Oil Crisis गहराया: Hormuz Strait बंद, एशिया में तेजी के खत्म हो रहे भंडार, दुनिया पर मंडरा रहा बड़ा खतरा
खबर सार :-
होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने और मिडिल ईस्ट तनाव ने वैश्विक तेल संकट को जन्म दे दिया है। एशिया में घटते भंडार इसके शुरुआती संकेत हैं, जबकि यूरोप और अमेरिका भी जल्द प्रभावित होंगे। ट्रंप के आक्रामक बयान हालात को और बिगाड़ सकते हैं। अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो दुनिया को लंबे ऊर्जा संकट और आर्थिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।
खबर विस्तार : -
JP Morgan report: वैश्विक ऊर्जा बाजार एक बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो गई है। इसका सीधा असर एशिया के देशों पर दिखने लगा है, जहां तेल भंडार तेजी से घट रहे हैं। अमेरिकी वित्तीय संस्था जेपी मॉर्गन की ताजा रिपोर्ट ने इस संकट को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है।
होर्मुज स्ट्रेट बंद: वैश्विक सप्लाई चेन पर बड़ा झटका
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, जहां से मिडिल ईस्ट का अधिकांश कच्चा तेल दुनिया भर में सप्लाई होता है। लेकिन ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के कारण यह मार्ग फिलहाल बंद है। इस वजह से तेल का निर्यात रुक गया है और कई देशों को अब अपने घटते भंडार का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस संकट का असर धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैलने वाला है।
सबसे पहले संकट की चपेट में आया एशिया
रिपोर्ट बताती है कि फारस की खाड़ी से तेल का शिपमेंट आमतौर पर 10 से 20 दिनों में एशिया पहुंचता है। इसलिए सप्लाई में आई रुकावट का असर सबसे पहले एशियाई देशों पर पड़ रहा है। 28 फरवरी को होर्मुज स्ट्रेट से आखिरी तेल टैंकर निकला था और अब तक उसका ज्यादातर स्टॉक खत्म हो चुका है। इसके चलते एशिया के कई देशों में तेल की उपलब्धता घटने लगी है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में 41% तक गिरा तेल निर्यात
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। इस क्षेत्र में तेल निर्यात में महीने-दर-महीने 41 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब समस्या केवल कीमतों की नहीं रही, बल्कि यह “फिजिकल कमी” यानी वास्तविक तेल की उपलब्धता की समस्या बन चुकी है। यह स्थिति आने वाले समय में और गंभीर हो सकती है।

अफ्रीका और यूरोप पर भी बढ़ेगा असर
एशिया के बाद अफ्रीकी देशों पर इसका असर दिखने लगा है। कुछ देशों में पहले से ही ईंधन की कमी के संकेत मिल रहे हैं। उदाहरण के तौर पर केन्या में रिटेल स्तर पर फ्यूल की कमी देखी जा रही है, जबकि तंजानिया के पास फिलहाल पर्याप्त स्टॉक है। यूरोप पर इस संकट का असर अप्रैल के मध्य तक महसूस होने की संभावना है। हालांकि, यूरोप के पास बेहतर इन्वेंट्री और वैकल्पिक सप्लाई स्रोत होने के कारण वह शुरुआती झटकों को कुछ हद तक झेल सकता है।
अमेरिका पर देर से पड़ेगा असर, लेकिन कीमतें बढ़ेंगी
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका को इस संकट का असर सबसे आखिर में महसूस होगा, क्योंकि वहां घरेलू तेल उत्पादन काफी मजबूत है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका पूरी तरह सुरक्षित है। कैलिफोर्निया जैसे क्षेत्र सप्लाई चेन के लिहाज से संवेदनशील हैं और वहां ईंधन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
ईरान के तेल पर नजर: ट्रंप के बयान से बढ़ी चिंता
इस बीच डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि अमेरिका ईरान के तेल संसाधनों पर कब्जा करने पर विचार कर सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, खार्ग द्वीप ईरान के तेल निर्यात का प्रमुख केंद्र है, जहां से 90 प्रतिशत से ज्यादा तेल बाहर जाता है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के पास इस द्वीप पर कब्जा करने के कई विकल्प हैं।

सैन्य तनाव बढ़ा, जंग लंबी खिंचने की आशंका
मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी लगातार बढ़ रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हजारों अतिरिक्त सैनिक इस क्षेत्र में तैनात किए जा रहे हैं। यह कदम इस बात का संकेत है कि हालात जल्द सामान्य होने की संभावना कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर खार्ग द्वीप जैसे रणनीतिक ठिकानों पर हमला होता है, तो युद्ध और लंबा खिंच सकता है।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची तेल की कीमतें
इस संकट का असर तेल की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है। मार्च में ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर 119.5 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो जून 2022 के बाद का उच्चतम स्तर है। ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता के चलते कीमतों में और तेजी आने की आशंका जताई जा रही है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया खतरा
तेल सप्लाई में रुकावट का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा असर महंगाई, औद्योगिक उत्पादन और वैश्विक व्यापार पर पड़ेगा। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है, जहां तेल की कीमतें सीधे आम लोगों की जेब पर असर डालती हैं।
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