झांसी सिटी बस सेवा घाटे में, फिर भी यात्रियों के लिए बनी राहत, आंकड़ों ने खड़े किए सवाल

खबर सार :-
स्मार्ट सिटी योजना के तहत चलाई जा रही इलेक्ट्रिक सिटी बसों की संख्या को कम किया जा रहा है। इसके पीछ वजह से ये बताई जा रही है कि इसके संचालन से विभाग को नुकसान हो रहा है लेकिन लोगों को कहना है कि इन बसों में उम्मीद से ज्यादा लोग सफर करते हैं तो इस सर्विस से नुकसान कैसे हो सकता है।

झांसी सिटी बस सेवा घाटे में, फिर भी यात्रियों के लिए बनी राहत, आंकड़ों ने खड़े किए सवाल
खबर विस्तार : -

झांसीः महानगर में संचालित सिटी बस सेवा को लगभग पांच वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन यह सेवा लगातार घाटे में चल रही है। इसके बावजूद जनहित को ध्यान में रखते हुए इसे जारी रखा गया है। शहर में यह बसें रेलवे स्टेशन से चिरगांव, बस स्टैंड से बरुआ सागर और जेल चौराहा से बबीना तक प्रमुख रूटों पर संचालित हो रही हैं। हालांकि, कम सवारियों या अन्य कारणों से प्रेम नगर से कोछा भंवर और कोचभाव से रकसा तक के रूट को बंद कर दिया गया है।

आम जनता को मिली थी बड़ी राहत

सिटी बस सेवा यात्रियों के बीच काफी लोकप्रिय साबित हो रही है। इसकी मुख्य वजह बसों का वातानुकूलित और आरामदायक होना है। इसके अलावा किराया भी निजी बसों और ऑटो की तुलना में काफी कम है, जिससे आम जनता को राहत मिल रही है। अधिकांश समय बसें यात्रियों से भरी रहती हैं, ऐसे में कम आमदनी के आंकड़े कई सवाल खड़े कर रहे हैं। लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि कहीं इस व्यवस्था में कोई गड़बड़ी तो नहीं हो रही।

स्मार्ट सिटी योजना के तहत वर्ष 2021 में 25 इलेक्ट्रिक बसों को शहर की सड़कों पर उतारा गया था। इनके संचालन की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम को सौंपी गई। इन बसों को एक निजी कंपनी के साथ अनुबंध के तहत चलाया जा रहा है। इनकी खासियत यह है कि ये बसें न तो प्रदूषण फैलाती हैं और न ही शोर करती हैं। साथ ही, बसों में लगे एयर कंडीशनर यात्रियों को आरामदायक सफर का अनुभव कराते हैं।

चार बसें खराब

हालांकि, इन सुविधाओं के बावजूद यह सेवा आर्थिक रूप से घाटे का सौदा साबित हो रही है। वर्तमान में 25 में से 21 बसें ही सड़कों पर चल रही हैं, जबकि चार बसें खराब पड़ी हैं। इन बसों के संचालन पर हर माह लगभग 75 से 76 लाख रुपये का खर्च आता है, जबकि इनसे होने वाली आय केवल 21 लाख रुपये तक सीमित है।

रोडवेज विभाग के अधिकारियों के अनुसार, प्रत्येक बस प्रतिदिन लगभग 180 किलोमीटर चलती है। इसके लिए संबंधित कंपनी को 70 रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से भुगतान किया जाता है। इस प्रकार एक बस पर प्रतिदिन लगभग 12,600 रुपये खर्च होते हैं। यदि 21 बसों की बात करें, तो प्रतिदिन कुल खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाता है और मासिक खर्च करीब 75 लाख रुपये बैठता है।

वहीं, आय के आंकड़ों पर नजर डालें तो एक बस से प्रतिदिन करीब 3 से 3.5 हजार रुपये की कमाई होती है। इस हिसाब से सभी बसों से रोजाना लगभग 76 हजार रुपये और महीने में करीब 21 लाख रुपये की आय हो रही है। इस तरह प्रति बस हर माह लगभग 55 हजार रुपये का नुकसान हो रहा है, जो कुल मिलाकर बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है।

बिना टिकट यात्रा करने पर होती है कार्रवाई

इस पूरे मामले पर उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम झांसी के क्षेत्रीय प्रबंधक संतोष कुमार का कहना है कि सरकार सिटी बस सेवा को लाभ-हानि के आधार पर नहीं, बल्कि जनसुविधा के उद्देश्य से संचालित करती है। उन्होंने बताया कि बसों से होने वाली आमदनी नगरीय निदेशालय को भेजी जाती है, जहां से कंपनी को भुगतान किया जाता है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बसों में बिना टिकट यात्रा कराने पर सख्त कार्रवाई की जाती है। यदि कोई कंडक्टर ऐसा करते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे तत्काल प्रभाव से नौकरी से हटा दिया जाता है। पहले भी कई मामलों में कार्रवाई की जा चुकी है। इसके अलावा समय-समय पर निरीक्षक बसों में चेकिंग करते हैं और सवारियों व टिकट का मिलान कर रिपोर्ट तैयार करते हैं।

झांसी की यह सिटी बस सेवा जहां एक ओर आम लोगों को सस्ती और आरामदायक यात्रा का विकल्प दे रही है, वहीं दूसरी ओर इसके घाटे ने प्रशासन और विभागीय कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि भविष्य में इस सेवा को कैसे संतुलित किया जाता है ताकि जनहित और आर्थिक पक्ष दोनों को साधा जा सके।

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