UPI पर MDR की नई कहानी: टैक्स नहीं, डिजिटल सिस्टम अपग्रेड का जरिया, पई-कामथ ने गिनाए असर और फायदे

खबर सार :-

UPI पर MDR की व्यवस्था डिजिटल भुगतान के बढ़ते पैमाने के साथ लागत और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत को सामने लाती है। पई इसे टैक्स के बजाय भुगतान तंत्र की लागत में भागीदारी मानते हैं, जबकि कामथ ब्रोकिंग जैसे कारोबारों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव की चिंता जताते हैं। ऐसे में आगे की चुनौती ऐसी शुल्क संरचना तैयार करने की होगी, जो डिजिटल भुगतान के विस्तार के साथ विभिन्न उद्योगों की व्यावहारिक जरूरतों को भी संतुलित करे।
UPI पर MDR की एंट्री: टैक्स नहीं, डिजिटल सिस्टम अपग्रेड की नई राह

खबर विस्तार : -

UPI MDR Digital Infrastructure: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू किए जाने को लेकर बहस तेज हो गई है। आरिन कैपिटल के चेयरमैन और इंफोसिस के पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) टीवी मोहनदास पई ने इस व्यवस्था का समर्थन करते हुए कहा है कि इसे टैक्स के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक MDR बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को मिलने वाला शुल्क है, जिसका इस्तेमाल बढ़ते डिजिटल भुगतान तंत्र को बनाए रखने और अपग्रेड करने में मदद कर सकता है।

96% UPI ट्रांजैक्शन पर नहीं लगेगा MDR

बेंगलुरु में पत्रकारों से बातचीत में पई ने कहा कि करीब 70 प्रतिशत UPI लेनदेन व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P श्रेणी में आते हैं। इन भुगतानों पर किसी तरह का शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इसके अलावा 2,000 रुपये तक के सभी भुगतान भी शुल्क मुक्त रहेंगे। उनके अनुसार केवल 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारी यानी P2M भुगतान MDR के दायरे में आएंगे। पई ने इस आधार पर कहा कि करीब 96 प्रतिशत UPI ट्रांजैक्शन MDR के दायरे से बाहर रहेंगे। उन्होंने जोर दिया कि MDR को टैक्स कहना सही नहीं है। यह एक तरह का प्रोसेसिंग शुल्क है, जो भुगतान के बुनियादी ढांचे को संचालित करने वाले बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को मिलता है।

क्रेडिट कार्ड से दी तुलना

पई ने MDR को समझाने के लिए क्रेडिट कार्ड का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि क्रेडिट कार्ड से भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी को कार्ड कंपनी और बैंक को प्रोसेसिंग शुल्क देना पड़ता है। इसी तरह UPI सिस्टम को संचालित करने और उसके लिए जरूरी तकनीकी ढांचे में निवेश करने की लागत भी कहीं न कहीं से पूरी करनी होगी। उन्होंने यह भी उदाहरण दिया कि अगर किसी व्यक्ति को 2,500 रुपये का भुगतान करना है तो वह इसे 1,500 रुपये और 1,000 रुपये के दो अलग-अलग भुगतान में बांट सकता है। इस तरह दोनों लेनदेन 2,000 रुपये की सीमा से नीचे रहेंगे।

बढ़ते ट्रांजैक्शन के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती

पई का तर्क है कि UPI का विस्तार जितनी तेजी से हो रहा है, उसके साथ तकनीकी ढांचे पर दबाव भी बढ़ रहा है। उनके मुताबिक सिस्टम को बनाए रखने और लगातार बेहतर बनाने के लिए भारी पूंजी निवेश के साथ-साथ परिचालन खर्च भी होता है। उन्होंने कहा कि अतीत में ट्रांजैक्शन की संख्या अचानक बढ़ने पर UPI में 15 से 30 प्रतिशत तक लेनदेन विफल होने की समस्या सामने आ चुकी है। आने वाले समय में भुगतान की मात्रा और बढ़ने की संभावना है, जिससे सिस्टम की क्षमता बढ़ाना जरूरी होगा। पई के अनुसार अगले दो वर्षों में UPI ट्रांजैक्शन की संख्या 24 अरब से बढ़कर 50 अरब तक पहुंच सकती है। ऐसे में पूरे IT इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना होगा, ताकि रियल-टाइम भुगतान को बिना रुकावट संभाला जा सके।

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सवाल-अपग्रेड का खर्च कौन उठाएगा?

