भीलवाड़ा में उमड़ा आस्था का सैलाब! राम जन्मोत्सव पर झूम उठे हजारों भक्त, जयकारों से गूंज उठा आसमान, साक्षात अयोध्या बन गया हरि शेवा आश्रम!

खबर सार :-
भीलवाड़ा के हरि शेवा आश्रम में पुरुषोत्तम माह महोत्सव के तहत जारी नौ दिवसीय श्रीराम कथा (Shriram Katha) के चौथे दिन भगवान राम का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। विष्णु यज्ञ, रुद्राभिषेक और चौबीस घंटे चल रहे हरिनाम संकीर्तन से पूरा माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया है।

भीलवाड़ा में उमड़ा आस्था का सैलाब! राम जन्मोत्सव पर झूम उठे हजारों भक्त, जयकारों से गूंज उठा आसमान, साक्षात अयोध्या बन गया हरि शेवा आश्रम!
खबर विस्तार : -

 भीलवाड़ा: सनातन संस्कृति और अटूट आस्था के प्रमुख केंद्र हरि शेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर (Hari Sheva Udasi Ashram Sanatan Mandir) परिसर में इन दिनों भक्ति की एक ऐसी अविरल धारा बह रही है, जिसने पूरे शहर को अपने रंग में रंग लिया है। पुरुषोत्तम माह महोत्सव (Purushottam Mah Mahotsav) के पावन अवसर पर आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा (Shriram Katha) के चौथे दिन आश्रम का कोना-कोना पूरी तरह राममय हो गया। ऐसा लग रहा था मानो त्रेतायुग की अयोध्या साक्षात भीलवाड़ा की इस पावन धरा पर उतर आई हो।

कथा के चौथे दिन व्यासपीठ पर विराजमान हरिद्वार के प्रख्यात महामंडलेश्वर स्वामी जगदीश दास उदासीन (Mahamandleshwar Swami Jagdish Das Udasi) ने जब प्रभु श्रीराम के दिव्य जन्मोत्सव का प्रसंग सुनाना शुरू किया, तो पांडाल में बैठे हजारों श्रद्धालुओं की आंखें खुशी से छलक उठीं। स्वामी जी ने बेहद तार्किक और मर्मस्पर्शी अंदाज में कहा कि इस धरती पर जब-जब अधर्म, घोर अन्याय और अत्याचार का अंधकार बढ़ता है, तब-तब मानवता की रक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए ईश्वर स्वयं अलग-अलग रूपों में अवतार लेते हैं। त्रेतायुग में जब लंकापति रावण के कुकृत्यों से धरती कांप उठी थी, तब समस्त देवताओं और पीड़ित ऋषि-मुनियों की गुहार पर भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के घर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में जन्म लिया था।

 केवल राजा नहीं, आदर्शों के प्रतीक हैं श्रीराम

कथा व्यास ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भगवान श्रीराम केवल एक प्रतापी राजा नहीं थे, बल्कि वे त्याग, करुणा, सत्य और अटूट मर्यादा के साक्षात स्वरूप हैं। उनका संपूर्ण चरित्र आज के मानव समाज को बिखरते परिवारों को जोड़ने, समाज को एक सूत्र में पिरोने और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाने की सबसे बड़ी प्रेरणा देता है। स्वामी जी ने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि श्रीराम जन्मोत्सव मनाना केवल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान (Religious Rituals) नहीं है, बल्कि यह उनके महान संस्कारों और जीवन मूल्यों को अपने भीतर उतारने का सबसे बड़ा संकल्प है।

 'भए प्रगट कृपाला' के जयकारों से गूंजा पांडाल

जैसे ही कथा के दौरान प्रभु के प्राकट्य का समय आया, पूरा परिसर "जय श्रीराम" के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान हो उठा। ठीक उसी समय "भए प्रगट कृपाला दीन दयाला, कौशल्या हितकारी..." की मधुर धुन गूंजने लगी, जिस पर पंडाल में मौजूद पुरुष, महिलाएं और बच्चे खुद को रोक नहीं पाए और भावविभोर होकर झूमने-नाचने लगे। इस पावन और ऐतिहासिक पल के साक्षी बनते हुए आश्रम के पूज्य महामंडलेश्वर हंसराम जी उदासीन (Mahamandleshwar Hansram Ji Udasi) ने बाल स्वरूप भगवान श्रीराम का वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अत्यंत श्रद्धापूर्वक पूजन और माल्यार्पण किया। इस दौरान सिर्फ राम ही नहीं, बल्कि चारों भाइयों—भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के जन्म का उल्लास भी एक साथ मनाया गया। चारों तरफ सोहर और मंगल गीत गाए जा रहे थे। पूरे कथा स्थल को रंग-बिरंगे गुब्बारों और महकते हुए प्राकृतिक फूलों से बेहद दिलकश अंदाज में सजाया गया था।

 यज्ञ, रुद्राभिषेक और 24 घंटे संकीर्तन की गूंज

आश्रम के सेवादारों ने बताया कि कथा से इतर भी आश्रम परिसर में सुबह से लेकर रात तक आध्यात्मिक गतिविधियों का तांता लगा हुआ है। सुबह ठीक 7 बजे पंडित रोशन शास्त्री के आचार्यत्व में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भव्य विष्णु यज्ञ (Vishnu Yajna) का आयोजन हो रहा है, जिसमें रघुनाथ चौहान और बंशीलाल हैंडरिया ने अपनी पत्नियों के साथ मुख्य यजमान के रूप में पूर्णाहूति दी। इसके साथ ही, उपाचार्य पंडित सत्यनारायण शर्मा की देखरेख में सिद्धेश्वर महादेव का विशेष रुद्राभिषेक (Rudrabhishek) संपन्न कराया जा रहा है।

इस महोत्सव की सबसे खास बात यह है कि यहाँ चौबीसों घंटे बिना रुके निरंतर हरिनाम संकीर्तन (Harinam Sankirtan) चल रहा है, जिससे पूरा वातावरण एक अलौकिक ऊर्जा से भर गया है। शाम के समय काशी के घाटों की तर्ज पर होने वाली भव्य गंगा आरती (Ganga Aarti) आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई है, जिसे देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ रही है। धार्मिक सभा के समापन पर सभी भक्तों को महाप्रसाद वितरित किया गया।

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