजनाएं ही भविष्य में ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम कर सकती हैं।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती है और क्या दिखो नदी बेसिन के लिए किसी विशेष पुनर्वास एवं पारिस्थितिक पुनर्स्थापन परियोजना की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं।

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