यूएन की नई रिपोर्ट से बढ़ी चिंता: 2026 में भारत की जीडीपी ग्रोथ घटकर 6.4% रहने का अनुमान
खबर सार :-
संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि वैश्विक संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर भारत की आर्थिक रफ्तार पर पड़ सकता है। हालांकि वृद्धि दर में मामूली कटौती हुई है, फिर भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है। आने वाले वर्षों में वैश्विक स्थिरता, ऊर्जा कीमतें और निवेश प्रवाह भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेंगे।
खबर विस्तार : -
UN Report GDP India: वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भारत की आर्थिक वृद्धि दर को लेकर नया अनुमान जारी किया है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग (UN DESA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 में भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर 6.6 फीसदी से घटकर 6.4 फीसदी रहने का अनुमान है। हालांकि इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना रहेगा।
यूएन की रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को नया झटका दिया है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ी है, महंगाई का दबाव बना हुआ है और कई देशों की विकास रफ्तार प्रभावित हुई है। भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है।
ऊर्जा आयात और रेमिटेंस पर निर्भरता बनी चुनौती
यूएन डीईएसए के आर्थिक विश्लेषण एवं नीति प्रभाग की वैश्विक आर्थिक निगरानी शाखा के वरिष्ठ अर्थशास्त्री इंगो पिटरले ने कहा कि भारत वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों से पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। भारत ऊर्जा का बड़ा आयातक देश है और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था विदेशी धन प्रेषण यानी रेमिटेंस पर भी काफी हद तक निर्भर करती है। पश्चिम एशिया में काम कर रहे भारतीयों से आने वाला धन घरेलू खपत और निवेश में अहम भूमिका निभाता है। यदि क्षेत्रीय संकट गहराता है तो इसका असर भारतीय परिवारों और बाजार दोनों पर पड़ सकता है।
वैश्विक वित्तीय सख्ती से बढ़ेंगी चुनौतियां
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए सख्त मौद्रिक नीति अपना रहे हैं। इससे वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां कठिन हो सकती हैं। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए पूंजी निवेश आकर्षित करना और आर्थिक संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ने से विदेशी निवेश प्रभावित हो सकता है। साथ ही आयात लागत बढ़ने से घरेलू महंगाई पर भी दबाव बने रहने की आशंका है।
आरबीआई का अनुमान यूएन से बेहतर
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.9 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। हालांकि यह आंकड़ा पिछले वित्त वर्ष 2025-26 की अनुमानित 7.6 फीसदी वृद्धि दर से कम है। आरबीआई का मानना है कि घरेलू मांग और सरकारी निवेश अर्थव्यवस्था को मजबूती देंगे, लेकिन वैश्विक परिस्थितियां विकास दर को प्रभावित कर सकती हैं। आर्थिक जानकारों के अनुसार भारत की मजबूत घरेलू खपत, डिजिटल अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचा निवेश देश को अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहतर स्थिति में बनाए हुए हैं। बावजूद इसके, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और तेल कीमतों में बढ़ोतरी आने वाले समय में चुनौती बन सकती हैं।
2027 में फिर रफ्तार पकड़ सकती है भारतीय अर्थव्यवस्था
यूएन की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि वैश्विक परिस्थितियों में सुधार होता है तो वर्ष 2027 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर बढ़कर 6.6 फीसदी तक पहुंच सकती है। इससे संकेत मिलता है कि वर्तमान सुस्ती अस्थायी हो सकती है और भारतीय अर्थव्यवस्था मध्यम अवधि में फिर से तेज रफ्तार पकड़ सकती है।
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