पीलीभीत: उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में सोमवार की शाम उस वक्त सियासी पारा गरमा गया, जब भाजपा के नगर महामंत्री और प्रतिष्ठित सराफ व्यापारी पीयूष अग्रवाल के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया। इस कार्रवाई की खबर मिलते ही भाजपा कार्यकर्ता और पदाधिकारी उग्र हो गए और देर रात तक कोतवाली परिसर में धरना प्रदर्शन जारी रहा।
पूरे विवाद की शुरुआत गजरौला थाना क्षेत्र के ग्राम पिपरिया भजा के निवासी ज्वाला प्रसाद की एक शिकायत से हुई। पीड़ित ज्वाला प्रसाद का आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2023 में शहर के प्रसिद्ध 'कंचन ज्वेलर्स' के स्वामी और भाजपा नेता पीयूष अग्रवाल के पास अपने सोने-चांदी के जेवर गिरवी रखे थे।
शिकायतकर्ता का दावा है कि उसने समय पर ब्याज की पूरी रकम चुका दी थी। इसके बावजूद, जब वह 31 दिसंबर 2025 को अपने आभूषण वापस लेने दुकान पर पहुंचा, तो महामंत्री ने जेवर लौटाने से साफ इनकार कर दिया और कोई भी रिकॉर्ड दिखाने में आनाकानी की। इसी तहरीर के आधार पर पुलिस ने नगर महामंत्री के विरुद्ध कानूनी धाराओं में मामला दर्ज किया है।
जैसे ही पार्टी के कद्दावर पदाधिकारी पर FIR की सूचना फैली, भाजपा की स्थानीय इकाई सक्रिय हो गई। भाजपा नगर अध्यक्ष इंद्रेश चौहान ने मामले की जानकारी लेने के लिए ठेका चौकी प्रभारी से संपर्क साधा। भाजपाइयों का आरोप है कि बातचीत के दौरान दरोगा ने नगर अध्यक्ष के साथ अमर्यादित भाषा और अभद्र व्यवहार किया। दरोगा के इस बर्ताव ने आग में घी डालने का काम किया, जिससे आक्रोशित होकर नगर अध्यक्ष के नेतृत्व में दर्जनों पदाधिकारी और कार्यकर्ता कोतवाली जा धमके और वहीं जमीन पर बैठकर धरना शुरू कर दिया।
कोतवाली के भीतर धरने पर बैठे भाजपाइयों ने स्पष्ट किया है कि वे तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं:
1. नगर महामंत्री पीयूष अग्रवाल पर दर्ज एफआईआर की तत्काल और निष्पक्ष जांच की जाए।
2. नगर अध्यक्ष के साथ बदसलूकी करने वाले दरोगा को तुरंत लाइन हाजिर किया जाए।
देर रात कोतवाली में मचे इस हंगामे की खबर मिलते ही सीओ सिटी दीपक चतुर्वेदी मौके पर पहुंचे। उन्होंने आक्रोशित कार्यकर्ताओं को समझाने-बुझाने और शांत करने का काफी प्रयास किया, लेकिन प्रदर्शनकारी कार्रवाई की जिद पर अड़े रहे। इस विरोध प्रदर्शन में नगर महामंत्री अमरीश शर्मा, स्वतंत्र देव सहित दो दर्जन से अधिक वरिष्ठ पदाधिकारी और सैकड़ों कार्यकर्ता शामिल रहे। स्थानीय राजनीति में इस घटनाक्रम को पुलिस और सत्ताधारी दल के बीच बढ़ते टकराव के रूप में देखा जा रहा है।
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