पई ने सवाल उठाया कि डिजिटल पेमेंट सिस्टम के इस विस्तार और अपग्रेड की लागत कौन वहन करेगा। उनका कहना है कि अगर पूरा खर्च बैंक उठाते हैं तो इसका असर अंततः जमाकर्ताओं पर पड़ सकता है। ऐसे में लागत का एक हिस्सा उन व्यापारियों से लिया जाना तर्कसंगत है, जिन्हें डिजिटल भुगतान स्वीकार करने से सीधे लाभ मिलता है। राजस्थान वित्त आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी ने भी UPI की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि दुनिया भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति की सराहना कर रही है। उनके अनुसार UPI ने भारत को डिजिटल और आर्थिक लेनदेन के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अलग पहचान दिलाई है।

Digital Payment-UPI MDR-P2M Payment

नितिन कामथ ने बताया दूसरा पहलू

जेरोधा के सीईओ नितिन कामथ ने भी P2M UPI भुगतानों पर MDR लागू किए जाने का समर्थन किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने कहा कि UPI के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के बाद किसी न किसी समय MDR लागू होना लगभग तय था। कामथ के मुताबिक MDR से UPI इकोसिस्टम में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि फिलहाल UPI बाजार का 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा तीन ऐप्स के पास है और नया शुल्क ढांचा इस एकाग्रता को कम करने में मदद कर सकता है। हालांकि, कामथ ने निवेश और ब्रोकिंग कारोबार को लेकर अलग चिंता जताई। उनके मुताबिक ब्रोकर यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि ग्राहक द्वारा UPI से ट्रांसफर किया गया पैसा वास्तव में ट्रेडिंग में इस्तेमाल होगा या नहीं। ग्राहक फंड जमा करने के बाद ट्रेड करे, इसके लिए ब्रोकर उसे बाध्य नहीं कर सकता।

ब्रोकर्स पर बढ़ सकता है लागत का दबाव

कामथ ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि 10,000 ग्राहक एक महीने में 2 लाख रुपये के 50-50 UPI ट्रांसफर करें और बाद में कोई ट्रेड न करें, तो प्रस्तावित MDR व्यवस्था के तहत ब्रोकर पर करीब 2 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आ सकता है। उन्होंने क्वार्टरली सेटलमेंट नियमों का भी उल्लेख किया। इसके तहत ब्रोकरों को ग्राहकों के अप्रयुक्त फंड को तय अंतराल पर उनके बैंक खातों में वापस भेजना होता है। ग्राहक अक्सर यही रकम दोबारा अपने ब्रोकिंग खातों में जमा करते हैं और कामथ के मुताबिक इनमें आधे से अधिक ट्रांसफर UPI के जरिए होते हैं। इससे एक ही ग्राहक के फंड के बार-बार आने-जाने पर ब्रोकर को UPI शुल्क देना पड़ सकता है, जबकि इस प्रक्रिया से उसके राजस्व में जरूरी नहीं कि कोई अतिरिक्त वृद्धि हो।

MDR पर अब लागत बनाम विस्तार की बहस

UPI MDR को लेकर सामने आए दोनों प्रमुख तर्क डिजिटल भुगतान व्यवस्था के दो अलग पहलुओं को सामने रखते हैं। पई इसे बढ़ते ट्रांजैक्शन वॉल्यूम के अनुरूप तकनीकी ढांचे को मजबूत करने की लागत से जोड़ते हैं, जबकि कामथ निवेश और ब्रोकिंग जैसे क्षेत्रों में बार-बार होने वाले फंड ट्रांसफर पर पड़ने वाले खर्च की ओर ध्यान दिलाते हैं। इसलिए आगे की चर्चा सिर्फ MDR लागू करने या न करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भी अहम होगा कि अलग-अलग कारोबारों और भुगतान के प्रकारों के लिए शुल्क व्यवस्था किस तरह तय की जाती है।

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FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)....

1. UPI पर MDR किन लेनदेन पर लागू होगा?

लगभग 70% UPI लेनदेन P2P यानी व्यक्ति-से-व्यक्ति होते हैं, जिन पर MDR नहीं लगेगा। इसके अलावा ₹2,000 तक के भुगतान भी शुल्क-मुक्त रहने की बात कही गई है। पई के अनुसार ₹2,000 से अधिक के P2M यानी व्यापारी भुगतान MDR के दायरे में आएंगे।

2. MDR को टैक्स क्यों नहीं माना जा रहा है?

टीवी मोहनदास पई के अनुसार MDR टैक्स नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग शुल्क है। यह शुल्क बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को डिजिटल भुगतान के तकनीकी ढांचे को चलाने, बनाए रखने और अपग्रेड करने की लागत पूरी करने में मदद कर सकता है।

3. UPI MDR से ब्रोकरों पर क्या असर पड़ सकता है?

नितिन कामथ के अनुसार ब्रोकिंग कारोबार में ग्राहक बार-बार UPI से पैसे जमा और निकाल सकते हैं, जबकि हर ट्रांसफर से ब्रोकर की आय जरूरी नहीं बढ़ती। ऐसे में MDR लागू होने पर बार-बार होने वाले UPI ट्रांसफर की लागत ब्रोकरों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव डाल सकती है।

 

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