अजय देवगन की फिल्म चौहान के टीज़र पर क्यों भड़का कश्मीर, जख्मों पर नमक छिड़कने के लगे आरोप

खबर सार :-

अजय देवगन की फिल्म चौहान के टीज़र में पैलेट गन को 'सीमित नुकसान' बताने वाले डायलॉग पर कश्मीर में भारी आक्रोश है। जानिए क्यों पीड़ितों के जख्म फिर हरे हो गए हैं और क्या है पूरा विवाद।
अजय देवगन की फिल्म चौहान के टीज़र पर क्यों भड़का कश्मीर, जख्मों पर नमक छिड़कने के लगे आरोप

खबर विस्तार : -

Ajay Devgn film Chauhan : सिनेमा के पर्दे पर जब कोई संवाद तालियां बटोरने के लिए लिखा जाता है, तो शायद ही किसी को अंदाजा होता है कि वही चंद शब्द किसी कोने में बरसों से दबे दर्द को दोबारा जिंदा कर सकते हैं। कश्मीर के शांत होते माहौल के बीच एक बार फिर पुरानी चीखें और पट्टियों में लिपटी आंखें सोशल मीडिया पर तैरने लगी हैं। वजह कोई नया सैन्य अभियान या विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि रुपहले पर्दे की एक आगामी कहानी है।

हाल ही में रिलीज हुआ अजय देवगन की फिल्म चौहान का टीज़र इस वक्त विवादों के केंद्र में है। महज सवा दो मिनट की इस झलक ने घाटी के उन सैकड़ों परिवारों के पुराने जख्मों को कुरेद दिया है, जिन्होंने पैलेट गन की मार झेली थी।

'सीमित नुकसान' वाले संवाद पर भड़का पुराना दर्द

इस पूरे विवाद की जड़ में फिल्म का एक खास संवाद है। टीज़र में मुख्य किरदार भीड़ को नियंत्रित करने वाले अलग-अलग तरीकों को बेअसर बताते हुए पैलेट गन को 'लिमिटेड डैमेज' यानी सीमित नुकसान पहुंचाने वाला हथियार करार देता है। इस डायलॉग ने उस दौर की यादें ताजा कर दी हैं, जिसे लेकर अजय देवगन की फिल्म चौहान को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।

घाटी के युवाओं और पीड़ितों के लिए यह सिर्फ एक सिनेमाई संवाद नहीं, बल्कि उनकी त्रासदी का मजाक उड़ाने जैसा है। स्थानीय निवासी उमर मुख्तार का कहना है कि जिन्होंने 2017 का वह दौर देखा है, उनके लिए यह 'सीमित नुकसान' शब्द एक भयानक झूठ के सिवा कुछ नहीं है।

हिबा और इंशा जैसी मासूम जिंदगियों की त्रासदी

साल 2018 की वो सर्द दोपहर आज भी कपरान इलाके के लोगों को याद है, जब महज 18 महीने की मासूम हिबा जान अपनी मां की गोद में बैठी थी। बाहर मचे बवाल और घर में भरते आंसू गैस के धुएं से बचने के लिए जैसे ही दरवाजा खुला, एक छर्रे ने उस नन्ही बच्ची की दाईं आंख को हमेशा के लिए चोटिल कर दिया। हिबा उस दौर में पैलेट गन संकट का सबसे मासूम चेहरा बनकर उभरी थी।

सिनेमाई मनोरंजन और वास्तविक जीवन की त्रासदी के बीच की बारीक रेखा तब धुंधली हो जाती है जब अजय देवगन की फिल्म चौहान जैसी कृतियों में संवेदनशील मुद्दों को सतही तौर पर पेश किया जाता है। साल 2016 में अपनी खिड़की से बाहर झांकने की कीमत इंशा मुश्ताक ने अपनी दोनों आंखों की रोशनी गंवाकर चुकाई थी। उनके चेहरे और शरीर में सौ से ज्यादा धातु के छर्रे धंस गए थे। आज जब ये पीड़ित पर्दे पर इसे 'सीमित नुकसान' कहते सुनते हैं, तो उनका दर्द आक्रोश में बदल जाता है।

सरकारी आंकड़े और चिकित्सा शोध की भयावह हकीकत

कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि अजय देवगन की फिल्म चौहान का यह नैरेटिव हकीकत से कोसों दूर है। संसद और विधानसभा में पेश किए गए सरकारी आंकड़े खुद गवाही देते हैं कि यह नुकसान कितना असीमित था।

  • तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के मुताबिक, जुलाई 2016 से फरवरी 2017 के बीच 6,221 लोग इन छर्रों से घायल हुए।
  • इनमें से 728 लोगों की आंखों की रोशनी पर सीधा और गंभीर असर पड़ा।
  • इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के एक शोध के अनुसार, घायलों में अधिकांश युवा और 10 से 19 साल के बच्चे थे, जिनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

विवाद सिर्फ घाटी तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षत्रिय परिषद ने भी अजय देवगन की फिल्म चौहान के नामकरण और ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन का मानना है कि राजपूत इतिहास और चौहान वंश की विरासत को समकालीन राजनीतिक नैरेटिव या चुनावी बयानबाजी का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए। हालांकि, सिनेमा जगत के कुछ बड़े नाम और प्रशंसक इस टीज़र की सराहना भी कर रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर तीखी बहस का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।

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