बिहार में शराबबंदी पर नई बहस: NCAER की रिपोर्ट ने बढ़ाई सरकार की चुनौती, राजस्व बढ़ाने की सिफारिश

खबर सार :-

बिहार में पूर्ण शराबबंदी के करीब एक दशक बाद NCAER की रिपोर्ट ने नीति पर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट ने नियंत्रित शराब बिक्री और आबकारी कर बहाल करने की सिफारिश की है।
बिहार: NCAER की रिपोर्ट ने बढ़ाई सरकार की चुनौती

खबर विस्तार : -

पटनाः बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए करीब एक दशक पूरा होने के बीच एक नई शोध रिपोर्ट ने इस नीति को लेकर राजनीतिक और आर्थिक बहस तेज कर दी है। देश के प्रमुख आर्थिक शोध संस्थानों में शामिल नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की एक स्टडी में बिहार में पूर्ण शराबबंदी खत्म कर नियंत्रित तरीके से शराब की बिक्री शुरू करने और आबकारी कर व्यवस्था बहाल करने की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यदि राज्य में नियंत्रित शराब बिक्री की अनुमति दी जाती है तो बिहार के अपने राजस्व में करीब 14 से 15 फीसदी तक की वृद्धि हो सकती है।

रिपोर्ट सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा के नेतृत्व वाली सम्राट चौधरी सरकार शराबबंदी की मौजूदा नीति में बदलाव की दिशा में आगे बढ़ेगी। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण हो गया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) इस तरह के किसी प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती है। फिलहाल सत्तारूढ़ गठबंधन में शराबबंदी खत्म करने को लेकर किसी स्पष्ट सहमति के संकेत नहीं मिले हैं।

शराबबंदी पर जदयू का रुख साफ

जदयू की ओर से शराबबंदी की समीक्षा या इसे खत्म करने की संभावना को फिलहाल खारिज किया गया है। दरअसल, बिहार में शराबबंदी केवल एक प्रशासनिक नीति नहीं, बल्कि नीतीश कुमार की राजनीतिक पहचान और सामाजिक सुधार के एजेंडे का अहम हिस्सा रही है।

अप्रैल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं की मांग और सामाजिक सुधार को आधार बनाते हुए बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी। इसके बाद शराबबंदी उनकी सरकार की प्रमुख नीतियों में शामिल हो गई। राज्य सरकार लगातार इसे सामाजिक सुधार और परिवारों पर शराब के नकारात्मक प्रभाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर प्रस्तुत करती रही है। हालांकि, शराबबंदी लागू होने के बाद से ही इसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। राज्य में अवैध शराब की तस्करी, दूसरे राज्यों से शराब की खेप आने और कानून के उल्लंघन के मामलों ने सरकार के सामने लगातार चुनौती पेश की है।

NCAER रिपोर्ट में अवैध कारोबार का भी जिक्र

NCAER की स्टडी में शराबबंदी के आर्थिक प्रभाव के साथ-साथ इसके क्रियान्वयन से जुड़ी चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है। रिपोर्ट में अवैध शराब की तस्करी और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की संभावनाओं का उल्लेख किया गया है। साथ ही पूर्ण शराबबंदी को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक स्तर पर आने वाली चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। राज्य के लिए आबकारी कर लंबे समय से राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। ऐसे में शराबबंदी के कारण इस स्रोत से होने वाली आय बंद होने का असर राज्य के वित्त पर भी पड़ता है। NCAER की रिपोर्ट में नियंत्रित बिक्री और आबकारी कर व्यवस्था बहाल करने को संभावित राजस्व वृद्धि के एक विकल्प के रूप में देखा गया है।

जीतन राम मांझी ने गुजरात मॉडल की बात कही

सत्ता पक्ष के भीतर भी शराबबंदी के क्रियान्वयन को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी लंबे समय से बिहार की शराबबंदी नीति के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठाते रहे हैं। NCAER की रिपोर्ट सामने आने के बाद मांझी ने गुजरात की तर्ज पर बिहार में शराबबंदी कानून लागू करने की बात कही है। उनका यह रुख इस मुद्दे पर गठबंधन के भीतर मौजूद अलग-अलग विचारों को भी सामने लाता है। हालांकि, शराबबंदी खत्म करने को लेकर सरकार की ओर से अभी कोई औपचारिक निर्णय सामने नहीं आया है।

राजद ने भी सरकार को घेरा

विपक्ष ने भी NCAER की रिपोर्ट के बाद सरकार पर निशाना साधा है। राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने शराबबंदी कानून को लेकर सरकार की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिहार में शराबबंदी बिना किसी सर्वे के लागू की गई थी और वह इसके गवाह हैं। उन्होंने नेपाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमाओं से होने वाली शराब तस्करी पर सरकार से गंभीर कार्रवाई की मांग की। भाई वीरेंद्र ने अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि शराब की बड़ी खेप पकड़े जाने के मामलों में कार्रवाई के नाम पर कुछ ही ट्रकों को पकड़कर उपलब्धि के तौर पर पेश किया जाता है।

भाजपा ने कहा- कैबिनेट लेगी सामूहिक फैसला

भाजपा प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने कहा कि अलग-अलग शोध संस्थानों की रिपोर्ट समय-समय पर सामने आती रहती हैं और बिहार सरकार सभी विषयों पर विचार करती है। उन्होंने कहा कि शराबबंदी और पूर्ण शराबबंदी का फैसला सामूहिक निर्णय था और 2016 में लगभग सभी राजनीतिक दलों ने इसका समर्थन किया था। कुंतल कृष्ण के मुताबिक शराबबंदी की समय-समय पर समीक्षा होती रही है और नई रिपोर्ट के निष्कर्षों की भी समीक्षा की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि आगे क्या फैसला लिया जाना है, यह कैबिनेट का सामूहिक निर्णय होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि बिहार की जनता ने दो आम चुनावों में पूर्ण शराबबंदी के मुद्दे पर अपना समर्थन दिया है और यह भी सरकार के लिए विचार करने योग्य तथ्य है।

फिलहाल बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू है। ऐसे में NCAER की रिपोर्ट ने सरकार के सामने आर्थिक राजस्व, सामाजिक प्रभाव, कानून के क्रियान्वयन और राजनीतिक प्रतिबद्धता के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को फिर सामने ला दिया है। आने वाले दिनों में सरकार रिपोर्ट के निष्कर्षों को किस नजरिए से देखती है और शराबबंदी की मौजूदा नीति में किसी बदलाव की दिशा में कदम उठाती है या नहीं, इस पर सभी की नजर रहेगी।

यह भी पढ़ेंः-सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, राहुल गांधी बिगड़े दिल शहजादे, गृह मंत्री बिंदुवार जवाब देने को तैयार, सदन से भाग रही कांग्रेस
 

अन्य प्रमुख खबरें