भरतपुरः राजस्थान के भरतपुर जिले के बंसी पहाड़पुर क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता का एक चौंकाने वाला उदाहरण सामने आया है। यहाँ के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में करीब 20 लाख रुपये की लागत से एक आधुनिक सोनोग्राफी सेंटर तैयार किया गया था। इस सेंटर का उद्देश्य आसपास के ग्रामीण इलाकों के गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों को उनके घर के पास ही सस्ती या मुफ्त जांच की सुविधा उपलब्ध कराना था। लेकिन विडंबना यह है कि उद्घाटन के लगभग तीन साल बीत जाने के बाद भी यह सोनोग्राफी सेंटर आज तक शुरू नहीं हो पाया है। मशीनें अब भी डिब्बों में बंद पड़ी हैं और सेंटर पर ताला लगा हुआ है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि शुरुआत में इस सेंटर को लेकर काफी उम्मीदें थीं। लोगों को लगा था कि अब उन्हें छोटी-छोटी जांच के लिए शहरों की ओर नहीं भागना पड़ेगा। लेकिन समय बीतने के साथ यह सेंटर केवल एक शो-पीस बनकर रह गया है। सरकार की ओर से बड़े-बड़े दावे तो किए जाते हैं कि ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है, लेकिन बंसी पहाड़पुर की स्थिति इन दावों की सच्चाई उजागर कर रही है।
सोनोग्राफी की सुविधा न होने के कारण यहां के मरीजों को मजबूरन निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों का सहारा लेना पड़ता है। इन निजी सेंटरों में जांच के लिए उनसे मोटी रकम वसूली जाती है, जो गरीब परिवारों के लिए किसी बड़ी परेशानी से कम नहीं है। कई मरीजों को तो जांच के लिए भरतपुर जिला मुख्यालय या अन्य शहरों तक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उनका समय, पैसा और स्वास्थ्य तीनों प्रभावित होते हैं।
अस्पताल की बदहाली का एक बड़ा कारण चिकित्सा कर्मियों की भारी कमी भी है। जानकारी के अनुसार पूरे स्वास्थ्य केंद्र का संचालन फिलहाल केवल एक चिकित्सा अधिकारी के भरोसे चल रहा है। आधुनिक सोनोग्राफी मशीन तो खरीद ली गई, लेकिन उसे चलाने के लिए आवश्यक रेडियोलॉजिस्ट और तकनीकी स्टाफ की नियुक्ति नहीं की गई। नतीजा यह है कि लाखों रुपये की सरकारी संपत्ति बेकार पड़ी है और जनता को उसका कोई लाभ नहीं मिल रहा।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकार और प्रशासन समय रहते इस समस्या पर ध्यान दें और यहां विशेषज्ञ स्टाफ की नियुक्ति करें, तो हजारों लोगों को राहत मिल सकती है। स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से मांग की है कि इस सोनोग्राफी सेंटर को जल्द से जल्द चालू किया जाए। उनका कहना है कि जनता के टैक्स के पैसों से बनाई गई सुविधाएं तभी सार्थक हैं जब उनका उपयोग आम लोगों के हित में हो। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मांग पर कब तक कार्रवाई करता है।
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