झांसीः उच्च शिक्षा संस्थानों में जातीय भेदभाव को मिटाने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए नियमों ने एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ एक पक्ष इसे सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे भेदभावपूर्ण करार देते हुए इसका पुरजोर विरोध कर रहा है।
UGC के निर्देशों के अनुसार, अब प्रत्येक मान्यता प्राप्त कॉलेज और विश्वविद्यालय में इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर (EOC) और समता समिति (Equality Committee) का गठन अनिवार्य होगा।
इस समिति में विशेष रूप से SC, ST, OBC, महिला और दिव्यांग सदस्यों को शामिल किया जाएगा, जिनका कार्यकाल दो वर्ष का होगा। त्वरित कार्रवाई, भेदभाव की शिकायत मिलने पर समिति को तुरंत जाँच शुरू करनी होगी और कॉलेज प्रशासन को महज 7 दिनों के भीतर दोषी पर कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।नियमों की अनदेखी करने वाले संस्थानों के डिग्री प्रोग्राम और डिस्टेंस लर्निंग कोर्स पर रोक लगाई जा सकती है।
नए नियमों में दो बिंदुओं को लेकर सबसे अधिक विरोध हो रहा है:
सामान्य वर्ग की अनुपस्थिति: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि समिति में सामान्य वर्ग के सदस्यों को जगह न देना संवैधानिक समानता के खिलाफ है।
झूठी शिकायत पर नरम रुख: रिपोर्ट के अनुसार, झूठी शिकायत करने वालों पर लगने वाले जुर्माने या सजा के प्रावधान को हटा दिया गया है, जिसे विरोधी पक्ष 'उत्पीड़न का हथियार' मान रहे हैं।
विरोध का नेतृत्व कर रहे दिनेश भार्गव ने इसे 'काला कानून' बताते हुए कहा कि यह सामान्य वर्ग के छात्रों को निशाना बनाने की साजिश है। वहीं, पंकज रावत (भारतीय प्रजाशक्ति पार्टी) ने इसकी तुलना 'रॉलेक्ट एक्ट' से करते हुए कहा कि यह कानून छात्रों को बिना ठोस आधार के अपराधी मानने जैसा है।
दूसरी ओर, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय एससी/एसटी शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. बृजेंद्र बौद्ध ने इन नियमों का स्वागत किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि समिति जाँच के बाद ही कदम उठाएगी और यह व्यवस्था संविधान के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करेगी। फिलहाल पूरे क्षेत्र में इन नियमों को लेकर विरोध और समर्थन का दौर जारी है। बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन भी इस वैचारिक जंग में कूद पड़े हैं। अब देखना यह है कि क्या UGC इन विरोधों के बीच नियमों में कोई संशोधन करता है या इन्हें सख्ती से लागू रखा जाता है।
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