झांसी: उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के मऊरानीपुर क्षेत्र से विकास कार्यों में लापरवाही का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ के ग्राम पंचायत भदरवारा में लोक निर्माण विभाग (PWD) के ठेकेदार द्वारा महज 2 घंटे के भीतर करीब 400 मीटर लंबी सड़क का निर्माण कार्य पूरा कर दिया गया। इतनी तेजी से बनी सड़क की गुणवत्ता देखकर ग्रामीण भड़क उठे और मौके पर जमकर विरोध प्रदर्शन किया।
मऊरानीपुर के ग्राम भदरवारा में स्थित मां भद्रकाली मंदिर गेट से अंदर की ओर जाने वाली सड़क का निर्माण हाल ही में किया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार ने मानकों को ताक पर रखकर आनन-फानन में काम निपटाया है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पूरी सड़क को बनाने में सिर्फ 2 घंटे का समय लिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की परत इतनी कमजोर है कि वह अभी से उखड़ने लगी है। इस 'सुपरफास्ट' निर्माण को लेकर अब भ्रष्टाचार और मानकों की अनदेखी के आरोप लग रहे हैं।
सड़क निर्माण की गुणवत्ता गिरने के पीछे एक बड़ा तकनीकी और आर्थिक कारण भी उभरकर सामने आ रहा है। दरअसल, वर्तमान में पश्चिमी देशों और मध्य पूर्व में जारी युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी अस्थिरता बनी हुई है। क्रूड ऑयल का सह-उत्पाद होने के कारण डामर (बिटुमेन) की कीमतों ने भी अचानक लंबी छलांग लगा दी है, जिससे ठेकेदारों के पुराने एस्टिमेट पूरी तरह धराशायी हो गए हैं। उत्तर प्रदेश के अधिकांश जनपदों में मथुरा रिफाइनरी से डामर की आपूर्ति की जाती है, जहां हर 15 दिनों में इसकी दरें संशोधित होती हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार, 28 फरवरी के बाद से डामर के दामों में लगभग 5,500 रुपये प्रति टन की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। इस आर्थिक बोझ के कारण ठेकेदारों के सामने मुनाफे का संकट खड़ा हो गया है, जिसके चलते वे घाटे से बचने के लिए सड़कों के निर्माण में डामर की मात्रा कम कर रहे हैं। यही वजह है कि जमीनी स्तर पर सड़कों की मजबूती और गुणवत्ता के साथ खुलेआम समझौता किया जा रहा है।
डामर के दाम बढ़ने से उन ठेकेदारों के सामने संकट खड़ा हो गया है जिन्होंने पुराने रेट पर टेंडर लिए थे। उनके एस्टिमेट पूरी तरह गड़बड़ा गए हैं। घाटे से बचने के लिए ठेकेदार अब सड़कों में डामर की मात्रा कम कर रहे हैं, जिसका सीधा असर निर्माण की मजबूती पर पड़ रहा है।
सड़क निर्माण की इस जल्दबाजी और विवाद के पीछे एक गहरा प्रशासनिक दबाव भी मुख्य कारण माना जा रहा है। दरअसल, वर्तमान वित्तीय वर्ष की समाप्ति 31 मार्च को होनी है और सरकारी नियमों के मुताबिक यदि आवंटित बजट का उपयोग निर्धारित समय सीमा तक नहीं किया जाता, तो वह धनराशि स्वतः ही सरेंडर होकर शासन के खाते में वापस चली जाती है। ऐसी स्थिति में विकास कार्य लंबे समय के लिए अटक सकते हैं और दोबारा बजट पास कराने में लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यही वजह है कि लोक निर्माण विभाग के अधिकारी ठेकेदारों पर पुराने लंबित कार्यों को जल्द से जल्द पूरा करने का भारी दबाव बना रहे हैं ताकि समय रहते बिलों का भुगतान किया जा सके। इसी सरकारी डेडलाइन की हड़बड़ी और बजट को 'खपाने' की होड़ में ठेकेदार गुणवत्ता की पूरी तरह अनदेखी कर रहे हैं और महज कागजी खानापूर्ति के लिए घटिया निर्माण कार्य को अंजाम दे रहे हैं।
भदरवारा गांव के निवासियों ने प्रशासन से इस घटिया निर्माण की शिकायत की है। ग्रामीणों की मांग है कि इस सड़क की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो। साथ ही, उन्होंने सड़क का दोबारा निर्माण मानकों के अनुसार कराने की अपील की है ताकि सार्वजनिक धन का दुरुपयोग न हो।
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