US की 30 दिन की छूट से Oil Market को राहत: रूस से खरीद जारी रहने पर Crude oil की कीमतों में आई गिरावट
खबर सार :-
अमेरिका द्वारा भारत को दी गई 30 दिन की अस्थायी छूट ने वैश्विक तेल बाजार में तत्काल राहत का संकेत दिया है। इससे न केवल भारतीय रिफाइनरियों को रूसी कच्चा तेल खरीदने का अवसर मिला है, बल्कि सप्लाई चेन को लेकर बनी आशंकाएं भी कुछ कम हुई हैं। हालांकि मध्य-पूर्व में जारी तनाव के कारण तेल बाजार में उतार-चढ़ाव की संभावना अभी भी बनी हुई है।
खबर विस्तार : -
Global Oil Market: वैश्विक तेल बाजार में पिछले कुछ दिनों से जारी उथल-पुथल के बीच शुक्रवार को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिली। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका द्वारा भारत को दी गई 30 दिन की अस्थायी छूट मानी जा रही है, जिसके तहत भारतीय रिफाइनरियां समुद्र में फंसे रूसी कच्चे तेल की खरीद कर सकती हैं। इस फैसले ने बाजार में सप्लाई को लेकर बनी चिंता को कुछ हद तक कम कर दिया है।
इजरायल-ईरान युद्ध का असरः कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं
दरअसल, पिछले सप्ताह इजरायल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 15 प्रतिशत से ज्यादा उछाल आया था। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण निवेशकों को आशंका थी कि प्रमुख समुद्री मार्गों से तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास की स्थिति को लेकर बाजार बेहद संवेदनशील बना हुआ था। हालांकि शुक्रवार सुबह बाजार खुलते ही तेल की कीमतों में नरमी देखने को मिली। इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज पर बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड का अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट 1.52 प्रतिशत गिरकर 84.21 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा था। वहीं वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड की कीमत शुरुआती कारोबार में 2.10 प्रतिशत गिरकर 79.31 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन द्वारा भारत को दी गई 30 दिन की छूट से वैश्विक तेल सप्लाई को लेकर बनी अनिश्चितता कुछ कम हुई है। इससे बाजार को संकेत मिला है कि फिलहाल सप्लाई पूरी तरह बाधित नहीं होगी और प्रमुख आयातक देशों को अपनी जरूरत के अनुसार तेल उपलब्ध होता रहेगा।

भारतीय रिफाइनरियों को मिली छूटः तेल की आपूर्ति
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनाए रखने के उद्देश्य से ट्रेजरी विभाग भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने की अस्थायी अनुमति दे रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अनुमति केवल उन तेल कार्गो के लिए है जो पहले से समुद्र में मौजूद हैं और जिन्हें अभी तक खरीदार नहीं मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि इस कदम का उद्देश्य रूस को अतिरिक्त आर्थिक लाभ देना नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखना है। इसलिए यह छूट सीमित अवधि और सीमित दायरे में ही लागू रहेगी।
मध्यपूर्व में बढ़ता तनाव और स्टेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं बढ़ गई थीं। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। अमेरिका ने पहले ही संकेत दिया था कि यदि स्थिति और बिगड़ती है तो वह इस मार्ग से गुजरने वाले तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए नौसैनिक एस्कॉर्ट तैनात कर सकता है। व्हाइट हाउस का कहना है कि ईरान के खिलाफ उठाए गए हालिया कदम लंबे समय में वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता को मजबूत कर सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक क्षेत्र में सैन्य तनाव बना रहेगा, तब तक तेल बाजार में अस्थिरता भी बनी रह सकती है।

जरूरत का 90 प्रतिशत हिस्सा आयात
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। वैश्विक शिप ट्रैकिंग कंपनी केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में रूस भारत को तेल सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा। फरवरी के दौरान रूस से भारत को औसतन 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल की आपूर्ति हुई। इसके बाद सऊदी अरब लगभग 10 लाख बैरल प्रतिदिन और इराक करीब 9.8 लाख बैरल प्रतिदिन तेल सप्लाई करने वाले प्रमुख देशों में शामिल रहे।
भारत में तेल की कुल दैनिक खपत
भारत की कुल दैनिक तेल खपत करीब 5.5 मिलियन बैरल है। इसमें से लगभग 15 से 20 लाख बैरल तेल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते भारत तक पहुंचता है। यही वजह है कि इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा और स्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम मानी जाती है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर अमेरिका की यह अस्थायी छूट आगे भी किसी रूप में बढ़ाई जाती है या वैश्विक तनाव कम होता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और स्थिरता देखने को मिल सकती है। फिलहाल बाजार की नजर मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति और अमेरिका के अगले कदमों पर बनी हुई है।
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