K-6 Hypersonic Missile : अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में समीकरण बदल रहे हैं, ख़ासकर ईरान और इज़राइल के बीच हुए हालिया तनाव ने विश्व के इस भ्रम को तोड़ दिया कि अमेरिका से पंगा लेकर कोई देश सुरक्षित नहीं रह सकता। इजरायल के बारे में भी विश्व का नजररिया बदला है जिसके बारे में कहा जाता था कि उसके एयर डिफेंस को भेदना नामुमकिन है। लेकिन इरान से हुई 12 दिन की लड़ाई में विश्व के नजररिए में भारी बदलाव देखने को मिल रहा है।
इसी को देखते हुए भारत को भी अपनी रणनीति पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। भारत भी अपनी रक्षा प्रणाली को विश्व स्तरीय बनाने की कवायद शुरू कर चुका है। भारत अब अपनी रक्षा तैयारियों को बिल्कुल ही एक नए स्तर पर ले जाने के लिए कमर कस चुका है।
मीडिया में आर रही खबरों पर विश्वास करें तो तो भारत अपनी डिफेंस क्षमता को मज़बूत करने के लिए रूस से कुछ और S-400 एयर डिफेंस सिस्टम यूनिट्स मंगवा रहा है। लेकिन असली खबर जो आ रही है वह है कि भारत अब ब्रह्मोस से भी कहीं ज्यादा ख़तरनाक मिसाइल दागने की तैयारी में है। इस मिसाइल के बारे में कहा जा रहा है कि यह पूरी तरह से प्रशिक्षण के लिए तैयार है। ये मिसाइल इतनी शक्तिशाली बताई जा रही है कि अगर इसका परीक्षण सफल रहा, तो भारत मिसाइलों की दुनिया का राजा कहलाने लगेगा। चीन की बढ़ती सैन्य आक्रामकता और पाक के साथ उसकी मिली-भगत को देखते हुए, भारत अब एक मज़बूत एयर डिफेंस सिस्टम के साथ साथ बेहद ख़तरनाक बैलिस्टिक मिसाइलों का जखीरा भी चाहिए। इसीलिए भारत अब लम्बी दूरी के साथ ही भारी नुकसान पहुंचाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों पर दांव लगा रहा है।
ईरान ने जिस तरह से इज़राइल के हमले का जवाब दिया और उसके बाद अमरिकी हमले पर प्रतिकार किया उसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय बन गया है। सिर्फ अध्ययन ही नहीं उन्हें अपने नजरिए में भी भारी परिवर्तन करने के लिए बाध्य होना पड़ा है। ईरान ने अपने 90 प्रतिशत हमले बैलिस्टिक मिसाइलों से किए और सिर्फ़ 10 प्रतिशत ड्रोन का उपयोग किया। सबसे चौंकाने वाली बात ये रही कि ईरान के पास नाम मात्र कीे अपनी वायुसेना होने का कोई नुकसान नहीं देखने को मिला। जबकि उल्टे उसने तो अपनी वायुसेना का इस्तेमाल तक नहीं किया। उसने बैठे-बैठे बैलिस्टिक मिसाइलों के ज़रिए इज़राइल में भारी तबाही का मंजर दुनिया का दिखा दिया। इस घटना ने भारत को यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अगर चीन या पाक कभी हमला करें तो किस तरह की रणनीति अपना कर उनको काबू किया जा सकता है। अब भारत इसी तर्ज़ पर अपनी K-6 हाइपरसोनिक मिसाइल का परमाणु पनडुब्बी से परीक्षण करने की तैयार है। K-6 के समुद्री परीक्षण के लिए तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं, और इसे भारत के रक्षा बेड़े में एक गेमचेंजर के रूप में देखा जा रहा है।
अब आखिर K-6 में ऐसा क्या ख़ास है जो इसे इतना ख़तरनाक बनाता है और क्यों इसे ब्रह्मोस का बाप कहना गलत नहीं होगा। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी हाइपरसोनिक (आवाज की गति से भी अधिक तेज) गति है, जो मैक 7.5 यानी लगभग 9,261 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुँचने में सक्षम है। इस गति से ये मिसाइलें मौजूदा मिसाइल रक्षा प्रणालियों को भेदने में पूरी तरह सक्षम हैं। इसके अलावा, K-6 को मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल रीएंट्री व्हीकल्स (MIRV) ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसका मतलब है कि एक ही मिसाइल कई अलग-अलग लक्ष्यों पर सटीकता से हमला कर सकती है। MIRV की ये क्षमता K-6 को दुश्मन के क्षेत्र में घुसपैठ करने और रणनीतिक निरोध के लिए एक बेहद शक्तिशाली हथियार बनाती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी 8,000 किलोमीटर तक की परिचालन सीमा है। इसका सीधा मतलब है कि K-6 चीन के लगभग हर कोने, उनके बड़े रणनीतिक और आर्थिक केंद्रों को पहुंच रखता है। सैन्य विशेषज्ञ इसे भारत के लिए एक फोर्स मल्टीप्लायर के रूप में देख रहे हैं, ख़ासकर हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति और क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए। परमाणु पेलोड के अलावा, यह मिसाइल कथित तौर पर पारंपरिक वारहेड भी ले जाने में सक्षम है, जो युद्ध के विभिन्न परिदृश्यों में इसे परिचालन लचीलापन प्रदान करती है। संक्षेप में, के-6 सिर्फ़ एक मिसाइल नहीं, बल्कि भारत की बदलती रक्षा रणनीति का एक प्रमुख स्तंभ है जो उसे भविष्य के युद्धों के लिए तैयार कर रहा है।
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